Monday, July 29, 2013

डायरी का पन्ना - 2

डायरी का पन्ना - 2
डायरी - विजय कुमार सिन्हा "तरुण "
            
इकवालपुर /सहारनपुर -12.10.1973 
                सहारनपुर का रेलवे हॉस्पिटल । डाँक्टर श्रीवास्तव के चैम्बर के बाहर पुरुषों व स्त्रियों की अलग -अलग दो लम्बी कतारें -समानान्तर  । स्त्रियों की कतार में एक सोलह -सत्रह साल की सांवली लड़की मेरे  ही बगल में खड़ी थी ( मैं भी पुरुषों की कतार में खड़ा था  )। दरअसल 7-10-1973 को मेरा  बाँया टखना चोटिल हो गया था और उसमें मोच आ गया था जिस कारण उसमें बहुत दर्द तथा सूजन आ गई थी । उन दिनों मैं इकवालपुर स्टेशन पर कार्यरत था और यह स्टेशन सहारनपुर रेलवे हॉस्पिटल के ही अंतर्गत आता था ।
                हाँ ,तो वह लड़की कुछ देर तक खड़ी रहने के पश्चात ,पास के ही एक बेंच पर बैठ गई । कुछ ही देर बाद वह बेहोश हो गई -मेरी नजर तब पड़ी जब उसकी छोटी बहन उसे होश में लाने का प्रयत्न कर रही थी । डाँक्टर के कमरे में प्रवेश के लिए दोनों ही कतारों में रेल -पेल चल रही थी । किसी ने भी उस लड़की का ख्याल नहीं किया -सभी को सिर्फ अपनी बारी की ही फ़िक्र थी । वह लड़की बेहोश थी -उसकी छोटी बहन उसे होश में लाने के प्रयास में  उसे बार -बार पुकार रही थी।दस -पंद्रह  मिनट बाद वह होश में आ गई थी किन्तु अच्छी तरह नहीं।कतार में रेल - पेल अब भी चल रही थी ,अब भी किसी ने लड़की को पहले प्रवेश की अनुमति नहीं दी । वह उसी बेंच पर बैठी रही । करीब एक घंटे के उपरान्त पुरुषों की क़तर में मेरा नंम्बर आ गया था ।रूक कर मैंने उस लड़की को इशारे से अपने पास बुलाया और वह लड़की मन्त्र -मुग्ध सी चुप -चाप मेरे पास आ गई । मैंने उससे पूछा  कि उसके साथ कौन है तो उसका एक संक्षिप्त उत्तर था -छोटी बहन । तत्पशात दरवाजा खोल कर पहले उसे और उसकी छोटी बहन को प्रवेश कराया , फिर मैं गया । डाँक्टर से दिखलाकर उसे दवाई के लिए  भेज दिया । मैं भी दवाई लेकर इकवालपुर स्टेशन आ गया । रास्ते भर मैं यह सोचता रहा कि क्या  आज का आदमी इतना संकीर्ण, संवेदनहीन और स्वार्थलोलुप हो गया है कि किसी की वेदना , किसी का दर्द, किसी की चीख भी उसकी आत्मा को जगा नहीं पाती है ?

डायरी का पन्ना-1

डायरी का पन्ना- विजय कुमार सिन्हा "तरुण "

रामपुर - 27 जून  1973

            रामपुर रेलवे स्टेशन का प्लेटफ़ॉर्म ।बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी । मैं अपने इंस्पेक्टर रूम में बैठा बारिश में भींगते और भागते लोगों को देख रहा था । तभी मेरी नज़र प्लेटफ़ॉर्मन नंबर 2 पर गई ।
            वह सिर से पैर तक भींग गई थी । अपने कंधे से भींगे चुन्नी को उतार कर उसने निचोड़ा ।पंजाबी लिबास में वह एक गरीब औरत लग रही थी - उम्र यही कोई 25-26 की रही होगी । गोरा-गोरा रंग , बारिश की बूंदों में भींगे हुए चेहरे पर भींगी काली लटें ,जैसे चाँद को ढकने का काले बादलों का विफल प्रयास ....
             ड्यूटी पर घूम रहे हवलदार की नज़र उस पर पड़ी । उसने उसके इर्द - गिर्द कई चक्कर काटे , सी. आर.पी. के जवानों की टोली की आँखे भी उठने से नहीं चूकीं, दो-चार और मनचलों की नज़रें भी उस ओर उठ
 गईं । हाँ तो , उसने चुन्नी निचोड़ा और फिर उसे ही ओढ़ कर कुछ क्षण खड़ी रही फिर एक बेंच पर बैठ गई ,भींगे कपड़ों में ही । 
              हवलदार चक्कर लगाता रहा , कई खूंखार व ललचाई नज़रें उसे घूरतीं रहीं । उसने अब अपना सिर अपनी गोद में छिपा लिया था । पास की बेंच पर बैठे कुछ लोग उठ कर चले गए थे। बारिस कुछ हलकी हो गई थी। उसने अब अपनी जूती पाँव से निकाल कर बेंच के नीचे रख दिया फिर उसी भींगे कपड़ों में ,भींगी चुन्नी को बदन से लपेटे उसी बेंच पर सो गई .........

Sunday, July 28, 2013

ज़नाज़ा एक शायर का

                                                
                        जनाज़े   में   मैं   भी   शामिल   था  ।   यह   ज़नाज़ा   एक   मशहूर    शायर   का  था  ।   महफिलों   और   काव्य    गोष्ठियों   में     उनका   कोई    सानी नहीं   था  ।  क्या   श्रोता   क्या  वक्ता  सभी   वाह  -  वाह   कह   उठते   थे   ।   मोटे  शीशे   का  चश्मा   हमेशा   उनकी   नाक  पर  रहता  था  ।   अक्सर   वह   बिना   किताब  -   कागज़   के  ही  शेर   सुनाया   करते  थे   ।  अलग  - अलग  अंदाज़   की   शायरी  थी  उनकी   ।  कहीं   जवाँ   दिलों   की   धड़कने   थाम  लेते   तो  कहीं - कहीं  उफान   लाते   ,  कहीं   कुछ  सुर्खरू   रुबाईयोँ   से   बुजुर्गों   के दिल  में   तम्मनायें   जगाते  । 
                           आज  ये   रौशनी   बुझ   गई   है  ,  शायरी   खामोश   हो  गई   है  ,  सदा  -  सदा  के  लिये  ।    उनके  नाते - रिश्तेदार  ,  पड़ोसी   ज़नाज़े   में   शामिल   थे  ,  कुछ   शायर    और  कवि  भी  ।  ऊपर   आसमान  पर   बादल   छाये   थे  ,बिजलियाँ   खामोश   थीं  ,  जैसे  वे  भी  शोक   में  डूबे  हों  ।  ज़नाज़ा  उठा  ,  थके  मन  से  लोग    ज़नाज़े   के  साथ  चल   दिये  ।  कुछ  उनमें  से  राह   से  ही  अलग   हो  लिए  तो  कुछ   कर्म  भूमि   के  अंतिम  पड़ाव  तक   पहुँच   कर  वापस   हो  लिए  ।  अब  गिनती  के  ही  लोग  श्मशान   घाट पर  थे । धार्मिक  विधान  पूरी  कर  मुखाग्नि  का कार्यक्रम  हुआ ,  फिर  उस  बुज़ुर्ग  शायर  की  चिता  धू - धू  कर  जल   उठी  ।  इस  बीच   समयावकास   पाकर    कुछ   लोग  बेंच  पर   बैठे ,  कुछ   लोग  खड़े - खड़े  गप्पें   लड़ाने  लगे   तो  चंद  शायर   मिजाज़   अपने  दोस्तों   को  शायरी  सुनाने   लगे -  ताज़ी   ग़ज़ल  के  चंद  असार   जो   अभी - अभी  बने  हैं  ,  सुनें ……. ।

                          "   उनकी   ज़ुल्फ़   है  या  है   काली  घटा   ,
                              या   कोई   नागिन   काली  ,
                              उफ़  !  हम  तो   भीग   भी  गए ,
                              बेसुध   भी  हुए 
                              जैसे  कोई  दंस  दे  गया   मुझको
                              इस   बरसात   में ……"
वाह ! वाह !  की  ध्वनि  उठती   ,  इससे   पहले  ही  श्मशान  से  विदाई   का  वक्त  आ  गया  ,  फिर   धीरे - धीरे  लोग  बाहर  निकल  कर   जल्दी - जल्दी अपने  घर  को   चल दिये   …।

लघु कथा - आदमी और जानवर

                 मालिक    की   मार     खा    कर    वह   घर    से   भाग   निकला   ।   इधर  -  उधर    घूमता    हुआ   ,  सड़क   के  अन्य    कुत्तों    से   ,  अपने   आपको   बचाता  ,   वह   एक  मैदान    में   पहुँच    गया    ।                                               
                         मैदान   के   ही    एक   सिरे   पर   ,  एक   घने   पेड़    के   नीचे      बैठ कर  वह   सुस्ताने    लगा    ।   वहाँ    बहुत    अच्छी     ठंडी     हवा    बह     रही   थी   ।  धीरे  -  धीरे   उसे   नींद   आ   गई  ।       वह वहीँ   सो   गया    ।              

                         जब   उसकी    आँख    खुली  ,   सवेरा     होने    को  ही  था  ।    उसे   रात  की   घटना    याद    आई   ।   अचानक   वह   उठा     ,   मैदान   के   चारों     ओर      दौड़ने     लगा   और   फिर    एक    ओर   दौड़   गया   ।   शायद   ,   उसे   याद   आया  ,     आज मालिक   को    अखबार    लाकर   कौन    देगा   ,  नींद   से   जागते   ही     मालिक     आवाज      लागायेगा   ,   मेरी    आवाज    नहीं    सुनकर    उनका    दिल   घबरायेगा ....................  वह    सरपट     दौड़ता     रहा    ।                                                                                    
                आखिरकार    वह   अपने   घर   पहुँच     गया   ।    पहले     उसने     घर  के   चारों     ओर   का चक्कर     लगाया    ,   फिर   दरवाजे    पर    आ   कर    रुका - भौं-भौं ,  देखा   कि     आज    दरवाजा     खुला   ही  रह  गया     है   ,    उसका     मालिक     शांत     भाव     से    कुर्सी    पर     बैठा     है   ।

                 कुछ     क्षण     वह   भी    शांत    बैठा   रहा     ।   अचानक   वह     उठा   और    मालिक   की    गोद   में    आकर   ,  अपना    सिर     मालिक   की    छाती    से  सटा     लिया    ।     मालिक   ने   उसे  प्यार  किया    ,   उसके    सिर     पर    हाथ  फेरा   ,   उसकी    आँखे     भींगने     लगी    ,   मानो   वह   प्रायश्चित  कर   रहा  हो   और   कह   रहा  हो    -    मैं    जानवर   ही   सही   ,   अब    मैं    तुम्हे     अकेला   छोड़   कर    कभी    नहीं  जाऊँगा    ,   कहीं   नहीं    जाऊँगा .....................

जीवन में कभी हार नहीं माननी चाहिए

जीवन में कभी हार नहीं माननी चाहिए। जाने कब वक़्त पलट जाए। जाने कब भाग्य चमक जाए। इसलिए चलते रहना ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए।