Thursday, August 22, 2013

सुहाना सावन - बरसता बादल

   सुहाना  सावन  हो  ,  रिम - झिम  फुहारों   की  बरसात  हो ,  ऐसे  में  तन - मन  न  भीगे  ,  संभव   नहीं  ।
                              
                     बारिश   का  नाम  सुनते  ही  मन - प्राण  स्फुरित  हो  झंकृत  हो  जाता  है  । यौवन  की  दहलीज  पर  कदम  रखते  हुए  जब   तन  और वदन पर  बारिश   की  फुहार   पड़ती  है तो  एक  साथ  ही  सम्पूर्ण  शरीर  में  सिहरन  पैदा  कर  जाती  है - जैसे  अज्ञात  भीगे  उँगलियों का   स्पर्श  ह्रदय  को  रोमांच  और  रोमांस  से  आप्लावित  कर  जाता   है  ।
                      बचपन  से  ही  हम  सब  ने  अपनी - अपनी  वय  में  बारिश   का  आनंद  अवश्य  उठाया  है  ।  बारिश   का  पानी  आँगन  और नालियों  में  भर  जाने  पर  उसमें  कागज़  की   नाव  तैरा  कर  जो  ख़ुशी  बालपन  में  मिलती  है  उसकी  परिकल्पना  नहीं  की  जा  सकती  ।  पानी  में  उछल - उछल  कर  छप - छप  करना  किस  बच्चे  को  अच्छा  नहीं  लगता  है ----
                    "  चल  पानी   में   उछलें -  कूदें  ,                     
                       भींगे  हम , कुछ  मोद  मनायें  ,
                        छप,छपा- छप, छप -छप छैया  ,
                     ,  हो  हैया , हो  , हो   हैया। " - स्वरचित 
              स्कूल  और  कॉलेज  आते - जाते  बारिश   की  बूँदों  में  भींगना  भी  कितना  आनंदमय  क्षण  होता  था  , जब  मन  की  थकन और  तन  की  तपन  मिटती भी थी  और  बढ़  भी  जाती  थी  ।
                 बरामदे  या  खिड़की  में  बैठ  कर  बारिश   का  आनंद  लेते  हुए  चेहरे  पर  पड़ती  फुहारों  की  छुअन   और  उस  कशिश  भरे क्षणों  में  आनन्दातिरेक  हो  सुध - बुध  खो  कर , बस भींगते रहना कितना  अच्छा  लगता  था ! काश ! वो  लम्हा  फिर  से  लौट  आता ।  ये  चाहत  अब  भी  मन  को  भाव -विह्वल  कर देती   है  ।
          कितने  ही  कवियों  ने  इस  पावस  ऋतु  की  सुन्दरता   का  बखान  अपनी - अपनी  लेखनी  से  अपने - अपने  मनोभावों  के अनुसार  किया  है  ।
                    गर्मी  में  सूरज  की  तपन  से  झुलसे  हुए  दूब  भी , बारिश   की  पहली  बूंद  से  नहा  कर  स्वत:  सद्द:  स्नाता  नायिका  की  तरह  हरे - हरे  परिधानों  में  विहँसती  हुई  हम  सब  के  स्वागत  को  बिछ जाती  है , जिसे  देख  कर  हमारी  आँखें   तृप्त  हो  जाती  हैं  ।
                     पेड़ - पौधे  हरे - भरे  हो  कर  ख़ुशी  से  झूमते  हुए  बादलों  को रिझाते  अपनी  ओर   आकर्षित  करते  हैं  । पत्तों  से  टप - टप कर  गिरती  बूँदें  सरगम  का  गीत  सुनाती  हैं । पेड़ों  की  डालों  और  तनों   से लिपटती ,  चूमती  हुई  जलधाराएं  जब  चलती  हैं  तो  मानो  सावन  की  नायिका  अपने  प्रियतम  से लिपट - लिपट जन्मों  - जन्मों  की  प्यास  बुझा  लेना  चाहती  है --
                         " पात - पात  तरुवर  का  देखो  ,
                          झूम  -  झूम   देता  आमंत्रण  ,
                          सावन बरस -बरस कर करता   ,
                          तरु  के  गात-गात  आलिंगन   ।" - स्वरचित 

                     नीले  नभ  में  बादलों  के  घिरते  ही  मोर , पपीहा , चातक - चातकी  कूजने  और  चहकने  लगती   हैं  । ऐसे  रसमय  सावन  में  परदेसी  पिया  से  मिलन  को  आतुर  वियोगिन  नारी  व्याकुल  चित्त  से  साजन   के  आने  की  बाट  जोहती  हुई  अपना  दुःख और आक्रोश  छिपा  नहीं  पाती  ।  उलाहना  देती  हुई  वह  ख़त  लिखती  है ---
                    
               "  कर  कागद  लई  के  वियोगिन  नारि  ,
                   लिखि    इमि   साजन   को   पतिया   ,
                   पिय    पावस    में    परदेश    गए     ,
                   बलिहारी   तुम्हारी   शिला   छतिया    । " - विद्यापति  
                    
       स्त्रियाँ   ही  नहीं  ,  पुरुषों  को  भी  वियोग   और  विछोह  का  दर्द  झेलना  पड़ता   है  ।  वर्षा   ऋतु  के   आने  पर  साक्षात   विष्णु   अवतार   अयोध्यापति   भगवान  श्री  राम   को  भी  अपनी   पत्नि   सीता  का  विछोह  सालता  है  ।  वे  अनुज  लक्ष्मण   से  कहते  हैं ------
                                "   घन   घमंड   नभ    गर्जत   घोरा   ,
                                     प्रियाहीन    डरपत    मन     मोरा  । " - तुलसीदास कृत रामचरित मानस  
          कवि   की  कल्पना  पंख  लगा  कर  उड़ती   है ।  जब   प्रेयसी   की   याद   आती   है  तो  प्रेमी   के  आँखों   से  आँसू   झड़ने   लगते    हैं  ----------
                                                 "  जब   याद  तुम्हारी   आती  है  ,
                                                    आँखों   में  सावन  आ   जाता  ।  " - स्वरचित 
           इतना  ही  नहीं  ,  जब  सावन  की  बूँदें  उसके तन पर  पड़ती  हैं  तो  वह  अति  भावुक  हो  जाता है --------
                                            "  जब  बूंद  थिरकते   हैं  तन  पर  ,
                                               तेरे  होठों  की  ये  छुवन लगती   । " - स्वरचित 
और  जब  सावन  की  फुहारों  से  भींगा   पवन  उसके  गालों   को  छू   कर   बहता  है   तो   बरबस  उसकी  आँखें   भींग   जाती  है  ---------
                                             "  छू  लेता  जब  मेरे    गालों    को ,
                                                 आँखों   में   सावन    आ    जाता  । " - स्वरचित 
            न्यारी  है  सावन   की  छटा , प्यारा है सावन ।   प्रकृति   में   चारों   ओर   हरियाली  का  साम्राज्य    बिछ   जाता  है  ।  नदियाँ  , झरने  ,  सरोवर   सभी   उल्लसित   हो   फूले   नहीं  समाते   हैं   ।   सावन   के  तीज - त्यौहार   और  राखी   के  पर्व   को   कैसे  भुलाया  जा  सकता  है । तीज  का   त्यौहार   स्त्रियों   के  लिए  विशेष  महत्व  रखता  है । इस    दिन  सुहागिन  स्त्रियाँ  नये - नये  वस्त्रों   एवं   आभूषणों से  सज कर , हाथों  में  मेहँदी   रचा   कर   शिव - पार्वती   की    पूजा करती  हुई   अपने  पति   की  लम्बी   उम्र   की कामना  करती   हैं  ,   झूले   झूलती  हैं   ।     उत्तर प्रदेश   और  उत्तराखंड   में  इस  पर्व   का   विशेष   महत्व    है ।  वैसे  भी   पूरे  सावन  में   शिव  की  पूजा - अर्चना   और   जलाभिषेक   भारत   के   हर   प्रदेश    में   होता  है  ।  सभी  शिवालयों  और   मंदिरों   में   भगवन   शिव  पूजे   जाते   हैं  ।
          साथ    ही   भाई - बहनों   के  पावन  प्यार , स्नेह  और  अटूट   बन्धन   का  अमर  पर्व   रक्षा - बंधन   भी   सावन  के  महीने   में   चार  चाँद   लगाता   है  ।  भाईयों   की   कलाईयों   में  रंग - बिरंगी   राखियाँ   बाँधती   हुई   बहनों  की  ख़ुशी   का  पारावार  नहीं  रहता  ।  बहनें  अपने  भाइयों  की  लम्बी  उम्र  की   कामना  के  साथ - साथ  स्वास्थ्य  और  धन - धान्य   से  परिपूर्ण  होने  की  कामना  करती  हैं  ।
भाई   भी   बहन  को  यथासाध्य   वस्त्र  ,  भूषण  ,  धन   देते  हैं  तथा  बहन  की  रक्षा   का   व्रत  लेते  हैं  ।  भारत  भूमि  की  गोद   में  प्राकृतिक  छटा   से   लवरेज   सावन   का  यह   तोहफा   भाई - बहन   के  अनूठे  प्यार  को  दर्शाता   है  ।
          एक  ओर   पहाड़  ,  आकाश , नदी  , नाले  ,पेड़ - पौधे  , डालें - पत्ते  सभी  धुल  जाते  हैं  । बादलों  के  बीच  से  झांकता   नीला   आसमान   भी  सुन्दर   दिखने   लगता  है  ।  हरे - भरे  पत्ते  ,  बिन  छुए  ही  अपनी  कोमलता  का  एहसास कराते  हैं , जैसे षोड़श वय प्राप्त करती षोड़षी , स्वत: , विमलांगी - कोमलांगी प्रतीत होने लगती है। कभी सप्तरंगी  इन्द्रधनुष  चटक कर   सबका मन  मोह  लेता   है  तो  वहीँ   दूसरी  ओर  गरजते , तड़कते  , कड़कते  घन  और  बिजलियों   की  चमक  भयभीत  करती  हैं । बारिश  की  जलधारायें   विकराल   रूप  धारण   कर  लेती  हैं   ।  नदी ,  नाले  ,  तड़ाग   उफन  जाते हैं , मानो यौवन का आवेग संभाले नहीं संभलता। पहाड़ों ,पत्थरों को तोड़ती,उसके अभिमान का मर्दन करती , आगे बढ़ती जाती हैं । तटबंधों को तोड़ आतुर नदियाँ ,फुफकारती , हुईं , अपनी राह में आई बाधाओं को धकेलती ,अपने प्रियतम सागर से मिलने दौड़ी चली  जाती हैं।
 
          पर  ,  यह  भी  सच  है  कि सावन की झमा - झम   बारिश   को  देख  ,  किसानों   की  छाती  चौड़ी   हो  जाती  है  तो  कहीं  अपने  प्रियतम  के  आने  की  राह  जोहती  प्रिया   बादलों   से  अनुनय  करती  है  ---------
                                            "  ओ   अब्र   नव   बहार   ज़रा   थम   के    बरसना , 
                                              आवेगा  घर  में  यार  तो  झम - झम  के  बरसना। " -अज्ञात 

Tuesday, August 13, 2013

वह लड़की - एक संस्मरण

                      उस लड़की की याद मुझे अब भी आती है , उसकी  निश्छलता , उसका आकर्षण , और सबसे अधिक उसकी मधुर , मिठास भरी बोली , अब भी मेरे ज़ेहन में समाये हुए हैं ।
                      अब तक वह बहुत बड़ी हो गई होगी । शायद उसके बच्चे भी बड़े हो गए होंगे । तब वह यही कोई  6 - 7 वर्ष के वय की रही होगी । गोरी - चिट्टी , बड़ी - बड़ी गोल आँखे ,जिसमें अभाव , विस्मय , कौतूहल और प्रश्न ही तैरते दिखे मुझे । वह सदैब एक ही फ्रॉक में दिखाई पड़ती थी । जनवरी के महीने में भी अल सुबह कड़ - कड़ाती ठंढ में भी घुटनों तक का वह फ्रॉक , उस पर एक मैला सा ,हाथ का बुना ऊन का आधी बाँह का स्वेटर ।
                        स्टेशन का लंबा खुला प्लेटफ़ॉर्म - जाड़े की चुभती ठंढी हवा , जो मेरे वूलन कोट की दीवार को पार कर  मेरी रूह को भी कँप-कँपा जाती थी .......
                        वह सदैव  हमवय के झुण्ड में ही स्टेशन प्लेटफ़ॉर्म  पर पास के ही गाँव जो स्टेशन से लगभग दो सौ मीटर रही होगी , आती थी । यह 200 मीटर का रास्ता वैतरणी पार करने से कम नहीं था - हर ओर गंदगी और कीचड़ ही कीचड़ । गाँव से कुछ ही दूरी पर पक्की सड़क थी ,दुकानें थीं और पुलिस थाना भी था जहाँ पहुँचने के लिये इसी गाँव के घरों के  बीच तंग , सँकरा व गंदे पानी - कीचड़ से भरे गली से जाना  होता था ।
                          दरअसल , इस स्टेशन से रेल के माल डिब्बों में  गन्ने का लदान होता था जो कई चीनी मिलों को भेजा जाता था । स्टेशन क्या था,कुल मिला - जुला कर बस स्टेशन मास्टर का एक कमरा,जिसमें गाड़ी संचालन के साथ -साथ टिकट खिड़की भी उसी में थी और दूसरा  छोटा सा कमरा स्टोर का था जहाँ मिट्टी का तेल एवं कुछ अन्य सामान रखा होता था । यह कमरा अक्सर बंद  रहता था ।
                          मिस्टर मिर्ज़ा , इस स्टेशन पर सीनियर स्टेशन मास्टर थे । उनका घर अगले स्टेशन के शहर में था । उम्र लगभग 50 -52  के रही होगी । उनके एक बेटा और  चार - पाँच बेटियाँ थीं , सभी एक से बढ़ कर एक   खूबसूरत, जो कभी - कभार अपने अब्बू के साथ यहाँ घूमने आ जाया करती थीं । उनके आने का मकसद घूमने का नहीं होता था । मिर्ज़ा साहब गन्ने के ठेकेदार से गन्ने का दो - चार बण्डल गन्ने का मंगवाते थे जो वे स्वयं ही ड्यूटी ख़त्म कर अपने साथ ले जाते या फिर इन बच्चों के साथ भेज दिया करते थे ।
                          गन्ने का बण्डल बाहर बरामदे में रक्खा होता था । गाँव के कुछ अभावग्रस्त बच्चे गन्ने का एक टुकड़ा पाने की लालसा में बरामदे के इर्द -गिर्द चक्कर काटते रहते थे । मिर्ज़ा साहब कभी  - कभार किसी ख़ास बच्चे को गन्ना दे भी देते थे , किन्तु यह तभी संभव हो पाता था जब वह बच्चा उन्हें सस्ते में अंडे देता था।
                         अंडे बेचना इन गरीब बच्चों की मजबूरी थी ,शायद इससे घर का कुछ गुज़ारा हो जाता ,नमक- दाल का ही जुगाड़ हो जाता हो ( उन दिनों , दाल आज की तरह मंहगी नहीं थी ) । यद्दपि एक अंडे की कीमत सिर्फ चार आने थी , वह भी देशी अंडे ।
                          इस गाँव के  प्राय:हर घरों में मुर्गियाँ पालीं जाती थीं । इसलिए कोई  द-,चार या कोई -कोई एक ही अंडा लेकर बेचने आ जाता या आ जाती थी।
                          मिर्ज़ा साहब रोज ही अंडे लेते थे,आठ या दस या कभी-कभी कुछ ज्यादा ही।कुछ तो ट्रेन के यात्री खरीद लेते थे कुछ ट्रेन के गार्ड और ड्राईवर । इस तरह अंडे के व्यापार से शायद उनके घर का थोड़ा बहुत खर्च निकल आता था । 
                          एक दिन " वह लड़की " अपने हाथ का अंडा नहीं बेच पाई।उसके हाथ में एक ही अंडा था।  शायद वह देर से आई थी , ट्रेन  जा चुकी थी ,कोई यात्री भी प्लेटफ़ॉर्म पर नहीं था । उसने मिर्ज़ा साहब से बार -बार मिन्नतें की ।" बीस पैसे दूँगा" - मिर्ज़ा साहब ने कहा , पर लड़की पच्चीस पैसे मांग रही थी । उन्होंने  लड़की को झिड़क दिया । वह रुआँसी हो कर प्लेटफ़ॉर्म पर बने सीमेंट के बेंच पर बैठ गई । उसकी बड़ी - बड़ी गोल आँखों से आँसू निकल आये । उसके साथ की  कुछ लड़कियाँ और लड़के उसे घेर कर खड़े थे । कुछ दूर पर खड़ा मैं यह सब  देख  रहा था , फिर मुझे क्या सूझा कि मैं उनके पास जा कर खड़ा हो गया । तब उस लड़की ने कहा - बाबूजी आप ले लो अंडे । मैने कहा - मैं अंडे नहीं खाता हूँ । वह फिर उदास हो गई और उसकी आँखों से फिर आँसू बह निकले। वह कह रही थी - मैं अम्मी को क्या बताऊँगी , अगर मैं  पैसे लेकर घर नहीं गई तो अम्मी मुझे मारेगी ।
                            मुझे लगा कि  किसी ने मेरे  सीने पर हथौड़े से चोट कर दिया है । गरीबी में अक्सर छोटे बच्चे ही पिसते हैं । मैंने कहा- लाओ मुझे दे दो अंडे , कितने का है ? वह बोली- "चार आने " , पर बाबूजी आप क्या करेंगे अंडे लेकर , आप तो खाते नहीं । मैं खा लूँगा - मैंने कहा । नहीं बाबूजी आप नहीं खायेंगे , आप फेंक देंगे । नहीं , मैं खा लूंगा , मैंने उसे विश्वास दिलाया । नहीं बाबूजी , आप फेंकना नहीं , अल्लाह मुझे माफ़ नहीं करेगा । मैंने कहा,मैं सच में खा लूँगा । मैंने उसे अठन्नी दी, उसने उसे लौटा दिया - बाबूजी छुट्टे नहीं हैं । मैंने उसे रख लेने को कहा तो बोली- नहीं बाबूजी मुझे चार आने ही चाहिए,अम्मी मुझे मारेगी,कहेगी, मैंने चोरी की होगी,   मैं अल्लाह को क्या ज़बाब दूँगी , मैं चोर नहीं हूँ बाबूजी …………
                          उसकी निश्छलता , सत्यता और भोलेपन से युक्त बातें सुन कर मैं विमुग्ध  हो गया - इतनी सी उम्र और यह सोच ! मुझे अठन्नी मजबूरन वापस लेनी पड़ी और जेब से चवन्नी निकाल कर दिया फिर उन बच्चों के सामने ही मैंने अंडे को हथेली पर तोड़ कर सफेदी को बाहर गिरा दिया और ज़र्दी को कच्चा ही गटक गया । यह देख कर उस छोटी सी बच्ची के मुख से  " हाय ! अल्लाह ! " का शब्द जिस लोच और विस्मय से निकला वह आज भी मेरे कानों में गूँजती रहती है। उसकी निश्छलता ,  उसका भोलापन , उसकी   बड़ी - बड़ी , गोल - गोल डबडबाई आँखें - सब कुछ आज भी मुझे साफ - साफ दिखता है । गरीबी में भी ग़ुरबत - इतनी अशिक्षित होती हुई भी इतनी शिक्षित , धन्य है वह माँ और वह  बेटी ।
                      कौन कहता है कि गरीबी में ग़ुरबत नहीं है ? सच तो यही है हम
शिक्षित और अमीर लोग चाहे जितनी भी ढोल पीट लें , अगर ईमानदारी और संस्कार जीवित है तो गरीबों और अशिक्षितों के दिलों में आज भी जीवित है। 

                                                              विजय कुमार सिन्हा " तरुण "
                                                               डी - 40 ,  रेस कोर्स , देहरादून
                                                               ( उत्तराखण्ड  ) - 248001
                                                                मो० - 9897700208

Monday, August 12, 2013

एक ख़त अनाम के नाम

               कमबख्त चौबीस घंटे का समय भी कितना छोटा हो गया है । जिन्दगी रोजमर्रा के कार्यों में इतना व्यस्त रहता है कि पता ही नहीं चलता किस तरह दिन पर दिन बीत जाते हैं । लम्हा भर साँस लेने को भी फुर्सत नहीं होती , घर और दफ़्तर , दफ़्तर और घर - यही जिन्दगी का नाम हो गया है । दो क्षण जो फुर्सत की सोचो तो अनेक समस्यायें खड़ी हो जाती हैं और चीख - चीख कर कहती हैं कि पहले मेरा हल निकालो , पहले मेरा हल निकालो ………। इसी क्रम में जीवन की शाम नजदीक आ जाती है और जिन्दगी सिर्फ सिफर  रह जाती है ।
               सोचता हूँ , कैसे हैं वे लोग जो फुर्सत के क्षण पा लेते हैं और जिन्दगी के सपनों को साकार कर लेते हैं। यहाँ तो अब सपने भी नहीं आते , बस उसकी छुअन की याद भर आती है कि  कभी कोई सपना था जो जाने कब चुपके से मेरी जिन्दगी के आँगन से निकल गया  ........... कटे हुए पतंग की तरह सबको सुंदर सा दिखता हूँ , ऐसा ही हूँ मैं , किसी एक का नहीं , कभी वक़्त  का गुलाम तो कभी समस्यायों का - कटा पतंग , जिसकी चाहत सब को है ,पर वह  जिसके हाथ आ जाए वह भी उसे धागे से बींध -बाँध कर पुन: छोड़ देता है हवा में उड़ने को या फिर कट कर किसी और के हाथों पर गिर जाने या मिट जाने को । गैर तो गैर , अपने भी छोड़ देते हैं पतंग की तरह , जैसे लटेर भी छोड़ देता है तुड़ा कर धागा , वक़्त की मजबूत हाथों में ........