Wednesday, August 8, 2018

निन्दक नियरे राखिये

                   आज से ठीक एक सप्ताह बाद 71 वीं स्वाधीनता दिवस मनाई जाएगी। देश के सभी 29  राज्यों  और 7 केंद्र शाशित प्रदेशों , सभी जिलों और मुख्यालयों में राष्ट्रीय तिरंगा लहराया जाएगा। बड़े - बड़े , लम्बे - लम्बे भाषण दिए जाएंगे , कुछ अपना बखान होगा , कुछ  पुराने वादे दुहराये जाएंगे  कुछ  नए वादे  किये जाएंगे। तिरंगा जब फहराया जाएगा , तिरंगे में  लिपटे फूल झड़ेंगे। तिरंगे से फूल नही , ये देश के संतप्त जनता की आँखों के आँसू हैं जो फूल बन गए हैं , ये उन महिलाओं और बेटियों  की आँखों के तप्त मोती हैं जिनसे  बलात दुष्कर्म किया गया है। ये  सरहद पर शहीद हो गए उन वीर शहीद सपूतों के आँखों के आँसू हैं जिन्हे  आपने , हमने आश्वाशन दिया था कि हम देश की महिलाओं   , बेटियों  और बुजुर्गों की देखभाल करेंगे  , रक्षा करेंगे, , उन्हें सम्मान देंगे।  आपके और हमारे इसी आश्वाशन पर वे आपकी और हम सब की , दुशमनों से हमारी और सरहद की रक्षा में अपना बलिदान दे दिया। पर हमने उन्हें क्या दिया  ?  हर जगह लूट -खसोट , खून - खराबा , भ्रष्ट राजनीति , भ्रष्ट अफसरसाही , स्त्रियों , बच्चियों , बेटियों से दुर्व्यवहार और बलात्कार  ? उस पर तुर्रा यह कि सभी अपनी - अपनी पीठ थप - थापा  रहे हैं  , तो कोई किसी को शाबाशी दे रहे हैं  , अशक्त शाशन की पीठ थपथपाते हैं। यह सब लिखते और कहते हुए मुझे शर्म और ग्लानि हो रही है की हम कहें कि हम सब एक सभ्य देश के नागरिक हैं जहाँ धर्म और मजहब के नाम पर हम एक दूसरे का खून बहाते हैं , क़त्ल कर देते हैं और अपराधी खुले आम घूमते रहते हैं। कोई मजहब और धर्म इन्सानियत से ऊपर नहीं है। सच तो यह है कि मानव जीवन के लिये इन्सानियत ही धर्म  और मजहब है।
                     हम सभी इकहत्तर सालों से स्वतंत्रता दिवस मनाते आ रहे हैं। पर कैसी स्वतंत्रता और कैसी आजादी ? हम  सब अभी भी गुलाम ही हैं किसी न किसी रूप में। चाहे सत्ता के कुर्सी के गुलाम हों या अपनी आदतों का  , विचारों का ,अपनी हठधर्मिता का । अगर हम कहें कि आजादी मुठ्ठी भर लोगों को मिली तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।सच तो यह है हम सब अब भी एक प्रच्छन्न भय में जी रहे हैं।
                     दो सौ साल के अंग्रेजी शाशन काल में भी हम टैक्स भरते थे  , अब भी भरते हैं  और कहीं उससे भी ज्यादा। आज के वर्तमान में आम जन पर तरह - तरह के टैक्स थोपे जाते हैं वहीँ दूसरी ओर  हमारे जननायक इससे अछूते हैं। हर तरफ क्राइम का ग्राफ बढ़ा है। मॅहगाई  रोज ही छलाँग रही है। लोगों के मुँह से निवाला  छिनने लगा है । अनायास ही नोटबंदी का आदेश  और उससे उत्पन्न त्रासद स्थिति से लोग आज भी सहमे हैं कि ना जाने कब कौन सा आदेश अनायास ही उद्घोषित हो जाय। बैंकों में न्यूनतम राशि की आड़ में  जमाकर्ताओं  के खातों से की गई कटौती से लोग परेशान रहे भले ही सरकार के खजाने में करोड़ों की राशि जमा हो गई हो  पर लोग खून की आँसू पी कर रह गए।आम जन के मौलिक अधिकार छिन गए हैं। हर तरफ शोषण का जाल बिछ गया है। हर आदमी असुरक्षित नह्सूस कर रहा है।  यदि हम सिलसिलेबार बात करें तो हम रेल से शुरू करते हैं जो हमें पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्खिन तक जोड़ती है।
                               आज रेल का सफर असुरक्षित हो गया है। यद्द्यपि यात्रा के लिए टिकट के दामों में कई प्रकार से वृद्धि की गई है  परन्तु  यात्रा  सुरक्षित और सुखद होगी यह कहना कठिन होगा। समय पर गाड़ीयों  का परिचालन  तो दूर साफ - सफाई , रेल डिब्बों की स्थिति , घटिया खान - पान , आम यात्रियों की आम सुविधायें  , सभी की स्थिति सोचनीय है।रेलवे के प्लेटफॉर्म पर पीने की पानी की अनुलब्धता है  , और कहीं कुछ है तो वह भी इक्का - दुक्का। छोटे स्टेशनों पर तो यह भी उपलब्ध नहीं हो पाता है। भले ही टिकट कैंसिलेशन के नाम पर रेल के खजानों में करोड़ों जमा हो गए हों पर सुरक्षा और सुविधाओं का अभाव है। खान - पान की शिकायतें तो आये दिन आती ही रहती हैं।देश में सड़कें हैं पर इनका हाल किसी से छिपा नहीं है जो हम रोज आये दिन देखते हैं।मँहगी शिक्षा और स्वास्थ्य का हाल भी सभी को ज्ञात है। कितने ही स्कूलों के भवन जर्जर हालत में है। कहीं - कहीं स्कूल जाने के लिए  रस्सी के सहारे खतरनाक उफनती नदी पार करना पड़ता है क्योंकि उस पर जो पुल पहले बना था ,बहुत पहले बाढ़ की चपेट में बह गया था। सत्ता बदल गई , राजा बदल गए पर वह पुल नहीं  बन पाया। देश के तमाम राज्यों की सड़कों का हाल आये दिन समाचार पत्रों और टी वी चैनलों पर देखने को मिल जाता है। काश ! जो पैसा हम अपनी सत्ता की कुर्सी  पाने के लिए ताबरतोड़ प्रचार  - प्रसार  और बैनर में करते हैं उसका कुछ अंश ही इन छोटे - छोटे कामों में लगा देते तो कुछ विकास दिखता।हर एक चुनाव में करोड़ों खर्च हो जाते हैं।   हर एक पार्टी बस केवल  सत्ता की कुर्सी  को पाने को बेहिसाब धन का खर्च करती है और अपनी सारी  शक्ति लगा देती है , पर वही शक्ति समाज में व्याप्त कुरीति और समाज सुधारने में लगा देती ,  शिक्षा और स्वास्थ्य सुधर में अपना योगदान देती तो शायद समाज के साथ - साथ उनका भी भला ही होता। इतनी सारी पार्टियां हैं सभी बस अपना उल्लू सीधा करने में लगे हैं। सभी को बस सत्ता की चाभी चाहिए।
                       हम आज के इक्कीसवीं सदी में भी लाश को कंधे पर ढ़ोने को विवश हैं। कितने ही ऐसे समाचार मिलते रहते हैं। हाल - फिलहाल भी अपने मृत भाई के लाश को अपने घर तक ले जाने के लिए अस्पताल परिसर में लोगों के सामने हाथ भी फैलाये। पर जब कोई व्यवस्था नहीं हुई तो यह स्वयं के कन्धों   पर ले जाने लगा तभी  किसी किन्नर ने जिसे हम समाज से अलग मान बैठे हैं  , उसने देखा और  इंसानियत की मिसाल पेश की।  उसने उसे इस हाल में देख कर  एम्बुलेंस का प्रबंध कराया। हमारी संवेदनायें मृतप्राय हो गईं हैं। सरकारी  अस्पतालों का हाल क्या है यह बताने और कहने  की जरूरत नहीं है।समुचित इलाज और दवाईयों के अभाव में कितने नौनिहाल और बीमार दम तोड़ देते हैं।गोरखपुर के अस्पताल का वाकया अभी पुराना नहीं हुआ है।
                   काश ! हर हाथ को मोबाइल पहुँचाने से पहले  अस्पतालों में दवाईयों का समुचित प्रबंध होता  , काश ! शत  - प्रतिशत शौचालय की व्यवस्था कराते तो आज रेलवे लाइनों के किनारे , खेत  या किसी नदी , तालाब और पोखरे पर महिलाओं , बच्चों  - बच्चियों , पुरुषों को शौच के लिए नहीं जाना पड़ता और ना ही उन्हें शर्मिन्दा ही होना पड़ता।
                    आज हम विकास की बात करते हैं - किसका विकास हुआ ?यही कि हर हाथ में मोबाइल पहुँच गया। क्या शहरों और स्टेशनों के नाम बदल जाने , ऊँची - ऊँची अट्टालिकायें  और बड़े - बड़े मॉल खड़े कर देने को ही विकास कहते हैं ? रोज ही किसान  देश में कहीं न कहीं आत्महत्या करते हैं।देश के विकास के लिए सभी वर्गों के लिए समुचित व  सरल ,  सुलभ  शिक्षा , स्वास्थ्य सेवा  और सबके समान रूप से विकास से होगा। शिक्षित , सक्षम और कुशल नागरिकों से होगा। जब वर्तमान ही सुघर नहीं होगा तो भविष्य की मधुरता की कल्पना नहीं की जा सकती।
                     विकास हुआ - पूँजीपतियों का। किसान डीज़ल - पेट्रोल  की खेती नहीं करते। मोबाइल खेतों में नहीं उगाये जाते - यह तो बड़े - बड़े पूँजीपतियों के कारखानों में बनते हैं।
                     लेकिन हम यह बात भी नहीं झुठला सकते  कि विकास नहीं हुआ है। आज हम तकनीक के युग में जी रहे हैं। जो चीज कभी हमारे पहुँच से बाहर थे अब हम उसका उपभोग आसानी से कर रहे हैं। शहरों  को दूसरे शहरों से जोड़ा गया है।  आवागमन की सुविधाएं बढ़ी हैं। सड़कें अति चौड़ी की गईं हैं। ट्रांसपोर्ट के साधन बढाए गए हैं। किन्तु इन सब के बाबजूद भी आम जन की  जो मौलिक आवश्यकतायें हैं - शिक्षा , स्वास्थ्य  , रोजगार , मकान वो अब भी बदहाल स्थिति में है। आज भी देश के कई हलकों के लोगों को भरपेट भोजन नहीं मिलता है  जिस बात को हम तर्क और कुतर्क से झुठला दते हैं। मंडावली और ग़ाज़ियाबाद की  घटनाये इसकी प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। करोड़ों लोगों के पास अपना घर नहीं है।  वे या तो किराए के मकान में रहते हैं या फिर फुटपाथों पर रहने को मजबूर हैं।
                      दिनों - दिन शिक्षा मँहगी हो रही है ,  शिक्षा का बाजारीकरण हो रहा है ,स्वास्थ्य सेवायें  लचर हो रही हैं , बच्चे कुपोषण के शिकार हो रहे हैं , रोजगार नहीं है तो रोटी भी नहीं है। शिक्षित युवा भटक रहे हैं। समाज के हर वर्ग के लोगों  के चरित्र का नैतिक पतन हो रहा है।रोज ही महिलाओं और बच्चियों से बलात्कार हो रहा है।ताज्जुब  यह है कि इस कुकृत्य में बड़े - बड़े सफेदपश शामिल हैं। यह बताने की जरूरत नहीं है कि निर्भया काण्ड के दोषियों को उच्चतम न्यायालय से फाँसी की सजा सुनाने के बाद भी अभी तक फाँसी नहीं हुई है। इसलिए इस तरह के अपराध बार - बार दुहराए जाते हैं। अपराधियों में क़ानून का भय नहीं है। कोई भी ऐसा राज्य नहीं है जहाँ इस प्रकार के जघन्य कृत्य नहीं हुए हों या नहीं हो रहे हों। बलात्कार और सामूहिक बलात्कार तो शर्म की सारी हदें पार कर गई है। उस पर हमारे कतिपय नेताओं के अजब - गजब के  बोल इस अपराध को बढ़ावा ही देते हैं। कहीं - कहीं इन अपराधियों को राजनितिक संरक्षण भी प्राप्त है। कठुआ की घटनायें  , बिहार के गया की घटनायें ,उत्तरप्रदेश के उन्नाव की घटनायें तथा और भी कई ऐसी घटनायें इस बात का प्रमाण हैं। अभी - अभी बिहार के मुजफ्फरपुर और उत्तर प्रदेश के देवरिया की घटनायें तो यही बयाँ कर रही हैं। आज की बेटियाँ  , महिलायें कहीं भी सुरक्षित नहीं है।
                          युवाओं के लिए समुचित रोजगार नहीं है। रोजगार के नाम पर  उन्हें धक्के मिलते हैं , तिरस्कार मिलते हैं। बाज़ीगरी के  आँकड़े पेश करना और सच्चाई अलग  है। आज देश से प्रतिभा का पलायन  क्यों हो रहा है इस बात को समझना होगा। शिक्षित होना तो सब चाहते हैं , अच्छी शिक्षा भी चाहते हैं। परन्तु दिनों दिन मँहगी होती शिक्षा , बाजारीकरण होती शिक्षा और फिर आरक्षण की मार। वोट की राजनीति छोड़ कर हमें सोचना होगा कि आरक्षण इस देश के लिये कोढ़ के सामान होता जा रहा है। आये दिन कहीं न कहीं कोई न कोई वर्ग आरक्षण पाने को आंदोलन पर उतर आता है जिससे देश का करोड़ों का नुक्सान होता है। आपस में एक दूसरे के प्रति नफरत , ईर्ष्या ,द्वेष को बढ़ावा  देता  है। आरक्षण भस्मासुर की तरह है  जो वोट और कुर्सी के लालच के साये में फलती - फूलती है। इससे देश का विकास अवरुद्ध होता है। सच तो यह भी है आरक्षण से आरक्षित वर्ग का मानसिक विकास रूक जाता है , उनकी अपनी प्रतिभा कुंठित हो जाती है। जीवन में संघर्ष करने की क्षमता  में ह्रास होता है। इससे उनका ही नुकसान  होता है।
वोट की राजनीति लोगों को कभी धर्म के नाम पर ,  कभी  ऊँची जाती ,अनुसूचित जाती , जनजाति तो कभी पिछड़ा  वर्ग , अति पिछड़ा वर्ग , दलित जाति  ,अति दलित जाति  , महादलित जाति  , जाने कितने जाति और वर्गों में समाज को विभाजित किया जाता है। इस तरह समाज का अहित ही होता है।
                             विगत 71  वर्षों से समस्यायें  जस के तस बरकरार हैं या हम कहें की और भी विकराल और विकृत हो रही हैं। जरा सोचिये इन बीते वर्षों से लेकर आज तक हम उपलब्धियां ही गिनाते रहे हैं , किन्तु उन अभिशप्त महिलाओं , बेटियों  और अशक्तों के लिए , जिन्होंने अमानवीय यातनायें झेली हैं और झेल रहे हैं , जिनके जीवन में अन्धेरा ही अन्धेरा हो  , रोशनी का एक कतरा भी दिखाई नहीं दे रहा हो , फुटपाथों पर ही जीवन गुजारने को विवश  हों , समाज और शाशन द्वारा भी उपेक्षित हो ,  आजादी  के क्या मायने होंगे ? काश ! कि वोट की राजनीति छोड़ कर , सारी पार्टियां एक जुट हो कर इन समस्याओं का समाधान ढूढ़ती तो देश का नक्शा ही बदल जाता।
                              कहते हैं अपना दीदा किसी को नहीं दिखता है। अपना दीदा देखने के लिये आईने की जरूरत होती  है। कोई भी सरकार हो , किसी की भी हो या फिर कोई व्यक्ति विशेष ही हो उसे तो चाहिए आईना देखे अगर कोई दिखाता हो। उसे तोड़ना नहीं चाहिए। सुघर शब्दों की स्वतंत्रता  जब  तक जीवित रहेगी  तब तक देश उतना ही साफ  - सुथरा  , गौरवान्वित  और स्वतन्त्र एयर आज़ाद रहेगा। तभी तिरंगे का सच्चा सम्मान होगा
                            अंत में संत कबीर के शब्दों में  ---
                           " निन्दक नियरे राखिये , आँगन कुटी छवाय ,
                             बिन पानी , साबुन बिना , निर्मल  करे सुभाय। "
                        
                             ' जय हिन्द , जय भारत

नोट  : - प्रकाशित

Sunday, May 20, 2018

अब क्या मिशाल दूँ

रोज की तरह उस दिन भी मेरी सुबह की ही ड्यूटी  थी। जाड़े  के दिन थे। मैं ठीक वक्त सात बजे पहुँच गया था। कुछ ही देर बाद महेंद्र मिश्रा भी आ गया था। वह रोज ही हरिद्वार से ड्यूटी करने देहरादून आता था। उसकी ट्रेन यहाँ सुबह - सुबह साढ़े सात बजे पहुँच जाती थी। वैसे उसकी ड्यूटी  दस बजे से थी। किन्तु दस बजे तक पहुँचने के लिए कोई दूसरी ट्रेन नहीं थी नहीं थी। वह आकर ऑफिस के बाहर रक्खे बेंच पर बैठ गया था बहुत खामोश और ग़मगीन  , उदास। वह मुझ से बहुत जूनियर था। वह मुझे बहुत पसंद था क्योंकि वह कोई भी काम हो ईमानदारी और लगन से करता था। दूसरे उसकी इंग्लिश बहुत अच्छी थी। फर्राटेदार इंग्लिश बोल लेता था। किन्तु एक अवगुण उसमें घर कर गया था। वह शराब पीने का आदि हो गया था। यह शौक भी उसे पहले नहीं थी। ऑफिस के ही कुछ लोगों ने यह लत लगा दी थी। इस  कारण वह कभी - कभी ड्यूटी  पर लेट हो जाया करता था। ऑफिस में शाम को प्राय: रोज ही चौकड़ी बैठती थी और इस चौकड़ी में उसे भी शामिल कर लिया जाता था। ड्यूटी में लेट हो जाने पर इन्हीं लोगों द्वारा चीफ से शिकायत भी कर दिया जाता था जिस कारण वह चीफ साहब के कोपभाजन का शिकार हो जाता था। उन दिनों हमारे चीफ साहब  सरदार ( श्री लाभ सिंह नारंग ) जी थे। एक दिन पहले ही चीफ सहब जी ने उसे बुरी तरह डाँट लगाई थी। आज जब वह ऑफिस आया तो इसी वज़ह से उदास और ग़मगीन था। उसकी शादी हो गई थी और शायद उसके दो छोटे - छोटे  बच्चे भी थे। मैं उसे इस प्रकार उदास बैठे देखकर उसके पास गया और उसके कंधे पर हाथ रख कर पूछा कि वह इतना उदास और खामोश क्यों है ?उसकी आँखों में आँसू  आ गये। फिर उसने  कल्ह की घटना का जिक्र किया और बोला  कि चीफ साहब दूसरों की शिकायत पर आँख बंद कर विश्वास कर लेते हैं। मैं भी शादी - शुदा हूँ और बच्चों का बाप भी हूँ और चीफ साहब इस बुरी तरह व्यवहार करते हैं जैसे मैं सात साल का बच्चा हूँ। ऑफिस का कोई भी काम हो मैं पूरी तरह करता हूँ। वह सुबकने लगा था। मैंने उसे ढाढ़स बँधाया। ऑफिस का पोर्टर रामचीज  तब तक ऑफिस की सफाई कर चुका था। चीफ साहब का एक अपना अलग केबिन था जिमें दो तरफ दीवारें थीं और दो तरफ आधे लकड़ी और  आधे शीशे लगे थे। चीफ साहब जिस कुर्सी पर बैठते थे सामने गुरुनानक जी की तस्वीर लगाई हुई थी। तस्वीर के ठीक नीचे लकड़ी की दीवार से बनी थी। चीफ साहब ठीक साढ़े नौ बजे ऑफिस आ जाते थे। कुर्सी पर बैठने से पहले नियमित रूप से गुरुनानक जी की तस्वीर के सामने खड़े हो कर दोनों हाथ जोड़ कर नतमस्तक हो प्रणाम करना नहीं भूलते थे। यह उनका रोज का क्रम था। महेंद्र मिश्रा के साथ हुई  कल्ह की घटना मुझे भी मालूम थी और मुझे भी महसूस हुआ था कि इस तरह उनका डाँटना  और बिगड़ना ठीक नहीं है। किन्तु आज जब महेंद्र मिश्रा को इस तरह से देखा तो मुझे लगा कि यह उसके साथ सही नहीं हो रहा है। मैंने मन में कुछ निश्चय किया। एक चौक  ( खल्ली ) से गुरुनानक जी के तस्वीर के नीचे लकड़ी  के फ्रेम पर इस प्रकार  लिखा  -
 " ऐसी वाणी बोलिये मन का आपा खोय , औरन को शीतल करे आपहु शीतल होय "
महेंद्र मिश्रा घबरा गया ,बोला वह बहुत नाराज होंगे और सब गाज मेरे ऊपर गिरेगी। मैंने उससे कहा तुम बाहर जा कर बैठो।  तुम्हें कुछ बताने और बोलने की जरूरत नहीं है। जो कुछ करुँगा  मैं  करूंगा। राम चीज को भी बहार बैठा दिया और कहा उसे भी कुछ बोलने की जरूरत नहीं है। मैं भी अपनी कुर्सी पर बैठ कर काम करने लगा। ठीक साढ़े नौ बजे चीफ साहब आ गए। रोज की तरह उनके आते ही मैंने उनका अभिवादन किया। वे अपने चैम्बर में गए और रोज की तरह गुरनानक जी के तस्वीर के सामने खड़े हो हाथ जोड़ते-जोड़ते वे रूक गए और गरज कर रामचीज को आवाज दिया  - ये यहाँ किसने लिखा ? रामचीज ने कहा - मुझे नहीं मालूम। मैं भी रामचीज के पीछे - पीछे वहाँ  पहुँच गया। मैंने बड़े शान्त  हो कर ( जैसे मुझे कुछ भी मालूम नहीं  ) पूछा क्या हो गया साहब  ? यह यहाँ तस्वीर के नीचे - उन्होंने मुझे अपने हाथ की ऊँगली से इशारा कर दिखाया । मैंने उन पँक्तियों को पढ़ा और कहा यह तो कबीर जी की उक्ति है।  बहुत सुन्दर है। उन्होंने कहा - है पर लिखा किसने ? मैंने शान्त  हो कर कहा - मैंने लिखा। उनका अगला प्रश्न भी उसी गुस्से और गरज के साथ था क्यों लिखा। मैंने बहुत ही शान्त हो कर कहा - पहले आप गुरु जी को नमस्कार कर लें और शान्त हो जायें। लेकिन उनका गुस्सा शान्त नहीं हुआ। तब मैंने उनसे कहा - आप रोज ही नियमित रूप से गुरुनानक जी की तस्वीर के सामने  हाथ जोड़ कर नमस्कार करते हैं  - क्या फायदा है जब आप इतनी सही और छोटी बात के लिए इतना  क्रुद्ध हो रहे हैं कि आप नमस्कार करना भी भूल  गए। फिर मैंने यह क्यों लिखा यह विस्तार से बताया। मैंने कहा - महेंद्र मिश्रा कोई दूध पीता बच्चा नहीं है। शादी - शुदा है। खुद बच्चों का पिता है। आपका दूसरे की जायज - नाजायज शिकायतों पर वेवजह डाँटना क्या उचित है  ? कल्ह आपकी डाँट से क्षुब्ध हो कर कुछ  ऐसी -वैसी बात कर ले तो कौन जिम्मेदार होगा ? वह अगर काम ठीक नहीं करता हो , काम छोड़ कर चला जाता हो तो कोई बात है। शायद उन्हें अपनी इस बात का अहसास हुआ और तब से उन्होंने महेंद्र मिश्रा से प्यार से पेश आने लगे। बहुत बाद में होली के अवसर पर महेंद्र मिश्रा ने ऑफिस के सभी स्टाफ के लिए कुछ - कुछ पंक्तियाँ लिखी जिसमें मेरे लिए उसने लिखा -  " अब क्या मिशाल दूँ मैं  तुम्हारे शबाब की , इंसान बन गई है किरण आफ़ताब की " । अब मेरे सेवानिवृत हुए ग्यारह वर्ष बीत गए हैं , महेंद्र मिश्रा भी सेवानिवृत हो गया है। पर अब भी उसका हमसब के साथ हँसना  - हँसाना याद आता है। वह एक बहुत अच्छा दोस्त था।

Friday, March 30, 2018

कहानी

                                      सफर कोई भी हो , हमसफर मिल ही जाते हैं। ऐसे ही एक सफर की यह कहानी है।      फरवरी का अंतिम सप्ताह था जब हमने गोवा जाने का प्रोग्राम बनाया। निज़ामुद्दीन से राजधानी एक्सप्रेस ठीक समय 11 बजे छूट गई। हमारे बैठने के थोड़ी देर बाद ही कैटेरिंग से पानी का बोतल और फिर चाय आ गई। हमलोग अभी अपने - अपने सामान एडजस्ट करने में ही लगे थे। सामान  एडजस्ट करने के बाद हमने चाय पी। हमारी दोनों बर्थ नीचे की आमने - सामने की ही थी। ऊपर वाले बर्थ पर एक लड़का था जो अभी हमारे साथ ही बैठा था। हमारे केबिन का ऊपर का बर्थ खाली था। खाना खाने के बाद उस लड़के से हमारी बात - चीत होने लगी।उसने बताया कि वह त्रिवेन्द्रम में रहता है। वैसे वह दिल्ली का रहने वाला है। बातों में हम इतने मगशूल हो गये कि हमें पता ही नहीं चला कि शाम हो गई है। रात का खाना खाने के बाद हम लोग सो गये। सुबह हमारे उठने से पहले ही चाय आ गई थी। फिर हम सब ने चाय पी।  मैंने उसे अपने पास रखी मिठाई भी खिलाई। पहले वह मना करता रहा पर मेरे विशेष आग्रह पर उसने मिठाई खा लिया। मेरी श्रीमती जी तो चाय पीने का बाद फिर से सो गईं। परन्तु हम उस लड़के के साथ बात करने लगे। वह लड़का मुझे शिक्षित और शिष्ट लगा। कभी - कभी हम केबिन के अंदर से ही बाहर का नजारा भी देख रहे थे। सुबह - सुबह की धूप में बाहर का नजारा भी मनमोहक लग रहा था। बात - चीत के क्रम में उसने अपने जीवन की एक रोचक और मजेदार वाकया सुनाया जिसे सुनकर हम खूब हँसे भी। उसने जो सुनाया वह मैं आपको ज्यों का त्यों सुनाता हूँ।  " बहुत पुरानी बात है। एक बार मेरे पिता जी के एक दोस्त ने मुझे अपने घर खाना खाने पर बुलाया। तब मैं कॉलेज का विद्यार्थी ही था। उन दिनों मैं घर पर अकेला ही था। माँ और पिता जी कुछ घरेलु कार्यवश बहर गए हुए थे। वैसे मुझे कहीं किसी के घर आना - जाना पसन्द नहीं था। किन्तु मैं उनके घर चला गया था। वह इसलिए कि उनके घर हमारा पहले से भी आना - जाना था। वह एक देर शाम का वाकया है। उन्होंने दरवाजा खोल कर स्वागत किया। इधर - उधर की कुछ बातें हुईं। फिर खाने का समय हो गया था। खाने की मेज पर  हमारा खाना लगाया गया। मैं भी जल्द से जल्द घर वापस आना चाह रहा था। तभी खाना खाने के बीच में बड़े प्यार से वे कहने लगे - खाना कैसा लगा  ? फिर मेरे उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना बोले सब्जी मैंने काटे - छीले हैं ताकि जल्द से जल्द खाना बन सके और यह जो पुदीने - धनिया की चटनी तुम खा रहे हो , जानते हो इसे किसने बनाया  ? यह मेरे बेटे रॉनी ने बनाया है - बड़ी मेहनत से उसने हाथों -पैरों से पीस - पीस कर बनाया है। एकबारगी मेरा मन कसैला हो गया।  मैंने सिर उठा कर उनकी तरफ हिकारत से देखा - यह सरासर मेरा अपमान था। यह रॉनी दरअसल उनके डॉगी का नाम था ,वह बोलते रहे ,  हाँ - हाँ मैं सच कह रहा हूँ। बेचारा रॉनी हाँफता रहा परन्तु चटनी पीस कर ही दम लिया। मैंने कोई प्रत्युत्तर नहीं दिया।  मैं खाने से उठ गया और अपने घर वापस हो लिया। तब से आज तक मैं दुबारे उनके घर नहीं गया। पता नहीं उनका वह बेटा रॉनी अब भी उनके साथ है या कहीं और। इतना कह कर वह मेरी तरफ देख कर हलके से मुस्कुराया, शायद वह मेरी प्रतिक्रिया जानना चाह रहा होगा। उसके साथ -साथ मेरा मन भी कसैला हो गया था। मैंने उससे सिर्फ इतना ही पूछा - क्या तुम्हें तब गुस्सा नहीं आया ? तब तो तुम युवा ही  रहे होगे  ? उस लड़के ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया  - " नहीं " । फिर कुछ रूक कर उसने जो कहा वह सुन कर उसका शान्त और आत्मविश्वास से लवरेज़ चेहरा देख रहा था।
उसने कहा  -  मैं अपना मुँह गन्दा क्यूँ करता। वह स्वयं ही अपनी  रुग्ण और ओछी मानसिकता का परिचय दे रहे थे। वह मुझे दम्भी और विकृत प्रवृति के लगे। ऐसा व्यक्ति चाहे कितना ही धनवान हो जाए। उसकी ओछी हरकत किसी से छुपी नहीं रह सकती।  उनहोंने अपने लिये यही पूंजी एकत्रित की थी।
                     समय बहुत निकल गया था।  मेरा गन्तव्य स्टेशन मडगांव आने ही वाला था। उसे तो और भी आगे जाना था। मैं अपने स्टेशन पर उतर गया। उसने मेरे सामान उतारने में भी मदद की। मैं घर चला आया। उस लड़के की  तथा उसके साथ हुई घटना की याद अब भी आती है  ,  कैसे -कैसे विकृत मानसिकता के लोग होते हैं ? दूसरे का अपमान करने में ही गर्व करते हैं। सचमुच ऐसे लोगों का साथ तो छोड़ ही देना चाहिये।

Wednesday, February 21, 2018

दो शब्द :-

 दो शब्द  :-
वर्ष 2018के 14 जनवरी को सम्मानीय शायर ज़नाब राशिद आरफ़ी जी के प्रयास और सहयोग से हरबर्टपुर
( देहरादून ) में  पछवादून  " साहित्यिक चौपाल " का सफल एवं भव्य आयोजन किया गया। यह साहित्यिक चौपाल विशेष कर वरिष्ठ साहित्यकारों जिनकी उम्र 65 वर्ष से ऊपर थी , के सम्मान में आयोजित किया गया था  जो वस्तुत:अपने आप में अनूठा था। ऐसा यह पहला अवसर ही है जिसमें वरिष्ठ  बुजुर्गवार साहित्यकारों को जो उम्र के कुछ पड़ाव पर अपने आप में अकेले पड़ने लगते हैं  , के  लिए  था। इस चौपाल की एक और विशिष्टता थी कि इसमें देहरादून और हिमाचल प्रदेश के ही लगभग पचास  - पचपन शायर , कवि और साहित्यकार  जुटे थे। यह महान सोच महान व्यक्ति का ही हो सकता है। यह ज़नाब राशिद जी की महानता ही है। मुझे भी इस चौपाल में उपस्थित होने का गौरव प्राप्त हुआ।मुझे कई विद्वान् कवियों और शायरों की उम्दा रचनाएं सुनने और उनसे मिलने का अवसर प्राप्त हुआ। मैं श्री राशिद साहब जी से मिल कर उनकी सादगी और सरलता से अविभूत हुआ। कुल मिला कर कहा जाये तो यह एक अति सफल आयोजन था जिसकी सफलता का श्रेय श्री राशिद साहब तथा उनके सहयोगी और पछवादून के लोगों को जाता है।
                                                                        ------  विजय कुमार सिन्हा  " तरुण "
                                                                                  डी - 40 , रेस कोर्स , देहरादून  ( उत्तराखण्ड  )

Wednesday, January 10, 2018

बाबाओं का मकड़जाल

     
                       भले ही हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं , किन्तु , अंधविश्वास और रूढ़िवादिता के मकरजाल से निकल नहीं पाए हैं। यही कारण है कि भारत में विशेष कर मंत्र -तंत्र , झाड़ -फूंक और बाबाओं का वर्चस्व बना है। अनपढ़ तो अनपढ़ , पढ़े लिखे भी इनमें उलझ जाते हैं।  हम बाबाओं पर आँख मूँद कर विश्वास  कर लेते हैं , अपना विवेक खो देते हैं। आज हम आये दिन तमाम समाचार पत्रों और टी . वी चैनलों पर इन पाखंडी  बाबाओं के कुकृत्य के समाचार से अवगत होते रहते हैं। इन सब के बाबजूद ऐसे बाबाओं के कारनामे बंद नहीं होते हैं। इनकी धर्म की दुकान फलती -फूलती रहती है।इसका कारण अशिक्षा का होना भी है। एक ओर हिन्दुस्तान में जहाँ इतनी गरीबी है , लोगों के पास सिर छिपाने के लिए अपना एक छोटा सा घर  नहीं है , वहीँ दूसरी ओर तथाकथित बाबाओं के पास बेसुमार दौलत होती है , बेहिसाब जमीन होती है , जहाँ ये अपना एक अलग  साम्राज्य स्थापित कर लेते हैं। इनकी अपनी एक अलग सत्ता होती है।  एक तरह से कुछेक तो राज्य सरकार के इतर समानांतर सरकार चलाते हैं।  इनकी अपनी फ़ौज होती है जो आधुनिक अस्त्र - शस्त्र  से भी सुसज्जित होती है  . ( राम - रहीम  इसके उदाहरण स्वरूप हैं। ) इनको सरकार का संरक्षण प्राप्त होता है। सरकार  कोई भी हो , इन्हें कौड़ी के भाव जमीन बेच देती है या फिर दान में दे देती है। आम आदमी के लिए जमीन  के  ऊँचे  भाव के कारण जमीन  खरीदना मुहाल होता है , परन्तु बाबाओं के पास कई - कई सौ एकड़ जमीन पड़ी होती हैं जहाँ धर्म और कर्म के नाम पर ऐय्यासियां होती हैं। ऐसे कितने ही  बाबा हैं जिनकी पोल खुली है और अभी और ऐसे कई बाबा होंगे जिनकी  पोल का अभी पता नहीं चल पाया होगा। ये तथाकथित बाबा लोगों में धर्म का डर बिठा कर , इहलोक और परलोक का भय दिखाकर , अपनी दैवीय शक्ति का हवाला देकर लोगों की आँखों में धूल  झोंकते हैं , उन्हें ठगते हैं। इस कार्य में परोक्ष रूप से नेताओं और सरकार भी शामिल हैं जो अपना उल्लू इन्हीं बाबाओं के माध्यम से साधते रहते हैं। अभी हाल - फिलहाल मध्य प्रदेश  सरकार ने पांच बाबाओं को राज्य मंत्री का दर्जा दिया। लोग भी बाबाओं के बहकावे में आ जाते हैं जिनमें औरतें अधिक होती हैं  -  Soft  Target ..।
भले ही वे अपने पति के पैर नहीं पूजतीं  पर बाबाओं के पैर पूजने को तत्पर रहती हैं जिन्हें वे अच्छी तरह से जानती तक नहीं और बाबाओं के जाल में बुरी तरह से फँस जाती हैं। लोग बाबाओं को भगवान् की तरह पूजते हैं  , उनपर आँख बंद कर विश्वास करते हैं और ये बाबा उनकी आस्था से खिलवाड़ करते है और अनैतिक कार्य करते हुए  , सारी हदें पार कर  गुरु - शिष्य , भक्त और भगवान् के रिश्तों को शर्मशार करते हैं।  कई - कई तो संगीन अपराधों में लिप्त पाए गए हैं। धर्म की आड़ में बलात्कार , ह्त्या और धोखाधड़ी  ही इनका पेशा बन जाता है। ऐसे कितने ही बाबा हैं जिनकी अनैतिकता की पोल खुली और वे जेल गए। इनमें आशा राम , बाबा गुरमीत राम रहीम , स्वामी परमानंद ,नित्यानंद स्वामी , नारायण साई  , स्वामी भीमानंद महाराज, राधे माँ ,और बाबा रामपाल जेल जा चुके हैं। अभी - अभी ताजा नाम और कारनामा दाती महाराज  का आया है  जिन पर उन्हीं के आश्रम की शिष्या ने बलात्कार के गंभीर आरोप लगाए हैं। ऐसे ही आरोपों ले कारण  आशा राम और नारायण साई अभी जेल में बंद हैं।वीरेंद्र देव दीक्षित का भी नाम जुड़ा है जिनके आश्रम से 41 लड़कियों को सीबीआई ने छुड़ाया था। तरस तो उन माँ - बाप पर भी आता है जो अपनी संतानों को  बिना सोचे - समझे , बिना जाँचे - परखे बेटे और बेटियों को आश्रमों में छोड़ देते हैं। इनके खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए। राज्य के सरकारों को हरेक आश्रमों की पड़ताल कराते रहनी चाहिए और सभी राज्यों के आश्रमों की निष्पक्ष जाँच अलग से केंद्र सरकार को भी कराते रहना चाहिए। इसके अतिरिक्त गाँव - कस्बों में गरीब और सामान्य वर्गों की उचित शिक्षा की व्यवस्था करानी चाहिए ताकि  इन बच्चों को किसी साधू - महात्मा के आश्रमों में ना जाना पड़े। ये तो अभी कुछ ही आँकड़े सामने  आये हैं अभी और कितने पाए जाएंगे उसका पता तो भविष्य में चलेगा। शिक्षा का मतलब सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं बल्कि सामाजिक ज्ञान और अच्छे - बुरे की पहचान  की होनी चाहिए।बाबाओं पर निगरानी के साथ - साथ इन पर नकेल भी कसी जानी चाहिए। आश्रमों में पलने और पढ़ने वाले बच्चे के भविष्य के बारे में सरकारों को भी सोचना चाहिए। अन्यथा ये बच्चे स्वयं के लिए और समाज तथा देश के लिए भी बोझ  ही होते हैं।  इनको सही शिक्षा देकर देश के विकास  की मुख्य धारा में जोड़ना चाहिए।