Monday, August 15, 2016

शिक्षक दिवस पर विशेष

शिक्षक दिवस है क्या , क्यों मनाते हैं शिक्षक दिवस ?
                   शिक्षक का शाब्दिक अर्थ है - विद्यार्थियों को पढ़ाने वाले , शिक्षा देने वाले  गुरु। कहते हैं आज के बच्चे , विद्यार्थी , कल के राष्ट्र के भविष्य हैं। इस भविष्य को संवारने के लिए , आज के विद्यार्थियों का राष्ट्र निर्माण में सहभागिता , सहयोग  तो इनके निर्माण से ही संभव है। उनका सर्वांगीण विकास , उनका चरित्र निर्माण का उत्तरदायित्व , माता - पिता के बाद , शिक्षक का ही होता है। शिक्षक अपनी ज्ञान रुपी प्रकाश से बच्चों का चरित्र निर्माण  करते हैं।  सच कहा जाय तो शिक्षक राष्ट्र निर्माण में स्तंभ की तरह होते हैं । बच्चे घर से जो सीख कर आते हैं , उसके उपरान्त शिक्षक का कर्तव्य होता है कि वह अपने शिष्यों , विद्यार्थियों का सही मार्गदर्शन कर उनके चरित्र निर्माण में सहयोग करें। इस विशेष कार्य और योग्यता के कारण शिक्षक सदैव सम्मानीय हैं। ऐसे शिक्षकों  को सम्मान देने हेतु वर्ष का यह दिन सुनिश्चित किया गया है। 
                   वस्तुत: हमारे भारत के राष्ट्रपति डॉo सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी के सम्मान में जो स्वयं शिक्षाविद रहे हैं , उनके 1962  में  राष्ट्रपति बनने के उपरान्त उनके जन्म दिवस को उनकी इच्छा पर शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की परंपरा आरंभ हुई है। 
                      इस विशेष दिन ही, हम किसी न किसी रूप में शिक्षकों का सम्मान करते हैं। ऐसे  शिक्षकों  का जिन्होंने कर्तव्यपरायणता और कटिबद्धता के साथ शिक्षण क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य किया है , केन्द्र सरकार भी उन्हें विशेष रूप से सम्मानित करती है। 
                      यहाँ तक तो बात ठीक है - शिक्षकों का सम्मान होना चाहिए।  शिक्षक समाज और राष्ट्र दोनों    के निर्माण में सही दिशा देने में सहयोग करते हैं। बच्चों ,विद्यार्थियों के व्यक्तित्व एवं चरित्र निर्माण में सहयोग कर अपनी भागीदारी सुनिश्चित करते हुए अहम् किरदार निभाते  हैं। उन्हें सही ज्ञान देकर  शिक्षित कर उनके मन की अज्ञानता , डर , भ्रम को दूर कर , जीवन में आगे बढ़ने की , उन्नति करने की क्षमता और प्रेरणा प्रदान करते हैं। शिक्षक अपने ज्ञान रुपी प्रकाश से अज्ञानता का अन्धकार दूर कर उनमें साहस का संचार करते हैं और जीवन के कर्मयुद्ध के हर क्षेत्र में बढ़ने का हौसला प्रदान करते हैं। ऐसे ही शिक्षक माननीय हैं ,पूजनीय हैं। 
शिक्षकों का त्यागमयी हो कर , स्वार्थरहित  निर्लिप्त भाव से दी गई शिक्षा का प्रभाव विद्यार्थियों के जीवन पर गहरा पड़ता है।
                     लेकिन आज के इस वैश्विक एवं बाजारवाद के युग  में पैसे के पीछे भागते हुए शिक्षक , शिक्षा तथा चरित्र गिरता नजर आ रहा है। शिक्षा का पूर्ण व्यवसायीकरण हो गया है। शिक्षक विद्यालयों में विद्यार्थियों को सही रूप में शिक्षा भी नहीं दे पाते हैं। ऐसी कई शिकायतें समाचार पत्रों और टी . वी  .  चैनलों में 
आये दिन पढ़ने और देखने को मिलती हैं  कि शिक्षक स्कूल से गायब रहते हैं और उनकी जगह कोई अन्य व्यक्ति कक्षाएँ चला रहा होता है। कई जगह तो अधकचरा ज्ञान ही बच्चों को शिक्षकों द्वारा दिया जा रहा है। ऐसी ख़बरें भी  यदा -  कदा आती रही हैं कि शिक्षक और शिष्य की परंपरा की पवित्रता को खूब धक्का लगा है। शिक्षकों का चरित्र निम्न कोटि का होकर चरित्रहीनता का उदाहरण बन जाता है। वे  स्वयं तो अपमानित और  दण्डित होते ही हैं ,सम्पूर्ण शिक्षक वर्ग , स्कूल और समाज को भी अपमानित करते हैं।
                      यहाँ सब कुछ बताने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि हम सभी इस विज्ञान टेक्नोलॉजी के  युग में
समाचार पत्रों और टी . वी  चैनलों के  माध्यम से हर तरह की समाचारों से हर रोज अवगत होते रहते  हैं।
                       शिक्षा के गिरते स्तर के लिए सिर्फ शिक्षक ही नहीं अपितु हम , हमारा समाज और हमारी सरकार भी दोषी है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि हम सब भी कहीं न कहीं जिम्मेदार हैं  और शिक्षा के मानदंड को निचले पायदान पर पहुँचा दिया है।
                       जरूरत है हम सब अपने स्वार्थवादिता का त्याग कर राष्ट्र निर्माण के लिए विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास करें। उन्हें सही , समुचित ज्ञान के साथ-साथ उनका चरित्र निर्माण भी करें। जिस राष्ट्र का चरित्र जितना उन्नत होगा वह राष्ट्र उतना ही उन्नतवान होगा।
                        अंत में मैं यह कहना चाहूँगा कि शिक्षक और छात्र दोनों ही गौरव के पात्र हैं। दोनों अपनी गरिमा बनाये रखें । दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। विद्यार्थी भी सही दिशा - दशा पाकर , उन्नति कर ,ऊँचे पहुँच कर गौरवान्वित महसूस करेंगे। उसे अपने स्कूल और अपने गुरु पर गौरव होगा। तभी सच्चे मायनों में शिक्षक दिवस का महत्व पूर्ण होगा।

                                                 ----- विजय कुमार सिन्हा  " तरुण  "
                                                         डी - 40 , रेस  कोर्स , देहरादून।
                                                         
  (  प्रकाशित )