Thursday, February 4, 2016

वह लड़की

                       यह कहानी कोई 50 - 51 साल पहले की एक लड़की की कहानी है   
                       वह यही कोई  6 - 7 वर्ष के वय की रही होगी। गोरी - चिट्टी ,बड़ी- बड़ी गोल - गोल आँखें , जिसमें अभाव ,विस्मय , कौतुहल और प्रश्न ही तैरते दिखे। वह सदैव ही एक ही फ्रॉक में दिखाई पड़ती थी। जनवरी के महीने में भी अल सुबह कड़कड़ाती ठंढ में घुटने तक का फ्रॉक , उस पर एक मैला सा हाथ का बना आधी बाँह का स्वेटर - स्टेशन का खुला लंबा प्लेटफॉर्म - जाड़े की चुभती ठंढ जो मेरे वूलन कोट की दीवार को चीड़ कर मेरे रूह को भी कँप- कँपा जाती थी , वह दिख जाती थी।
                        वह सदैव हमवय के झुण्ड में ही स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर पास के ही बस्ती  से जो स्टेशन से लगभग 200 मीटर रही होगी , आती थी। यह 200 मीटर का रास्ता वैतरणी पार करने से कम नहीं था - हर ओर  गंदगी और कीचड़ ही कीचड़। बस्ती से कुछ ही दूरी पर पक्की सड़क थी , दुकानें थीं , पुलिस थाना भी था , जहाँ पहुँचने के लिए इसी बस्ती के घरों के बीच तंग , सकरी  व गंदे पानी - कीचड़ से भरे गली से होकर जाना होता था।
                        इस स्टेशन से एक ही सवारी गाड़ी गुजरती थी , जो दिन में तीन या चार बार आया - जाया करती थी। इसके अलावा इस स्टेशन से रेल के माल डब्बों में गन्ने का लदान होता था जो कई चीनी मिलों को भेजा जाता था। स्टेशन क्या था - कुल मिला- जुला कर स्टेशन मास्टर का एक कमरा था , जिसमें गाड़ी संचालन के साथ - साथ टिकट खिड़की भी उसी में थी और दूसरा छोटा कमरा स्टोर का था जहाँ मिट्टी का तेल एवं कुछ अन्य सामान रखा होता था। यह कमरा अक्सर बंद रहता था।
                        मिस्टर मिर्ज़ा इस स्टेशन के  स्टेशन मास्टर थे। उनका घर अगले स्टेशन के शहर में था। उम्र यही तक़रीबन  50 -52 के रही होगी।  उनके एक बेटा और पाँच बेटियाँ थीं जो कभी - कभार अपने अब्बू के साथ यहाँ घूमने आ जाया करती थीं। उनके आने का मक़सद घूमने का नहीं होता था। मिर्ज़ा साहब गन्ने के ठेकेदार से गन्ने के दो - चार बंडल मँगवाते थे जो वे स्वयं ही ड्यूटी ख़त्म कर अपने साथ ले जाते थे या फिर कभी इन बच्चों के साथ  भेज दिया करते थे।
                       गन्ने का बंडल बाहर  बरामदे में रखा होता था। गाँव के कुछ अभावग्रस्त बच्चे गन्ने का एक टुकड़ा पाने की लालसा में बरामदे के इर्द - गिर्द चक्कर काटते रहते थे। मिर्ज़ा साहब कभी - कभार किसी ख़ास बच्चे को गन्ना दे भी देते थे किन्तु यह तभी संभव हो पाता था जब वह बच्चा उन्हें सस्ते में अंडे देता था।
                       अंडे बेचना इन गरीब बच्चों की मजबूरी थी। शायद इससे घर का कुछ गुजारा होता हो , नमक - दाल का जुगाड़ हो जाता हो। उन दिनों दाल आज की तरह मँहगी नहीं थी। यद्दपि एक अंडे की कीमत चार आने थी , वह भी देशी अंडे।
                         इस गाँव के प्राय:हर घरों में मुर्गियाँ पाली जाती थीं।  इसलिए कोई दो -चार या कोई एक ही अंडा लेकर बेचने आ जाता था या आ जाती थी। मिर्ज़ा साहब रोज ही अंडे लेते थे , आठ या दस या कभी - कभी कुछ ज्यादा ही। कुछ तो ट्रेन के यात्री खरीद लेते थे , कुछ ट्रेन के गार्ड और ड्राइवर। इस तरह शायद उन बच्चों के घर का खर्च निकल आता था।
                        एक दिन वह लड़की अपने हाथ का अंडा नहीं बेच पाई। उसके हाथ में एक ही अंडा था। वह देर से आई थी। ट्रेन जा चुकी थी। कोई यात्री भी प्लेटफॉर्म पर नहीं था। उसने मिर्ज़ा साहब से बार - बार मिन्नतें की। " बीस पैसे दूँगा " - मिर्ज़ा साहब ने कहा। पर लड़की पच्चीस पैसे माँग रही थी। उन्होंने उसे झिड़क दिया। वह रुआँसी हो कर प्लेटफॉर्म पर बने सीमेंट की बेंच पर बैठ गई। उसकी  बड़ी - बड़ी गोल आँखों में आँसू निकल आये। उसके साथ की कुछ लडकियाँ और कुछ लड़के उसे घेर कर खड़े थे।
                          पास ही खड़ा  22 - 24  साल का एक लड़का यह सब देख रहा था।  वह उसके पास चला गया - कितने का है यह अंडा ? " चार आने " - बड़े भोलेपन से लड़की ने कहा। लाओ , मुझे दे दो और यह कह कर लड़के ने जेब से एक अठ्ठन्नी निकाल कर लड़की की ओर  बढ़ाया। लड़की ने कहा - बाबू जी मेरे पास छुट्टे नहीं हैं। " इसे ही रख लो " - लड़के ने कहा। " नहीं बाबू जी , अम्मी  मुझे मारेगी , कहेगी तू ने चोरी की होगी।  मैं चोर नहीं हूँ बाबू जी। "
                         लड़का विस्मय से लड़की को देख रहा था।  इतनी स्पष्टवादिता , इतनी साफ़गोई ! इतनी सरलता ! लड़के ने अठ्ठन्नी वापस ले ली। फिर जेब से एक चवन्नी निकाल कर लड़की की  हथेली पर रखा। लड़की ने झट से मुठ्ठी बंद किया। जैसे उसे खजाना मिल गया  हो। उसके चेहरे पर संतोष  और ख़ुशी की लहर स्पष्ट झलक रही थी। वह बहत खुश थी । उसके चहरे की मुस्कुराहट  लौट आई थी। उसने अपने घुटने तक पहनी फ्रॉक उठा कर अपने आँसू पोंछे और खुश हो कर अपने साथ की लड़कियों के संग घर को चली गई।
          
( दिल्ली से प्रकाशित हिन्दी पत्रिका  " परिंदे ' ( अंक फरवरी -मार्च  2016 ) में  " चवन्नी " शीर्षक से प्रकाशित ) 

Tuesday, February 2, 2016

डाकपत्थर की सैर

   
        वह रविवार का दिन  था। जनवरी का महीना। ठंढ अभी गई नहीं थी। वैसे भी देहरादून में ठंढ का मौसम अमूमन फ़रवरी तक होता है। मन हो रहा था कहीं घूम आयें। सुबह के नौ बजे थे। अचानक डाकपत्थर घूमने का विचार मन में आया। मैं और मेरी पत्नि जल्दी - जल्दी तैयार हुए। साथ में कैमरा  व बायनाकुलर रख लिया। लौटते - लौटते शाम हो सकती है यह सोच कर शॉल भी रख लिया। पीने का पानी रखा। क्या पता वहाँ साफ पानी मिले न मिले। यद्दपि डाकपत्थर का नाम हमने बहुत पहले से सुन रखा था पर कभी जाना नहीं हुआ । उत्सुकता थी - वहाँ खूबसूरत डैम बना है। वहाँ बहुत सारे विदेशी पक्षी आते हैं। देहरादून से यह  42 -45 किलोमीटर की दूरी पर है। जाने का साधन निजी गाड़ी या फिर प्राइवेट बस - टैक्सी ही है।
                    हम आई. एस. बी. टी  (  ISBT ) पहुँचे और वहाँ से प्राइवेट बस से डाकपत्थर के लिए प्रस्थान किये। तब तक दोपहर के 12  बज गए थे। वहाँ पहुँचते - पहुँचते सवा दो बज गए।जहाँ पर बस ने हमें उतारा वहाँ से करीब डेढ़ किलोमीटर का पैदल रास्ता था। हम दोनों पैदल ही चले। रास्ते में हमने झाड़ियों में Grey bushchat , Green bee -eater देखा। डैम पर पहुँच कर जो देखा , वह बहुत ही मनमोहक था।   यमुना नदी पर बना लंबा  डैम - इस किनारे उत्तराखण्ड और दूसरी ओर हिमाचल की ऊँची पहाड़ियाँ , सौंदर्य का अद्भुत समागम। डैम के स्थिर पानी में तैरते -उड़ते सुरखाब( Ruddy shelduck ) बरबस मन को आकर्षित कर रहे थे। हमने सुरखाब के बहुत सारे फोटो लिए। वहाँ कुछ और नई प्रजाति के पक्षी देखने को मिले जिनमें Common Pochard , Tufted Duck, Cormorant, White wagtail,White caped Redstart, Plumbeous  Redstart, Lapwing,Heron,Egret,Pipit आदि थे। डैम के दोनों ओर प्रकृति की गोद में स्थित पहाड़ी छटा का आनन्द ही कुछ और था। वहाँ बहुत लोग घूमने आये हुए थे। प्राय: सभी  के पास अपनी गाड़ियाँ थीं। एक बस से स्कूल के कुछ बच्चे और उनके साथ टीचर भी आये थे। पास में ही टूरिस्ट पार्क था। हम वहाँ भी गए। पार्क की सबसे बड़ी खूबी थी कि वह बहुत साफ-सुथरी थी। ऊँचे - ऊँचे तार के बाड़ों से घिरा था जो सुरक्षा की द्दृष्टि से अहम था।पार्क के दूसरी ओर यमुना का विस्तृत पार्ट था। बच्चे और बड़े सभी पार्क का आनन्द ले रहे थे। हमने भी कुछ समय वहाँ बिताया। हम दोनों शाम के पांच बजे वहाँ से वापस हो लिए। घर पहुँचते - पहुँचते रात के आठ बज गए।नीचे कुछ फोटो दिए हुए हैं जो हमने डाकपत्थर में लिए हैं।
       



Ruddy shelduck>


                                                              Grey bushchat
Pipit
White wagtail
Redstart ( White caped )
Common pochard