Friday, March 14, 2014

हम और हमारे बुजुर्ग

   
  व्यक्ति से परिवार और परिवार से समाज बनता है। परिवार के बिना न व्यक्ति की कल्पना की जा सकती है न ही समाज का। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। किसी भी व्यक्ति की मान - मर्यादा ,उसका उत्कर्ष ,उसका उत्थान परिवार पर निर्भर करता है। परिवार यदि संस्कारी होगा तो व्यक्ति भी सुसंस्कृत और संस्कारी होगा।
        आज एकल परिवाार के,जिसमें " हम दो हमारे दो " अथवा " हम दोनों एक हमारे एक " की अवधारणा प्रचलित है , मुकाबले आज से कुछ वर्ष पहले तक परिवार का अर्थ होता था एक संयुक्त परिवार ।  माता - पिता ,भाई -बहन , पुत्र-पुत्रियाँ , औए कई पुश्तों के परिवार एक साथ एक आँगन में रहा करते थे।  कुछ दिक्क्तों को छोड़ कर संयुक्त परिवार ही सर्वश्रेष्ठ और उत्तम माना गया है। परिवार में रह कर दूसरे का. ख़याल रखने  , तौर - तरीके , आपस में स्नेह , प्यार , सम्मान और एक अनुशाशन में बंध कर सुसंस्कृत जीवन जीने की कला सीखते थे। एक दूसरे के  सुख - दुख को नजदीक से समझने और ,झेलने और दूर करने का उपाय ढूंढ़ लेते थे। जीवन में समस्याएँ आज भी हैं कल्ह भी थे । परन्तु कल्ह के जीवन की समस्याओं को हम परिवार में बैठ कर बड़े - बजुर्ग के अनुभव और सहयोग से सरलता पूर्वक पार लगा जाते थे। ये हममें अच्छे संस्कार भरते थे। विषम से विषम परिस्थितियों में , समस्याओं की चुनौतियों से लड़ने और पार लगाने में सहयोग के साथ-साथ हमारा आत्मबल , आत्मविश्वास और साहस बढ़ाते थे। हमारा मार्गदर्शन करते थे। आज हमारे ये ही बुजुर्ग हमसे दूर और उपेक्षित हो गए हैं।
       आज का एकल परिवार पति-पत्नी और बच्चे तक  ही सीमित रह गया है। आज हम अपने आप में घुट कर ,मन मसोस कर रह जाते हैं और तनाव को आमंत्रित करते हैं। यद्द्यपि इसमें किसी व्यक्ति विशेष का दोष नहीं है , जीवन शैली ही इस तरह की बन गई है कि न चाहते हुए भी हमें अपने से दूर हो कर अलग रहने की कहीं मजबूरी हो गई तो कहीं विवशतावश आपस में एक दूसरे को बर्दाश्त और विश्वास करने की क्षमता में कमी ही इसका  कारण है। आज के भौतिक युग की विषम व्यवस्था  के कारण रोजी-रोटी,शिक्षा-दीक्षा , व्यवसाय ,आपसी विश्वास-विचार की भिन्नता के कारण हम परिवार से कटते जा रहे हैं जिससे कई तरह के अवसाद हमें घेर लेते हैं और हम कई असाध्य बीमारियों के शिकार हो जाते हैं।वर्तमान में एकल और छोटे परिवार को देखते हुए प्रतीत होता है कि यदि ऐसी ही स्थिति रही तो कहीं ऐसा न हो कि आगे आने वाले कुछ वर्षों में दादा - दादी ,नाना -नानी ,बुआ -मौसी ,और अन्य रिश्ते भी सिर्फ कहानियों और कल्पनाओं में ही रह जायेंगे।
         आज की सामाजिक व्यवस्था में हमें अपने बुजुर्गों को अपेक्षित स्थान देने की आवश्यकता है।
  समाज और परिवार में कई- कई विषयों पर चर्चायें और  बहस होती हैं  किन्तु हम अपने बुजुर्गों को ही दरकिनार कर देते हैं। बुजुर्ग यह सब देखते हैं और खामोश रह सब सहते हैं। वे अपने आप में घुटते और घुलते रहते हैं और अवसाद का  शिकार हो कर तनाव पूर्ण जीवन जीने को मजबूर हो जाते है। यह स्थिति कमोबेश हर समाज और परिवार की है।
            आज के हमारे बुजुर्ग, जिन्होंने अपना पूरा जीवन परिवार और समाज के लिए अर्पित कर दिया , जिन्होंने हमारे भविष्य को सजाने और संवारने में अपना जीवन होम कर दिया , वही, आज उपेक्षित हों तो यह किसी भी परिवार और समाज के लिए कलंक है।
            कोई भी व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में कार्य करता है तो वह सिर्फ अपने  लिए ही  कार्य नहीं करता है, वरन उसके कार्य से परिवार और समाज के कई तबके लाभान्वित होते हैं । वह चाहे नौकरी करता हो , व्यापार करता हो , कारीगर हो या वह मजदूरी ही करता हो , समाज के सभी वर्गों के लिए किसी न किसी रूप में उसका योगदान रहता है । किन्तु वही , जब ऐसी स्थिति में पहुँच जाते हैं , जहाँ उसके आगे कार्य करने में विराम लग जाता है अथवा सक्षम नहीं रह जाते हैं तो वे ही उपेक्षित हो जाते  हैं । यह अनुचित है।
        परिवार और समाज को अहसास होना चाहिए कि वे इन्हीं बुजुर्गों की बदौलत इस दुनियाँ को देख रहे हैं और जीवन का दुःख-सुख , आनंद का अनुभव कर रहे हैं। ये बुजुर्ग हर हाल में हमारे माननीय और आदर्श हैं, यह सोच, हमें अपने आप में पैदा करनी  चाहिए।  जब तक बुजुर्ग हमारे साथ हैं हमारे सिर पर मजबूत छत है,आकाश है। वे हमसे कुछ लेते नहीं , देते ही हैं -कम से कम अपना अनुभव।           
        केंद्र की सरकार और कुछ राज्य सरकारों ने भी कुछ आर्थिक मदद दे कर , इस दिशा में प्रयास किया है पर वह नाकाफी है। उनके इस प्रयास के अलावे भी इन बुजुर्गों को एक    मजबूत भावनात्मक सहारे की आवश्यकता  है जो केवल परिवार और समाज से ही मिल सकता है।बिना बुजुर्गों के हमारा परिवार अधूरा है। यहाँ यह बात भी समझना जरूरी है कि हमारे आचरण का ही अनुसरण हमारी संतति और आने वाली पीढ़ीयाँ  करेंगी अतएव हमें अपने आचरण और व्यवहार को संयमित और आदर्शशील बनाना ही होगा।  
             आज इस बात को समझने की जरूरत है कि यह पूरा समाज ही जिसमें सभी वर्ग और वय के लोग हैं - हमारा एक परिवार है। तभी हम फिर से परिवार की अवधारणा को पुनर्जीवित कर हँसी -खुशी ,स्नेह -सौहाद्र,सम्मान और आदर से स्वयं के साथ -साथ समाज का भी उत्थान कर  सकते हैं।

 ( प्रकाशित )

Thursday, February 20, 2014

प्रचार ( विज्ञापन ) में हिंदी

     ( १  )   प्रस्तावना

       प्रचार ( विज्ञापन ) में हिंदी का बहुत महत्व है। आज के  औद्योगिक जगत में ही नहीं  हर क्षेत्र में प्रचार की उपयोगिता सफलता के सोपान छू रही है। हर वस्तु की जानकारी प्रचार के माध्यम से सुलभ हो रही है। जिसका जितना प्रचार वह उतना ही प्रचलित। उपभोक्तावादी वस्तुओं से लेकर समाज और जीवन से जुड़ी प्रत्येक वस्तु का प्रचार चरम पर है। " प्रचार "भी एक कला है जो उपभोक्ताओं को अपनी ओर आकर्षित करता है।
      आज से चालीस-पचास वर्ष पूर्व प्रचार के इतने माध्यम नहीं थे जितने आज उपलब्ध हैं। प्रचार की अनुपलब्धता के कारण प्रचार के लिए क्षेत्र भे सीमित  रह जाता था जबकि आज इसका क्षेत्र असीम है। छोटी से छोटी वस्तुओं से लेकर शिक्षा, व्यवसाय, सरकारी -गैरसरकारी योजनाओं के कार्यकलाप और चुनाव तक प्रचार से प्रभावित हो रहे हैं।
      ( २  ) प्रतिपादन  ( हिंदी में प्रचार की आवश्यकता  )
       पहले दैनिक जीवन के उपयोग की कुछ वस्तुओं का, जैसे चाय, बिस्कुट, सर्फ़ पाउडर, टूथपेस्ट, सिगरेट आदि का प्रचार औद्योगिक संस्थाओं द्वारा गांव, कस्बा और शहर में मुफ्त बाँट कर और प्रदर्शन कर कराया जाता  था, इसमें धन खर्च के अलावा समय भी बहुत लगता था और बहुत अधिक परिश्रम भी करना पड़ता था। बावजूद  इसके कुछ और भी क्षेत्र जैसे शिक्षा, व्यवसाय, भविष्य की योजनाओं के लिए बचत आदि के बारे में आम आदमी के बीच जानकारी का अभाव ही रहता था। कारण था कि एक तो प्रचार कम था दूसरे अंग्रेजी भाषा की ही बहुलता थी। बचत के महत्व को समझते हुए भी आम आदमी विशेषकर ग्रामीण वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग की कुछ मजबूरियाँ थीं। मसलन बैंक हो, पोस्ट-ऑफिस हो या बीमा-योजना  या कोई अन्य, सब जगह फॉर्म -प्रपत्र अंग्रेजी भाषा में ही होते थे। आवश्यकता पड़ने पर रूपये -पैसे निकालने में परेशानी होती थी। कभी -कभी  बहुत अधिक विलंब भी हो जाया करता  था । बाहर रूपये भेजना हो तो बैंक-ड्राफ्ट या मनी-आर्डर के अलावा कोई दूसरा सरल साधन नहीं था। स्वयं साथ में ले जाने पर लुटने का ख़तरा अधिक था। आज हर छोटा - बड़ा आदमी भविष्य के लिए बचत करना चाहता है। साधारण आम आदमी, यहाँ तक कि कम शिक्षित और अनपढ़ लोग भी हिंदी के माध्यम से बचत के महत्व बताये या दिखाए जाने पर आसानी से समझ जाते हैं। अत: प्रचार को हिंदी भाषा में की जाने की आवश्यकता महसूस की गई जिससे प्रत्येक व्यक्ति को प्रत्येक उत्पाद और प्रत्येक योजनाओं की जानकारी सुलभता से प्राप्त हो सके। जुलाई १९६९  में बैंको का राष्ट्रीयकरण के पश्चात अधिक से अधिक शाखाएं बढ़ाई गईं और इसे गाँव -गाँव तक पहुँचाया गया ताकि ग्रामीण, किसान, मध्यम और निम्न वर्ग के लोग भी ज्यादा से ज्यादा लाभ उठा सकें। वर्ष १९९४ में बैंको का तकनीकीकरण आरंभ हुआ और आज सभी बैंक और पोस्ट ऑफिस तकनीकी रूप से विश्व के हर कोने से जुड़ गए हैं। हर काम मिनटों में हो जाता है। इसका श्रेय तकनीक में उन्नति तथा  हिंदी में प्रचार और प्रसार को ही जाता है।
         (३ ) प्रचार का माध्यम
     आज प्रचार के कई माध्यम हैं। प्रिंट मीडिया और तकनीकी रूप से इलेकट्रोनिक मीडिया की  महती भूमिका है । प्रिंट मीडिया में हिंदी के अखबार, पत्र - पत्रिकाएं, पोस्टर, बैनर, पैम्पलेट आदि का स्थान है तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में टी. वी और हिंदी फ़िल्में सशक्त और सक्षम भूमिका निभा रहीं हैं जिनमें श्रव्य (सुन कर ), दृश्य ( देख कर )और चित्रांकन ( चित्र दिखा कर ) द्वारा भी प्रचार बो बल मिलता है। आज हम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कारण गांव -गांव, कस्बे -कस्बे तक पहुँच गए हैं। यहाँ तक कि हम आज विश्व के एटलस पर हर देश से जुड़ गए हैं।
     यह आज के तकनीकी युग की बड़ी देन है जिसमें भाषा का रूपांतर भी सम्मिलित है । अब प्रचार के लिए भटकने की आवश्यकता नहीं है। हम इन उपलब्ध माध्यमों से जन - जन को जागरुक करने में समर्थ हैं। वह प्रचार उपभोक्तावादी वस्तुओं, मकान -दुकान, पंखा, फ्रिज, कूलर, कार, स्कूटर- बाइक, बिजली  इन्वर्टर हो या कॉस्मेटिक सामान हो या शैक्षणिक संस्थाओं, व्यवसायों का , हम अधिकाधिक लाभान्वित हो रहे हैं।

      (4 ) निष्कर्ष  
       प्रचार के भाषा के महत्व को कम करके नहीं आँका जा सकता है। हिंदी हमारी मातृभाषा, राजभाषा  तो है ही साथ-साथ यही  हमारी संपर्क भाषा भी है। किसी भी वस्तु या विविध कार्यों और योजनाओं के लिए हर क्षेत्र में हिंदी ही एक ऐसी भाषा है जो अति सरलता से जन - मानस के मन- मस्तिष्क और दिल-दिमाग पर छा जाता है। आज सभी उत्पाद का महत्व हिंदी के माध्यम से प्रचार के कारण ही बढ़ा है। आज हिंदी माध्यम से किये गए विज्ञापन / प्रचार के शब्द बच्चे - बच्चे की जुबान पर है।
        क्षेत्रवाद की बात हम छोड़ दें तो हम अपनी बात हिंदी में जितनी आसानी से कहते और समझते हैं वह शायद दूसरी भाषा में नहीं। पंजाब, हिमाचल, अरुणाचल, आसाम, बंगाल हो, या केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश या तामिलनाडू , हर प्रदेश में हिंदी बोलने और समझने वालों  की बहुतायत है। आज सभी जगह  हिंदी ने अपना स्थान बना लिया है। हर प्रकार के पत्र - प्रपत्र में,  प्रचार में हिंदी का उपयोग होने लगा है।
         सर्वविदित है कि सभी उत्पाद के वस्तुओं और योजनाओं का हिंदी में किया गया          विज्ञापन जन-मानस पर विशेष छाप छोड़ता है। अत: हम दावे के साथ कह सकते हैं कि प्रचार में हिंदी की उपयोगिता के महत्व को हम झुठला नहीं सकते हैं।
    

Tuesday, February 18, 2014

वसंत और राधा-कृष्ण की होली

वसंत  आ गया है। धरती सजने - सँवरने लगी है। चारों ओर रंग - बिरंगे नीले- पीले , लाल -
गुलाबी फूल खिले हैं। मानो प्रकृति ने कई रंगों की चुनरी ओढ़ ली है। बादल बरस कर चले गए हैं। आसमान धुल गया है। नीला अंबर धरा की सुन्दरता देख कर धरती पर समर्पण भाव से झुक गया है , नत हो गया है - मानो नीलाकाश धरती को अपने आलिंगन में भर लेना चाहता है। कामदेव , फूलों से धरा को सजा कर सबके ह्रदय में प्रेम रस का  संचार कर रहे हैं। कोयल कूकने लगी है। मोर कूजने लगे हैं। तोते अपनी आवाज से सबको आकर्षित कर रहे हैं। प्रेम के प्रतीक ये सुन्दर तोते झुण्ड के झुण्ड आकाश में विचरण कर रहे हैं। कहीं - कहीं जोड़ों में बैठ कर  " प्रेम " को साकार कर रहें हैं। फागुन आ गया है - अहसास हो रहा है।
    होली के रंग का सरूर तन - मन को आनंद के सागर में डुबोने लगा है। ऐसे में मानव मन क्या , देवमन श्री कृष्ण का ह्रदय भी राधा संग होली खेलने को मचल उठता है। श्री कृष्ण तो स्वयं पीताम्बरधारी हैं , श्याम घन रूपी तन , कमल - नाल सी भुजायें , अम्बुज से लोचन , मुस्कान भरे होंठों पर हरित बाँसुरी , सिर पर मोरपंख , साक्षात बासंतिक छवि - प्रतीत होता है कि कामदेव ने स्वयं अपने हाथों से सजाया हो - उसी कृष्ण का मन आज बसंत की होली के रंग में रंग गया है और अपने संगी ग्वाल - बाल को साथ लेकर होली खेलने निकल पड़े हैं - राधा की गलियों में।
     राधा मन ही मन मुस्का रही है। बसंत का रंग , फागुन का रंग , होली का रंग उसके तन -मन को सराबोर कर रहा है। वह भी कब से कृष्ण संग  होली खेलने का इन्तजार कर रही है । होली के इस रस का आनंद उठाने के लिए मथुरा ,वृंदावन और गोकुलवासी ही नहीं , देवगण भी उल्लसित हो कर  स्वर्ग से फूलों की वर्षा कर रहे हैं - ऐसा लगता है कि यह फूलों की होली कृष्ण - राधा और राधा - कृष्ण के बीच हो रही है। गोकुल की गालियाँ , गोप - गोपियाँ फूलों से नहा रही हैं। होली का उत्साह तब और भी दूना हो जाता है जब गोपियाँ अपनी मटकियों में रंग भर कर ला रही हैं और नटखट मोहन अपने सखाओं सहित कंकड़ी मार कर मटकी फोड़ देते हैं। रंगों की बौछार होने लगती है। कहीं चोली भींगती है कहीं चुनरी।
चारों ओर गुलाल उड़ने लगता है। इधर आसमान लाल हो रहा है उधर राधा और गोपियों के गाल। गोपियाँ बरसाने की , लठ्ठ ले कर निकल पड़ती हैं। कृष्ण भी कम नहीं , कहते हैं - " तेरी लाठियों की चोट तो हम अपने सिर पर झेल लेंगे पर एक बार गाल पर गुलाल तो मलने दे। " गोपियों के लाल - लाल गाल  और भी लाल हो जाते हैं। वे आनंद में भर कर आवेश में  तेजी से लाठियाँ बरसाने लगती हैं। ये लाठियाँ  , लाठियाँ नहीं हैं -फूल की छड़ी हैं -उल्लास , प्यार और स्नेह का प्रतीक  हैं। सभी गोपियाँ राधा की तरह कृष्ण संग होली खेलना चाहती हैं। कृष्ण गोपियों के मन की बात जान लेते हैं और फिर सम्पूर्ण वातावरण कृष्णमय हो जाता है। जितनी गोपियाँ , उतने ही कृष्ण। कृष्ण को देख होली का उत्साह दूना हो रहा है। इधर लाठियों की बरसात उधर अटारियों से रंग , गुलाल , और फूलों की बौछार। धरती से अंबर तक गुलाल ही गुलाल।
      प्रेम का प्रतीक यह होली , मन को तरंगित करने वाली होली , उल्लास और हुलास को जीवित रखने वाली होली , मान - सम्मान ,प्यार - सौहाद्र का पवित्र त्यौहार आज भी मथुरा,वृंदावन बरसाने की गलियों में ही नहीं भारत देश के हर घर में  हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। सुबह की शुरुआत ही रंग - गुलाल से होती है।  घरों में तरह - तरह के पकवान पकाये और बनाये जाते हैं। दिनभर होली की धूम के साथ हम एक दूसरे से प्यार से मिलते हैं , मेहमानों व  अतिथियों को पकवान व मिष्टान्न खिला कर उनका स्वागत करते हैं।आज भी बरसाने की होली उसी प्रकार खेली जाती है।  आज भी राधा और कृष्ण मथुरा और वृंदावन की गलियों में होली खेलते हैं। रंग , गुलाल और प्यार की होली।

Wednesday, February 12, 2014

प्रचार में हिंदी

     आज के औधोगिक जगत में ही नहीं वरन हर क्षेत्र में प्रचार की उपयोगिता सफलता का सोपान छू रही है। हर वस्तु प्रचार के माध्यम से बिकाऊ हो रहा है। जिसका जितना प्रचार वह उतना ही बिकाऊ। उपभोक्तावादी वस्तुओं से लेकर समाज और जीवन से जुड़ी हर चीज का प्रचार चरम पर है।
      आज से चालीस -पचास वर्ष पूर्व प्रचार के इतने माध्यम नहीं थे जितने आज उपलब्ध हैं। प्रचार के माध्यम की अनुपलब्धता के कारण प्रचार के लिए क्षेत्र भी सीमित रह जाता था जबकि आज इसका क्षेत्र असीम है। आज छोटी से छोटी वस्तुओं से लेकर शिक्षा , व्यवसाय , सरकारी - गैरसरकारी योजनाओं के कार्यकलाप और उनके गठन को लेकर चुनाव तक प्रचार से प्रभावित हो रहे हैं। पहले कुछ उपभोक्तावादी वस्तुओं का प्रचार औधोगिक संस्थाओं द्वारा अपने कर्मचारियों के माध्यम  से उन्हें गॉंव -गाँव , कस्बे -कस्बे ,शहर -शहर घूम कर उत्पादक वस्तुओं का प्रचार और प्रसार उन वस्तुओं का प्रदर्शन कर किया जाता था।  इसमें धन खर्च के अलावा समय भी बहुत लगता था और क्षेत्र भी सीमित ही रह जाता था। साथ ही बहुत अधिक परिश्रम करना पड़ता था। अमूमन दैनिक जीवन के उपयोग की वस्तुएँ  जैसे चाय, बिस्कुट,साबुन ,सर्फ़ पाउडर, टूथपेस्ट आदि का प्रचार तो हो जाता था परन्तु कुछ और भी उपभोक्तावादी वस्तुओं तथा साधन जो आम आदमी के जीवन की सुलभता से जुड़ा होता था जैसे शिक्षा , व्य्वसाय , भविष्य की योजनाओं के लिए बचत आदि के बारे में आम आदमी के बीच जानकारी का अभाव ही रहता था।बचत के महत्व को समझते हुए भी उनकी कुछ मजबूरियाँ थीं। मसलन बैंक हो या पोस्ट ऑफिस सब ही जगह अंग्रेजी भाषा की ही बहुलता थी। लेन -देन के लिए एक ही स्थान से बंधे रहना पड़ता था। आवश्यकता पड़ने पर रुपैये - पैसे निकालने में परेशानी होती थी। कभी - कभी बिलम्ब भी हो जाता था। आज सभी बैंक और पोस्ट ऑफिस तकनीकी रूप से विश्व के हर कोने से जुड़ा है। हर काम मिनटों में हो जाता है ।
      आज प्रचार के कई माध्यम हैं। प्रचार के माध्यमों में श्रव्य और दृष्टव्य  का महत्व तो  तकनीकी युग में प्रचार के लिए प्रिंट मीडिया  ( अखबार , पत्र - पत्रिकायें ,पैम्फलेट ,बैनर आदि ) और टी.वी .एवं इलेकट्रोनिक मीडिया द्वारा प्रदत्त सुविधाएं भी सशक्त और सक्षम भूमिकायें निभा रही हैं। आज हम इलेकट्रोनिक मीडिया के कारण गाँव - गाँव , कस्बे - कस्बे तक पहुँच गए हैं। यह आज के तकनीकी युग की बड़ी देन है। अब प्रचार के लिए  और भटकने की आवश्यकता नहीं है। हम इन उपलब्ध माध्यमों से जन - जन को जागरूक करने में सक्षम हैं। वह प्रचार उपभोक्तावादी वस्तुओं ,मकान -दुकान,पंखा ,फ्रिज,कूलर,का-स्कूटर बाइक,विजली इन्वर्टर , हो या कॉस्मेटिक   सामान हो या शैक्षणिक संस्थाओं ,व्यवसायों का , हम अधिकाधिक रूप से लाभान्वित हो रहे हैं।
         परन्तु प्रचार के लिए भाषा के महत्व को कम करके नहीं आँका जा सकता है। हिंदी हमारी मातृभाषा-राजभाषा तो है ही साथ - साथ यही हमारी संपर्क भाषा भी है। किसी भी वस्तु  या विविध कार्यों और योजनाओं के लिए हर क्षेत्र में हिंदी ही एक ऐसी भाषा है जो अति सरलता से जन -मानस के मन -मस्तिष्क और दिलों - दिमाग पर छा जाता है। आज सभी उत्पाद का महत्व हिंदी के माध्यम से प्रचार के कारण ही बढ़ा है। क्षेत्रवाद की बात हम छोड़ दें तो आज अपनी बात हिंदी में जितनी आसानी सेकहते और समझते हैं वह शायद दूसरी भाषाओं में नहीं।  बॉलीवुड को ही ले लीजिये ,हिंदी फिल्मों के कारण ही आज वह सफलता के उच्चतम शिखर पर है। देश में ही नहीं ,विदेशों में भी हिंदी फ़िल्में अपना छाप छोड़ती हैं। इसके गीत , संवाद  आदि सभी का माध्यम हिंदी है जो लोगों की जुबान और मस्तिष्क पर छाया रहता है। आज हिंदी सभी भाषाओं में सर्वाधिक बोली और समझने वाली भाषा बन गई है। पंजाब,हिमाचल,अरुणाचल, आसाम -बंगाल हो या केरल -कर्नाटक  या आंध्र प्रदेश, तामिलनाडू ही क्यों न हो हर प्रदेश में बोलने और समझने वालों की बहुतायत है। आज सभी जगह हिंदी ने अपना स्थान बना लिया है। हर प्रकार से प्रकार से पत्र -प्रपत्र में हिंदी का उपयोग होने लगा है।
        आज सभी जानते हैऔर समझते हैं कि सभी उत्पाद के वस्तुओं और योजनाओं के विज्ञापन का मह्यं हिंदी जन- मानस पर विशेष छाप छोड़ता है। अत: हम सुलभता और दावे के साथ कह  कि प्रचार में हिंदी की उपयोगिता बढ़ गयी है। इसके मह्त्व को हम कतई झुठला नहीं सकते हैं। 

Monday, February 3, 2014

हमारी नैतिकता


                  आज समाज में नारियों के साथ हो रहे दुष्कर्म की पराकाष्ठा हो गई है। हर वर्ग और हर वय के साथ इस  अमानवीय कृत्य के कारण विश्व में हमारी छिछालेदारी हो रही है। चाहे वह पश्चिम बंगाल की घटना हो या दिल्ली , महाराष्ट्र , मध्य प्रदेश ,उत्तर प्रदेश  या बिहार या कोई अन्य प्रदेश की ही क्यों न हो , सुन कर हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं , सिर  शर्म से झुक जाता है। हम यह सोचने को विवश हो जाते हैं -  " हमारी नैतिकता किस गर्त्य में जा रही है ? "
                 वैसे , यह समस्या भारत ही नहीं , अपितु कमोवेश विश्व के हर देशों की है।                   
                इतिहास गवाह है कि सम्पूर्ण विश्व में नारियों  की स्थिति दोयम दर्जे की है। इसकी जड़ें काफी गहरी हैं। हर युग में हर तरह से कमोबेश नारियों का शोषण होता रहा है।  हर युग में ही वह पुरुषों द्वारा छली जाती रहीं हैं।
                   सतयुग में गौतम ऋषि की पत्नि अहिल्या, देवाधिदेव इन्द्र द्वारा छली गईं और ऋषि द्वारा प्रताड़ित की गईं। त्रेता में सीता, द्वापर में मेनका पुत्री शकुन्तला और द्रौपदी अपने ही स्वजनों द्वारा प्रताड़ित की गईं  । कलियुग तो हम सब तो देख ही रहे हैं।
                   जहाँ -जहाँ नारियों ने प्रतिकार किया उन्हें यातनाएँ झेलनी पड़ी , किन्तु  अडिग हौसले ने उन्हें समाज में ऊँचा स्थान दिलाया। उनमें से कुछ जागरुक नारियाँ थीं तो कहीं उनकी प्रभुता ,कहीं उनका स्वयं का साहस काम आया। यथा यह सत्य है कि समाज में उनकी अशिक्षा ,गरीबी और प्राकृतिक रूप से उनकी शारीरिक संरचना के कारण अंदर से व्याप्त भय ही उनकी दुर्दशा का मूल कारण रहा रहा होगा।
                 किन्तु ,आज के वैश्विक ,विकसित और शिक्षित युग में भी स्त्रियों का शोषण ,शील हरण और प्रताड़ना ,विशेष कर जब कि हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं , चाँद , मंगल ग्रह और अंतरिक्ष की सैर कर रहे हैं ,जहाँ विदेशी ही नहीं ,भारतीय महिलाओं ने भी हर क्षेत्र में अपनी सफलताओं का परचम लहराया है ,ऐसे सदी में भी नारियों के प्रति पुरुषों की बर्बरता चरम पर है तो यह  भारत ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व के लिए अति शर्म की बात है।
                 स्त्रियों के साथ इस प्रकार के दुराचार और दुष्कर्म अमानवीय तथा असह्य और अक्षम्य अत्याचार है।
                  हम यहाँ अपने देश भारत की करें ,तो आज के सभी समाचारपत्रों में ,सभी समाचार चैनेलों पर प्रति दिन देश के किसी न किसी हिस्से से बलात्कार और व्यभिचार की घटनायें देखने और सुनने को मिलती हैं। यह सब देख -सुन कर सिर शर्म से झुक जाता है , नथनों में क्रोध भर जाता है किन्तु हम सभी पंगु बन हाथ पर हाथ धरे बैठे रह जाते हैं।
                  हम शाशन - प्रशाशन  की व्यवस्था को दोषी ठहराते हैं जो काफी हद तक सच है किन्तु कहीं न कहीं हम सब भी  दोषी हैं।आज हालात यह है कि अपने ही समाज ,परिवार और घर के बीच बेटियाँ सुरक्षित नहीं रह गईं हैं। हमारी नैतिकता इतनी खोखली और निम्न स्तर तक गिर गई है कि हम अनमोल संबंधों और रिश्तों की गरिमा को भी ताक पर रखने लगे हैं।
                   इस  दुष्कृत्य के कारण ही , भारतीय पुरुषों के लिए ,जर्मनी के प्रोफेसर द्वारा जो विशेषण प्रयुक्त हुए हैं ,वह हमें भविष्य के लिए सचेत करती है। ऐसा न हो कि अन्य देश भी इसी प्रकार के विशेषण प्रयोग कर भारतीय पुरुष समाज को तिरस्कृत करता रहे।  भी प्रकार के यौन अत्याचार की प्रवृतियों पर अंकुश लगनी ही चाहिए। ऐसे व्यक्तियोँ का न्यायायिक प्रक्रिया के साथ-साथ सामाजिक वहिष्कार भी होना चाहिए।
                  शाशन की लचर व्यवस्था और लम्बी न्यायायिक प्रक्रिया के कारण भी  इन्साफ मिलते - मिलते रह जाता है। क़ानून के लचरपन की वजह भी अपराधियों के मन में कोई खौफ नहीं है और वे बिना किसी डर के  नृशंश अपराध करते हैं।
                 
                  सन 2012 की 16 दिसम्बर की घटना के उपरान्त कुछ नए क़ानून का प्रावधान किया गया। उसमें भी कई कानूनी अड़चनों के कारण अपराधी को कहीं - कहीं बच निकलने का रास्ता मिल जाता है।
                   सन 2012 की घटना के बाद तो ऐसी घटनाओं में और भी बढ़ोत्तरी देखी जा रही है। 2012 की "निर्भया कांड" के बाद भी कितनी ही निर्भया का बलिदान हो गया। दिल्ली में 2014 की " कैव घटना " और नदिया जिला ( पश्चिम बंगाल  ) के नन के साथ हुए पाशविक  वृतियां हमें झकझोरती हैं। हम कुछ समय तक हो - हल्ला मचाते है ,फिर खामोश हो जाते हैं। 
                  आज ऊँचे ओहदे और माननीय कहलाने वाले व्यक्ति भी इस घिनौने कृत्य में संलिप्त पाये जा रहे हैं तो अशिक्षितों और निम्नकोटि और निम्न बुद्धि वालों से क्या अपेक्षा की  जा सकती है। इतना क्यों  गिर गया है यह पुरुष समाज ?
                 जहाँ तक तरह के अपराधिक प्रवृतियों में संलिप्त माननीयों का प्रश्न है तो उन्हें कतई भी किसी भी प्रकार कीछूट नहीं मिलनी चाहिए चाहे वे कोई भी हों , किसी भी पद पर हों या परिवार  क्यों न हों। हम भारतीय परंपरा के अनुसार अपने से उम्र में बड़े और ओहदेदार व्यक्ति को अपना आदर्श मान कर उन पर विश्वास करते हैं। जब वे ही ऐसे गर्हित कार्य करने लगें तो फिर छोटे कहाँ जाएँ ,किस पर विश्वास करें।
                   इस दिशा में सामाजिक क्रान्ति की आवश्यकता है। आज के सामाजिक परिवेश में भाईचारे और संवाद की कमी होती जा रही है। इन्हें पुनर्जीवित करना होगा। परिवार और समाज के बड़े-बुजुर्गों को आपसी  संबंधों की गरिमा का महत्व परिवार और समाज को  बतलाना होगा। युवाओं का सही मार्गदर्शन करना ही होगा। तभी स्वच्छ समाज - परिवार कल्पना सार्थक हो सकेगी और इस प्रकार के अपराधों पर विजय प्राप्त कर सकें।
                    बहरहाल ऐसे निंदनीय घटनाओं का , चुप नहीं बैठ कर  पुरजोर विरोध करना होगा। ऐसे चेहरों पर से नकाब उठाना ही होगा। इन्हें समाज में खुले आम तिरस्कृत करना होगा। शाशन की व्यवस्था भी इतनी चुस्त हो कि जो भी इस तरह के अपराध में लिप्त पाया जाए उसको शीघ्र से शीघ्र कठोर से कठोरतम सजा का प्रावधान हो ताकि ऐसे जघन्य कुकृत्य पर रोक लग सके।
                  
 ( प्रकाशित )