Friday, March 14, 2014

हम और हमारे बुजुर्ग

   
  व्यक्ति से परिवार और परिवार से समाज बनता है। परिवार के बिना न व्यक्ति की कल्पना की जा सकती है न ही समाज का। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। किसी भी व्यक्ति की मान - मर्यादा ,उसका उत्कर्ष ,उसका उत्थान परिवार पर निर्भर करता है। परिवार यदि संस्कारी होगा तो व्यक्ति भी सुसंस्कृत और संस्कारी होगा।
        आज एकल परिवाार के,जिसमें " हम दो हमारे दो " अथवा " हम दोनों एक हमारे एक " की अवधारणा प्रचलित है , मुकाबले आज से कुछ वर्ष पहले तक परिवार का अर्थ होता था एक संयुक्त परिवार ।  माता - पिता ,भाई -बहन , पुत्र-पुत्रियाँ , औए कई पुश्तों के परिवार एक साथ एक आँगन में रहा करते थे।  कुछ दिक्क्तों को छोड़ कर संयुक्त परिवार ही सर्वश्रेष्ठ और उत्तम माना गया है। परिवार में रह कर दूसरे का. ख़याल रखने  , तौर - तरीके , आपस में स्नेह , प्यार , सम्मान और एक अनुशाशन में बंध कर सुसंस्कृत जीवन जीने की कला सीखते थे। एक दूसरे के  सुख - दुख को नजदीक से समझने और ,झेलने और दूर करने का उपाय ढूंढ़ लेते थे। जीवन में समस्याएँ आज भी हैं कल्ह भी थे । परन्तु कल्ह के जीवन की समस्याओं को हम परिवार में बैठ कर बड़े - बजुर्ग के अनुभव और सहयोग से सरलता पूर्वक पार लगा जाते थे। ये हममें अच्छे संस्कार भरते थे। विषम से विषम परिस्थितियों में , समस्याओं की चुनौतियों से लड़ने और पार लगाने में सहयोग के साथ-साथ हमारा आत्मबल , आत्मविश्वास और साहस बढ़ाते थे। हमारा मार्गदर्शन करते थे। आज हमारे ये ही बुजुर्ग हमसे दूर और उपेक्षित हो गए हैं।
       आज का एकल परिवार पति-पत्नी और बच्चे तक  ही सीमित रह गया है। आज हम अपने आप में घुट कर ,मन मसोस कर रह जाते हैं और तनाव को आमंत्रित करते हैं। यद्द्यपि इसमें किसी व्यक्ति विशेष का दोष नहीं है , जीवन शैली ही इस तरह की बन गई है कि न चाहते हुए भी हमें अपने से दूर हो कर अलग रहने की कहीं मजबूरी हो गई तो कहीं विवशतावश आपस में एक दूसरे को बर्दाश्त और विश्वास करने की क्षमता में कमी ही इसका  कारण है। आज के भौतिक युग की विषम व्यवस्था  के कारण रोजी-रोटी,शिक्षा-दीक्षा , व्यवसाय ,आपसी विश्वास-विचार की भिन्नता के कारण हम परिवार से कटते जा रहे हैं जिससे कई तरह के अवसाद हमें घेर लेते हैं और हम कई असाध्य बीमारियों के शिकार हो जाते हैं।वर्तमान में एकल और छोटे परिवार को देखते हुए प्रतीत होता है कि यदि ऐसी ही स्थिति रही तो कहीं ऐसा न हो कि आगे आने वाले कुछ वर्षों में दादा - दादी ,नाना -नानी ,बुआ -मौसी ,और अन्य रिश्ते भी सिर्फ कहानियों और कल्पनाओं में ही रह जायेंगे।
         आज की सामाजिक व्यवस्था में हमें अपने बुजुर्गों को अपेक्षित स्थान देने की आवश्यकता है।
  समाज और परिवार में कई- कई विषयों पर चर्चायें और  बहस होती हैं  किन्तु हम अपने बुजुर्गों को ही दरकिनार कर देते हैं। बुजुर्ग यह सब देखते हैं और खामोश रह सब सहते हैं। वे अपने आप में घुटते और घुलते रहते हैं और अवसाद का  शिकार हो कर तनाव पूर्ण जीवन जीने को मजबूर हो जाते है। यह स्थिति कमोबेश हर समाज और परिवार की है।
            आज के हमारे बुजुर्ग, जिन्होंने अपना पूरा जीवन परिवार और समाज के लिए अर्पित कर दिया , जिन्होंने हमारे भविष्य को सजाने और संवारने में अपना जीवन होम कर दिया , वही, आज उपेक्षित हों तो यह किसी भी परिवार और समाज के लिए कलंक है।
            कोई भी व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में कार्य करता है तो वह सिर्फ अपने  लिए ही  कार्य नहीं करता है, वरन उसके कार्य से परिवार और समाज के कई तबके लाभान्वित होते हैं । वह चाहे नौकरी करता हो , व्यापार करता हो , कारीगर हो या वह मजदूरी ही करता हो , समाज के सभी वर्गों के लिए किसी न किसी रूप में उसका योगदान रहता है । किन्तु वही , जब ऐसी स्थिति में पहुँच जाते हैं , जहाँ उसके आगे कार्य करने में विराम लग जाता है अथवा सक्षम नहीं रह जाते हैं तो वे ही उपेक्षित हो जाते  हैं । यह अनुचित है।
        परिवार और समाज को अहसास होना चाहिए कि वे इन्हीं बुजुर्गों की बदौलत इस दुनियाँ को देख रहे हैं और जीवन का दुःख-सुख , आनंद का अनुभव कर रहे हैं। ये बुजुर्ग हर हाल में हमारे माननीय और आदर्श हैं, यह सोच, हमें अपने आप में पैदा करनी  चाहिए।  जब तक बुजुर्ग हमारे साथ हैं हमारे सिर पर मजबूत छत है,आकाश है। वे हमसे कुछ लेते नहीं , देते ही हैं -कम से कम अपना अनुभव।           
        केंद्र की सरकार और कुछ राज्य सरकारों ने भी कुछ आर्थिक मदद दे कर , इस दिशा में प्रयास किया है पर वह नाकाफी है। उनके इस प्रयास के अलावे भी इन बुजुर्गों को एक    मजबूत भावनात्मक सहारे की आवश्यकता  है जो केवल परिवार और समाज से ही मिल सकता है।बिना बुजुर्गों के हमारा परिवार अधूरा है। यहाँ यह बात भी समझना जरूरी है कि हमारे आचरण का ही अनुसरण हमारी संतति और आने वाली पीढ़ीयाँ  करेंगी अतएव हमें अपने आचरण और व्यवहार को संयमित और आदर्शशील बनाना ही होगा।  
             आज इस बात को समझने की जरूरत है कि यह पूरा समाज ही जिसमें सभी वर्ग और वय के लोग हैं - हमारा एक परिवार है। तभी हम फिर से परिवार की अवधारणा को पुनर्जीवित कर हँसी -खुशी ,स्नेह -सौहाद्र,सम्मान और आदर से स्वयं के साथ -साथ समाज का भी उत्थान कर  सकते हैं।

 ( प्रकाशित )