आज से ठीक एक सप्ताह बाद 71 वीं स्वाधीनता दिवस मनाई जाएगी। देश के सभी 29 राज्यों और 7 केंद्र शाशित प्रदेशों , सभी जिलों और मुख्यालयों में राष्ट्रीय तिरंगा लहराया जाएगा। बड़े - बड़े , लम्बे - लम्बे भाषण दिए जाएंगे , कुछ अपना बखान होगा , कुछ पुराने वादे दुहराये जाएंगे कुछ नए वादे किये जाएंगे। तिरंगा जब फहराया जाएगा , तिरंगे में लिपटे फूल झड़ेंगे। तिरंगे से फूल नही , ये देश के संतप्त जनता की आँखों के आँसू हैं जो फूल बन गए हैं , ये उन महिलाओं और बेटियों की आँखों के तप्त मोती हैं जिनसे बलात दुष्कर्म किया गया है। ये सरहद पर शहीद हो गए उन वीर शहीद सपूतों के आँखों के आँसू हैं जिन्हे आपने , हमने आश्वाशन दिया था कि हम देश की महिलाओं , बेटियों और बुजुर्गों की देखभाल करेंगे , रक्षा करेंगे, , उन्हें सम्मान देंगे। आपके और हमारे इसी आश्वाशन पर वे आपकी और हम सब की , दुशमनों से हमारी और सरहद की रक्षा में अपना बलिदान दे दिया। पर हमने उन्हें क्या दिया ? हर जगह लूट -खसोट , खून - खराबा , भ्रष्ट राजनीति , भ्रष्ट अफसरसाही , स्त्रियों , बच्चियों , बेटियों से दुर्व्यवहार और बलात्कार ? उस पर तुर्रा यह कि सभी अपनी - अपनी पीठ थप - थापा रहे हैं , तो कोई किसी को शाबाशी दे रहे हैं , अशक्त शाशन की पीठ थपथपाते हैं। यह सब लिखते और कहते हुए मुझे शर्म और ग्लानि हो रही है की हम कहें कि हम सब एक सभ्य देश के नागरिक हैं जहाँ धर्म और मजहब के नाम पर हम एक दूसरे का खून बहाते हैं , क़त्ल कर देते हैं और अपराधी खुले आम घूमते रहते हैं। कोई मजहब और धर्म इन्सानियत से ऊपर नहीं है। सच तो यह है कि मानव जीवन के लिये इन्सानियत ही धर्म और मजहब है।
हम सभी इकहत्तर सालों से स्वतंत्रता दिवस मनाते आ रहे हैं। पर कैसी स्वतंत्रता और कैसी आजादी ? हम सब अभी भी गुलाम ही हैं किसी न किसी रूप में। चाहे सत्ता के कुर्सी के गुलाम हों या अपनी आदतों का , विचारों का ,अपनी हठधर्मिता का । अगर हम कहें कि आजादी मुठ्ठी भर लोगों को मिली तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।सच तो यह है हम सब अब भी एक प्रच्छन्न भय में जी रहे हैं।
दो सौ साल के अंग्रेजी शाशन काल में भी हम टैक्स भरते थे , अब भी भरते हैं और कहीं उससे भी ज्यादा। आज के वर्तमान में आम जन पर तरह - तरह के टैक्स थोपे जाते हैं वहीँ दूसरी ओर हमारे जननायक इससे अछूते हैं। हर तरफ क्राइम का ग्राफ बढ़ा है। मॅहगाई रोज ही छलाँग रही है। लोगों के मुँह से निवाला छिनने लगा है । अनायास ही नोटबंदी का आदेश और उससे उत्पन्न त्रासद स्थिति से लोग आज भी सहमे हैं कि ना जाने कब कौन सा आदेश अनायास ही उद्घोषित हो जाय। बैंकों में न्यूनतम राशि की आड़ में जमाकर्ताओं के खातों से की गई कटौती से लोग परेशान रहे भले ही सरकार के खजाने में करोड़ों की राशि जमा हो गई हो पर लोग खून की आँसू पी कर रह गए।आम जन के मौलिक अधिकार छिन गए हैं। हर तरफ शोषण का जाल बिछ गया है। हर आदमी असुरक्षित नह्सूस कर रहा है। यदि हम सिलसिलेबार बात करें तो हम रेल से शुरू करते हैं जो हमें पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्खिन तक जोड़ती है।
आज रेल का सफर असुरक्षित हो गया है। यद्द्यपि यात्रा के लिए टिकट के दामों में कई प्रकार से वृद्धि की गई है परन्तु यात्रा सुरक्षित और सुखद होगी यह कहना कठिन होगा। समय पर गाड़ीयों का परिचालन तो दूर साफ - सफाई , रेल डिब्बों की स्थिति , घटिया खान - पान , आम यात्रियों की आम सुविधायें , सभी की स्थिति सोचनीय है।रेलवे के प्लेटफॉर्म पर पीने की पानी की अनुलब्धता है , और कहीं कुछ है तो वह भी इक्का - दुक्का। छोटे स्टेशनों पर तो यह भी उपलब्ध नहीं हो पाता है। भले ही टिकट कैंसिलेशन के नाम पर रेल के खजानों में करोड़ों जमा हो गए हों पर सुरक्षा और सुविधाओं का अभाव है। खान - पान की शिकायतें तो आये दिन आती ही रहती हैं।देश में सड़कें हैं पर इनका हाल किसी से छिपा नहीं है जो हम रोज आये दिन देखते हैं।मँहगी शिक्षा और स्वास्थ्य का हाल भी सभी को ज्ञात है। कितने ही स्कूलों के भवन जर्जर हालत में है। कहीं - कहीं स्कूल जाने के लिए रस्सी के सहारे खतरनाक उफनती नदी पार करना पड़ता है क्योंकि उस पर जो पुल पहले बना था ,बहुत पहले बाढ़ की चपेट में बह गया था। सत्ता बदल गई , राजा बदल गए पर वह पुल नहीं बन पाया। देश के तमाम राज्यों की सड़कों का हाल आये दिन समाचार पत्रों और टी वी चैनलों पर देखने को मिल जाता है। काश ! जो पैसा हम अपनी सत्ता की कुर्सी पाने के लिए ताबरतोड़ प्रचार - प्रसार और बैनर में करते हैं उसका कुछ अंश ही इन छोटे - छोटे कामों में लगा देते तो कुछ विकास दिखता।हर एक चुनाव में करोड़ों खर्च हो जाते हैं। हर एक पार्टी बस केवल सत्ता की कुर्सी को पाने को बेहिसाब धन का खर्च करती है और अपनी सारी शक्ति लगा देती है , पर वही शक्ति समाज में व्याप्त कुरीति और समाज सुधारने में लगा देती , शिक्षा और स्वास्थ्य सुधर में अपना योगदान देती तो शायद समाज के साथ - साथ उनका भी भला ही होता। इतनी सारी पार्टियां हैं सभी बस अपना उल्लू सीधा करने में लगे हैं। सभी को बस सत्ता की चाभी चाहिए।
हम आज के इक्कीसवीं सदी में भी लाश को कंधे पर ढ़ोने को विवश हैं। कितने ही ऐसे समाचार मिलते रहते हैं। हाल - फिलहाल भी अपने मृत भाई के लाश को अपने घर तक ले जाने के लिए अस्पताल परिसर में लोगों के सामने हाथ भी फैलाये। पर जब कोई व्यवस्था नहीं हुई तो यह स्वयं के कन्धों पर ले जाने लगा तभी किसी किन्नर ने जिसे हम समाज से अलग मान बैठे हैं , उसने देखा और इंसानियत की मिसाल पेश की। उसने उसे इस हाल में देख कर एम्बुलेंस का प्रबंध कराया। हमारी संवेदनायें मृतप्राय हो गईं हैं। सरकारी अस्पतालों का हाल क्या है यह बताने और कहने की जरूरत नहीं है।समुचित इलाज और दवाईयों के अभाव में कितने नौनिहाल और बीमार दम तोड़ देते हैं।गोरखपुर के अस्पताल का वाकया अभी पुराना नहीं हुआ है।
काश ! हर हाथ को मोबाइल पहुँचाने से पहले अस्पतालों में दवाईयों का समुचित प्रबंध होता , काश ! शत - प्रतिशत शौचालय की व्यवस्था कराते तो आज रेलवे लाइनों के किनारे , खेत या किसी नदी , तालाब और पोखरे पर महिलाओं , बच्चों - बच्चियों , पुरुषों को शौच के लिए नहीं जाना पड़ता और ना ही उन्हें शर्मिन्दा ही होना पड़ता।
आज हम विकास की बात करते हैं - किसका विकास हुआ ?यही कि हर हाथ में मोबाइल पहुँच गया। क्या शहरों और स्टेशनों के नाम बदल जाने , ऊँची - ऊँची अट्टालिकायें और बड़े - बड़े मॉल खड़े कर देने को ही विकास कहते हैं ? रोज ही किसान देश में कहीं न कहीं आत्महत्या करते हैं।देश के विकास के लिए सभी वर्गों के लिए समुचित व सरल , सुलभ शिक्षा , स्वास्थ्य सेवा और सबके समान रूप से विकास से होगा। शिक्षित , सक्षम और कुशल नागरिकों से होगा। जब वर्तमान ही सुघर नहीं होगा तो भविष्य की मधुरता की कल्पना नहीं की जा सकती।
विकास हुआ - पूँजीपतियों का। किसान डीज़ल - पेट्रोल की खेती नहीं करते। मोबाइल खेतों में नहीं उगाये जाते - यह तो बड़े - बड़े पूँजीपतियों के कारखानों में बनते हैं।
लेकिन हम यह बात भी नहीं झुठला सकते कि विकास नहीं हुआ है। आज हम तकनीक के युग में जी रहे हैं। जो चीज कभी हमारे पहुँच से बाहर थे अब हम उसका उपभोग आसानी से कर रहे हैं। शहरों को दूसरे शहरों से जोड़ा गया है। आवागमन की सुविधाएं बढ़ी हैं। सड़कें अति चौड़ी की गईं हैं। ट्रांसपोर्ट के साधन बढाए गए हैं। किन्तु इन सब के बाबजूद भी आम जन की जो मौलिक आवश्यकतायें हैं - शिक्षा , स्वास्थ्य , रोजगार , मकान वो अब भी बदहाल स्थिति में है। आज भी देश के कई हलकों के लोगों को भरपेट भोजन नहीं मिलता है जिस बात को हम तर्क और कुतर्क से झुठला दते हैं। मंडावली और ग़ाज़ियाबाद की घटनाये इसकी प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। करोड़ों लोगों के पास अपना घर नहीं है। वे या तो किराए के मकान में रहते हैं या फिर फुटपाथों पर रहने को मजबूर हैं।
दिनों - दिन शिक्षा मँहगी हो रही है , शिक्षा का बाजारीकरण हो रहा है ,स्वास्थ्य सेवायें लचर हो रही हैं , बच्चे कुपोषण के शिकार हो रहे हैं , रोजगार नहीं है तो रोटी भी नहीं है। शिक्षित युवा भटक रहे हैं। समाज के हर वर्ग के लोगों के चरित्र का नैतिक पतन हो रहा है।रोज ही महिलाओं और बच्चियों से बलात्कार हो रहा है।ताज्जुब यह है कि इस कुकृत्य में बड़े - बड़े सफेदपश शामिल हैं। यह बताने की जरूरत नहीं है कि निर्भया काण्ड के दोषियों को उच्चतम न्यायालय से फाँसी की सजा सुनाने के बाद भी अभी तक फाँसी नहीं हुई है। इसलिए इस तरह के अपराध बार - बार दुहराए जाते हैं। अपराधियों में क़ानून का भय नहीं है। कोई भी ऐसा राज्य नहीं है जहाँ इस प्रकार के जघन्य कृत्य नहीं हुए हों या नहीं हो रहे हों। बलात्कार और सामूहिक बलात्कार तो शर्म की सारी हदें पार कर गई है। उस पर हमारे कतिपय नेताओं के अजब - गजब के बोल इस अपराध को बढ़ावा ही देते हैं। कहीं - कहीं इन अपराधियों को राजनितिक संरक्षण भी प्राप्त है। कठुआ की घटनायें , बिहार के गया की घटनायें ,उत्तरप्रदेश के उन्नाव की घटनायें तथा और भी कई ऐसी घटनायें इस बात का प्रमाण हैं। अभी - अभी बिहार के मुजफ्फरपुर और उत्तर प्रदेश के देवरिया की घटनायें तो यही बयाँ कर रही हैं। आज की बेटियाँ , महिलायें कहीं भी सुरक्षित नहीं है।
युवाओं के लिए समुचित रोजगार नहीं है। रोजगार के नाम पर उन्हें धक्के मिलते हैं , तिरस्कार मिलते हैं। बाज़ीगरी के आँकड़े पेश करना और सच्चाई अलग है। आज देश से प्रतिभा का पलायन क्यों हो रहा है इस बात को समझना होगा। शिक्षित होना तो सब चाहते हैं , अच्छी शिक्षा भी चाहते हैं। परन्तु दिनों दिन मँहगी होती शिक्षा , बाजारीकरण होती शिक्षा और फिर आरक्षण की मार। वोट की राजनीति छोड़ कर हमें सोचना होगा कि आरक्षण इस देश के लिये कोढ़ के सामान होता जा रहा है। आये दिन कहीं न कहीं कोई न कोई वर्ग आरक्षण पाने को आंदोलन पर उतर आता है जिससे देश का करोड़ों का नुक्सान होता है। आपस में एक दूसरे के प्रति नफरत , ईर्ष्या ,द्वेष को बढ़ावा देता है। आरक्षण भस्मासुर की तरह है जो वोट और कुर्सी के लालच के साये में फलती - फूलती है। इससे देश का विकास अवरुद्ध होता है। सच तो यह भी है आरक्षण से आरक्षित वर्ग का मानसिक विकास रूक जाता है , उनकी अपनी प्रतिभा कुंठित हो जाती है। जीवन में संघर्ष करने की क्षमता में ह्रास होता है। इससे उनका ही नुकसान होता है।
वोट की राजनीति लोगों को कभी धर्म के नाम पर , कभी ऊँची जाती ,अनुसूचित जाती , जनजाति तो कभी पिछड़ा वर्ग , अति पिछड़ा वर्ग , दलित जाति ,अति दलित जाति , महादलित जाति , जाने कितने जाति और वर्गों में समाज को विभाजित किया जाता है। इस तरह समाज का अहित ही होता है।
विगत 71 वर्षों से समस्यायें जस के तस बरकरार हैं या हम कहें की और भी विकराल और विकृत हो रही हैं। जरा सोचिये इन बीते वर्षों से लेकर आज तक हम उपलब्धियां ही गिनाते रहे हैं , किन्तु उन अभिशप्त महिलाओं , बेटियों और अशक्तों के लिए , जिन्होंने अमानवीय यातनायें झेली हैं और झेल रहे हैं , जिनके जीवन में अन्धेरा ही अन्धेरा हो , रोशनी का एक कतरा भी दिखाई नहीं दे रहा हो , फुटपाथों पर ही जीवन गुजारने को विवश हों , समाज और शाशन द्वारा भी उपेक्षित हो , आजादी के क्या मायने होंगे ? काश ! कि वोट की राजनीति छोड़ कर , सारी पार्टियां एक जुट हो कर इन समस्याओं का समाधान ढूढ़ती तो देश का नक्शा ही बदल जाता।
कहते हैं अपना दीदा किसी को नहीं दिखता है। अपना दीदा देखने के लिये आईने की जरूरत होती है। कोई भी सरकार हो , किसी की भी हो या फिर कोई व्यक्ति विशेष ही हो उसे तो चाहिए आईना देखे अगर कोई दिखाता हो। उसे तोड़ना नहीं चाहिए। सुघर शब्दों की स्वतंत्रता जब तक जीवित रहेगी तब तक देश उतना ही साफ - सुथरा , गौरवान्वित और स्वतन्त्र एयर आज़ाद रहेगा। तभी तिरंगे का सच्चा सम्मान होगा
अंत में संत कबीर के शब्दों में ---
" निन्दक नियरे राखिये , आँगन कुटी छवाय ,
बिन पानी , साबुन बिना , निर्मल करे सुभाय। "
' जय हिन्द , जय भारत
नोट : - प्रकाशित
हम सभी इकहत्तर सालों से स्वतंत्रता दिवस मनाते आ रहे हैं। पर कैसी स्वतंत्रता और कैसी आजादी ? हम सब अभी भी गुलाम ही हैं किसी न किसी रूप में। चाहे सत्ता के कुर्सी के गुलाम हों या अपनी आदतों का , विचारों का ,अपनी हठधर्मिता का । अगर हम कहें कि आजादी मुठ्ठी भर लोगों को मिली तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।सच तो यह है हम सब अब भी एक प्रच्छन्न भय में जी रहे हैं।
दो सौ साल के अंग्रेजी शाशन काल में भी हम टैक्स भरते थे , अब भी भरते हैं और कहीं उससे भी ज्यादा। आज के वर्तमान में आम जन पर तरह - तरह के टैक्स थोपे जाते हैं वहीँ दूसरी ओर हमारे जननायक इससे अछूते हैं। हर तरफ क्राइम का ग्राफ बढ़ा है। मॅहगाई रोज ही छलाँग रही है। लोगों के मुँह से निवाला छिनने लगा है । अनायास ही नोटबंदी का आदेश और उससे उत्पन्न त्रासद स्थिति से लोग आज भी सहमे हैं कि ना जाने कब कौन सा आदेश अनायास ही उद्घोषित हो जाय। बैंकों में न्यूनतम राशि की आड़ में जमाकर्ताओं के खातों से की गई कटौती से लोग परेशान रहे भले ही सरकार के खजाने में करोड़ों की राशि जमा हो गई हो पर लोग खून की आँसू पी कर रह गए।आम जन के मौलिक अधिकार छिन गए हैं। हर तरफ शोषण का जाल बिछ गया है। हर आदमी असुरक्षित नह्सूस कर रहा है। यदि हम सिलसिलेबार बात करें तो हम रेल से शुरू करते हैं जो हमें पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्खिन तक जोड़ती है।
आज रेल का सफर असुरक्षित हो गया है। यद्द्यपि यात्रा के लिए टिकट के दामों में कई प्रकार से वृद्धि की गई है परन्तु यात्रा सुरक्षित और सुखद होगी यह कहना कठिन होगा। समय पर गाड़ीयों का परिचालन तो दूर साफ - सफाई , रेल डिब्बों की स्थिति , घटिया खान - पान , आम यात्रियों की आम सुविधायें , सभी की स्थिति सोचनीय है।रेलवे के प्लेटफॉर्म पर पीने की पानी की अनुलब्धता है , और कहीं कुछ है तो वह भी इक्का - दुक्का। छोटे स्टेशनों पर तो यह भी उपलब्ध नहीं हो पाता है। भले ही टिकट कैंसिलेशन के नाम पर रेल के खजानों में करोड़ों जमा हो गए हों पर सुरक्षा और सुविधाओं का अभाव है। खान - पान की शिकायतें तो आये दिन आती ही रहती हैं।देश में सड़कें हैं पर इनका हाल किसी से छिपा नहीं है जो हम रोज आये दिन देखते हैं।मँहगी शिक्षा और स्वास्थ्य का हाल भी सभी को ज्ञात है। कितने ही स्कूलों के भवन जर्जर हालत में है। कहीं - कहीं स्कूल जाने के लिए रस्सी के सहारे खतरनाक उफनती नदी पार करना पड़ता है क्योंकि उस पर जो पुल पहले बना था ,बहुत पहले बाढ़ की चपेट में बह गया था। सत्ता बदल गई , राजा बदल गए पर वह पुल नहीं बन पाया। देश के तमाम राज्यों की सड़कों का हाल आये दिन समाचार पत्रों और टी वी चैनलों पर देखने को मिल जाता है। काश ! जो पैसा हम अपनी सत्ता की कुर्सी पाने के लिए ताबरतोड़ प्रचार - प्रसार और बैनर में करते हैं उसका कुछ अंश ही इन छोटे - छोटे कामों में लगा देते तो कुछ विकास दिखता।हर एक चुनाव में करोड़ों खर्च हो जाते हैं। हर एक पार्टी बस केवल सत्ता की कुर्सी को पाने को बेहिसाब धन का खर्च करती है और अपनी सारी शक्ति लगा देती है , पर वही शक्ति समाज में व्याप्त कुरीति और समाज सुधारने में लगा देती , शिक्षा और स्वास्थ्य सुधर में अपना योगदान देती तो शायद समाज के साथ - साथ उनका भी भला ही होता। इतनी सारी पार्टियां हैं सभी बस अपना उल्लू सीधा करने में लगे हैं। सभी को बस सत्ता की चाभी चाहिए।
हम आज के इक्कीसवीं सदी में भी लाश को कंधे पर ढ़ोने को विवश हैं। कितने ही ऐसे समाचार मिलते रहते हैं। हाल - फिलहाल भी अपने मृत भाई के लाश को अपने घर तक ले जाने के लिए अस्पताल परिसर में लोगों के सामने हाथ भी फैलाये। पर जब कोई व्यवस्था नहीं हुई तो यह स्वयं के कन्धों पर ले जाने लगा तभी किसी किन्नर ने जिसे हम समाज से अलग मान बैठे हैं , उसने देखा और इंसानियत की मिसाल पेश की। उसने उसे इस हाल में देख कर एम्बुलेंस का प्रबंध कराया। हमारी संवेदनायें मृतप्राय हो गईं हैं। सरकारी अस्पतालों का हाल क्या है यह बताने और कहने की जरूरत नहीं है।समुचित इलाज और दवाईयों के अभाव में कितने नौनिहाल और बीमार दम तोड़ देते हैं।गोरखपुर के अस्पताल का वाकया अभी पुराना नहीं हुआ है।
काश ! हर हाथ को मोबाइल पहुँचाने से पहले अस्पतालों में दवाईयों का समुचित प्रबंध होता , काश ! शत - प्रतिशत शौचालय की व्यवस्था कराते तो आज रेलवे लाइनों के किनारे , खेत या किसी नदी , तालाब और पोखरे पर महिलाओं , बच्चों - बच्चियों , पुरुषों को शौच के लिए नहीं जाना पड़ता और ना ही उन्हें शर्मिन्दा ही होना पड़ता।
आज हम विकास की बात करते हैं - किसका विकास हुआ ?यही कि हर हाथ में मोबाइल पहुँच गया। क्या शहरों और स्टेशनों के नाम बदल जाने , ऊँची - ऊँची अट्टालिकायें और बड़े - बड़े मॉल खड़े कर देने को ही विकास कहते हैं ? रोज ही किसान देश में कहीं न कहीं आत्महत्या करते हैं।देश के विकास के लिए सभी वर्गों के लिए समुचित व सरल , सुलभ शिक्षा , स्वास्थ्य सेवा और सबके समान रूप से विकास से होगा। शिक्षित , सक्षम और कुशल नागरिकों से होगा। जब वर्तमान ही सुघर नहीं होगा तो भविष्य की मधुरता की कल्पना नहीं की जा सकती।
विकास हुआ - पूँजीपतियों का। किसान डीज़ल - पेट्रोल की खेती नहीं करते। मोबाइल खेतों में नहीं उगाये जाते - यह तो बड़े - बड़े पूँजीपतियों के कारखानों में बनते हैं।
लेकिन हम यह बात भी नहीं झुठला सकते कि विकास नहीं हुआ है। आज हम तकनीक के युग में जी रहे हैं। जो चीज कभी हमारे पहुँच से बाहर थे अब हम उसका उपभोग आसानी से कर रहे हैं। शहरों को दूसरे शहरों से जोड़ा गया है। आवागमन की सुविधाएं बढ़ी हैं। सड़कें अति चौड़ी की गईं हैं। ट्रांसपोर्ट के साधन बढाए गए हैं। किन्तु इन सब के बाबजूद भी आम जन की जो मौलिक आवश्यकतायें हैं - शिक्षा , स्वास्थ्य , रोजगार , मकान वो अब भी बदहाल स्थिति में है। आज भी देश के कई हलकों के लोगों को भरपेट भोजन नहीं मिलता है जिस बात को हम तर्क और कुतर्क से झुठला दते हैं। मंडावली और ग़ाज़ियाबाद की घटनाये इसकी प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। करोड़ों लोगों के पास अपना घर नहीं है। वे या तो किराए के मकान में रहते हैं या फिर फुटपाथों पर रहने को मजबूर हैं।
दिनों - दिन शिक्षा मँहगी हो रही है , शिक्षा का बाजारीकरण हो रहा है ,स्वास्थ्य सेवायें लचर हो रही हैं , बच्चे कुपोषण के शिकार हो रहे हैं , रोजगार नहीं है तो रोटी भी नहीं है। शिक्षित युवा भटक रहे हैं। समाज के हर वर्ग के लोगों के चरित्र का नैतिक पतन हो रहा है।रोज ही महिलाओं और बच्चियों से बलात्कार हो रहा है।ताज्जुब यह है कि इस कुकृत्य में बड़े - बड़े सफेदपश शामिल हैं। यह बताने की जरूरत नहीं है कि निर्भया काण्ड के दोषियों को उच्चतम न्यायालय से फाँसी की सजा सुनाने के बाद भी अभी तक फाँसी नहीं हुई है। इसलिए इस तरह के अपराध बार - बार दुहराए जाते हैं। अपराधियों में क़ानून का भय नहीं है। कोई भी ऐसा राज्य नहीं है जहाँ इस प्रकार के जघन्य कृत्य नहीं हुए हों या नहीं हो रहे हों। बलात्कार और सामूहिक बलात्कार तो शर्म की सारी हदें पार कर गई है। उस पर हमारे कतिपय नेताओं के अजब - गजब के बोल इस अपराध को बढ़ावा ही देते हैं। कहीं - कहीं इन अपराधियों को राजनितिक संरक्षण भी प्राप्त है। कठुआ की घटनायें , बिहार के गया की घटनायें ,उत्तरप्रदेश के उन्नाव की घटनायें तथा और भी कई ऐसी घटनायें इस बात का प्रमाण हैं। अभी - अभी बिहार के मुजफ्फरपुर और उत्तर प्रदेश के देवरिया की घटनायें तो यही बयाँ कर रही हैं। आज की बेटियाँ , महिलायें कहीं भी सुरक्षित नहीं है।
युवाओं के लिए समुचित रोजगार नहीं है। रोजगार के नाम पर उन्हें धक्के मिलते हैं , तिरस्कार मिलते हैं। बाज़ीगरी के आँकड़े पेश करना और सच्चाई अलग है। आज देश से प्रतिभा का पलायन क्यों हो रहा है इस बात को समझना होगा। शिक्षित होना तो सब चाहते हैं , अच्छी शिक्षा भी चाहते हैं। परन्तु दिनों दिन मँहगी होती शिक्षा , बाजारीकरण होती शिक्षा और फिर आरक्षण की मार। वोट की राजनीति छोड़ कर हमें सोचना होगा कि आरक्षण इस देश के लिये कोढ़ के सामान होता जा रहा है। आये दिन कहीं न कहीं कोई न कोई वर्ग आरक्षण पाने को आंदोलन पर उतर आता है जिससे देश का करोड़ों का नुक्सान होता है। आपस में एक दूसरे के प्रति नफरत , ईर्ष्या ,द्वेष को बढ़ावा देता है। आरक्षण भस्मासुर की तरह है जो वोट और कुर्सी के लालच के साये में फलती - फूलती है। इससे देश का विकास अवरुद्ध होता है। सच तो यह भी है आरक्षण से आरक्षित वर्ग का मानसिक विकास रूक जाता है , उनकी अपनी प्रतिभा कुंठित हो जाती है। जीवन में संघर्ष करने की क्षमता में ह्रास होता है। इससे उनका ही नुकसान होता है।
वोट की राजनीति लोगों को कभी धर्म के नाम पर , कभी ऊँची जाती ,अनुसूचित जाती , जनजाति तो कभी पिछड़ा वर्ग , अति पिछड़ा वर्ग , दलित जाति ,अति दलित जाति , महादलित जाति , जाने कितने जाति और वर्गों में समाज को विभाजित किया जाता है। इस तरह समाज का अहित ही होता है।
विगत 71 वर्षों से समस्यायें जस के तस बरकरार हैं या हम कहें की और भी विकराल और विकृत हो रही हैं। जरा सोचिये इन बीते वर्षों से लेकर आज तक हम उपलब्धियां ही गिनाते रहे हैं , किन्तु उन अभिशप्त महिलाओं , बेटियों और अशक्तों के लिए , जिन्होंने अमानवीय यातनायें झेली हैं और झेल रहे हैं , जिनके जीवन में अन्धेरा ही अन्धेरा हो , रोशनी का एक कतरा भी दिखाई नहीं दे रहा हो , फुटपाथों पर ही जीवन गुजारने को विवश हों , समाज और शाशन द्वारा भी उपेक्षित हो , आजादी के क्या मायने होंगे ? काश ! कि वोट की राजनीति छोड़ कर , सारी पार्टियां एक जुट हो कर इन समस्याओं का समाधान ढूढ़ती तो देश का नक्शा ही बदल जाता।
कहते हैं अपना दीदा किसी को नहीं दिखता है। अपना दीदा देखने के लिये आईने की जरूरत होती है। कोई भी सरकार हो , किसी की भी हो या फिर कोई व्यक्ति विशेष ही हो उसे तो चाहिए आईना देखे अगर कोई दिखाता हो। उसे तोड़ना नहीं चाहिए। सुघर शब्दों की स्वतंत्रता जब तक जीवित रहेगी तब तक देश उतना ही साफ - सुथरा , गौरवान्वित और स्वतन्त्र एयर आज़ाद रहेगा। तभी तिरंगे का सच्चा सम्मान होगा
अंत में संत कबीर के शब्दों में ---
" निन्दक नियरे राखिये , आँगन कुटी छवाय ,
बिन पानी , साबुन बिना , निर्मल करे सुभाय। "
' जय हिन्द , जय भारत
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