सफर कोई भी हो , हमसफर मिल ही जाते हैं। ऐसे ही एक सफर की यह कहानी है। फरवरी का अंतिम सप्ताह था जब हमने गोवा जाने का प्रोग्राम बनाया। निज़ामुद्दीन से राजधानी एक्सप्रेस ठीक समय 11 बजे छूट गई। हमारे बैठने के थोड़ी देर बाद ही कैटेरिंग से पानी का बोतल और फिर चाय आ गई। हमलोग अभी अपने - अपने सामान एडजस्ट करने में ही लगे थे। सामान एडजस्ट करने के बाद हमने चाय पी। हमारी दोनों बर्थ नीचे की आमने - सामने की ही थी। ऊपर वाले बर्थ पर एक लड़का था जो अभी हमारे साथ ही बैठा था। हमारे केबिन का ऊपर का बर्थ खाली था। खाना खाने के बाद उस लड़के से हमारी बात - चीत होने लगी।उसने बताया कि वह त्रिवेन्द्रम में रहता है। वैसे वह दिल्ली का रहने वाला है। बातों में हम इतने मगशूल हो गये कि हमें पता ही नहीं चला कि शाम हो गई है। रात का खाना खाने के बाद हम लोग सो गये। सुबह हमारे उठने से पहले ही चाय आ गई थी। फिर हम सब ने चाय पी। मैंने उसे अपने पास रखी मिठाई भी खिलाई। पहले वह मना करता रहा पर मेरे विशेष आग्रह पर उसने मिठाई खा लिया। मेरी श्रीमती जी तो चाय पीने का बाद फिर से सो गईं। परन्तु हम उस लड़के के साथ बात करने लगे। वह लड़का मुझे शिक्षित और शिष्ट लगा। कभी - कभी हम केबिन के अंदर से ही बाहर का नजारा भी देख रहे थे। सुबह - सुबह की धूप में बाहर का नजारा भी मनमोहक लग रहा था। बात - चीत के क्रम में उसने अपने जीवन की एक रोचक और मजेदार वाकया सुनाया जिसे सुनकर हम खूब हँसे भी। उसने जो सुनाया वह मैं आपको ज्यों का त्यों सुनाता हूँ। " बहुत पुरानी बात है। एक बार मेरे पिता जी के एक दोस्त ने मुझे अपने घर खाना खाने पर बुलाया। तब मैं कॉलेज का विद्यार्थी ही था। उन दिनों मैं घर पर अकेला ही था। माँ और पिता जी कुछ घरेलु कार्यवश बहर गए हुए थे। वैसे मुझे कहीं किसी के घर आना - जाना पसन्द नहीं था। किन्तु मैं उनके घर चला गया था। वह इसलिए कि उनके घर हमारा पहले से भी आना - जाना था। वह एक देर शाम का वाकया है। उन्होंने दरवाजा खोल कर स्वागत किया। इधर - उधर की कुछ बातें हुईं। फिर खाने का समय हो गया था। खाने की मेज पर हमारा खाना लगाया गया। मैं भी जल्द से जल्द घर वापस आना चाह रहा था। तभी खाना खाने के बीच में बड़े प्यार से वे कहने लगे - खाना कैसा लगा ? फिर मेरे उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना बोले सब्जी मैंने काटे - छीले हैं ताकि जल्द से जल्द खाना बन सके और यह जो पुदीने - धनिया की चटनी तुम खा रहे हो , जानते हो इसे किसने बनाया ? यह मेरे बेटे रॉनी ने बनाया है - बड़ी मेहनत से उसने हाथों -पैरों से पीस - पीस कर बनाया है। एकबारगी मेरा मन कसैला हो गया। मैंने सिर उठा कर उनकी तरफ हिकारत से देखा - यह सरासर मेरा अपमान था। यह रॉनी दरअसल उनके डॉगी का नाम था ,वह बोलते रहे , हाँ - हाँ मैं सच कह रहा हूँ। बेचारा रॉनी हाँफता रहा परन्तु चटनी पीस कर ही दम लिया। मैंने कोई प्रत्युत्तर नहीं दिया। मैं खाने से उठ गया और अपने घर वापस हो लिया। तब से आज तक मैं दुबारे उनके घर नहीं गया। पता नहीं उनका वह बेटा रॉनी अब भी उनके साथ है या कहीं और। इतना कह कर वह मेरी तरफ देख कर हलके से मुस्कुराया, शायद वह मेरी प्रतिक्रिया जानना चाह रहा होगा। उसके साथ -साथ मेरा मन भी कसैला हो गया था। मैंने उससे सिर्फ इतना ही पूछा - क्या तुम्हें तब गुस्सा नहीं आया ? तब तो तुम युवा ही रहे होगे ? उस लड़के ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया - " नहीं " । फिर कुछ रूक कर उसने जो कहा वह सुन कर उसका शान्त और आत्मविश्वास से लवरेज़ चेहरा देख रहा था।
उसने कहा - मैं अपना मुँह गन्दा क्यूँ करता। वह स्वयं ही अपनी रुग्ण और ओछी मानसिकता का परिचय दे रहे थे। वह मुझे दम्भी और विकृत प्रवृति के लगे। ऐसा व्यक्ति चाहे कितना ही धनवान हो जाए। उसकी ओछी हरकत किसी से छुपी नहीं रह सकती। उनहोंने अपने लिये यही पूंजी एकत्रित की थी।
समय बहुत निकल गया था। मेरा गन्तव्य स्टेशन मडगांव आने ही वाला था। उसे तो और भी आगे जाना था। मैं अपने स्टेशन पर उतर गया। उसने मेरे सामान उतारने में भी मदद की। मैं घर चला आया। उस लड़के की तथा उसके साथ हुई घटना की याद अब भी आती है , कैसे -कैसे विकृत मानसिकता के लोग होते हैं ? दूसरे का अपमान करने में ही गर्व करते हैं। सचमुच ऐसे लोगों का साथ तो छोड़ ही देना चाहिये।
उसने कहा - मैं अपना मुँह गन्दा क्यूँ करता। वह स्वयं ही अपनी रुग्ण और ओछी मानसिकता का परिचय दे रहे थे। वह मुझे दम्भी और विकृत प्रवृति के लगे। ऐसा व्यक्ति चाहे कितना ही धनवान हो जाए। उसकी ओछी हरकत किसी से छुपी नहीं रह सकती। उनहोंने अपने लिये यही पूंजी एकत्रित की थी।
समय बहुत निकल गया था। मेरा गन्तव्य स्टेशन मडगांव आने ही वाला था। उसे तो और भी आगे जाना था। मैं अपने स्टेशन पर उतर गया। उसने मेरे सामान उतारने में भी मदद की। मैं घर चला आया। उस लड़के की तथा उसके साथ हुई घटना की याद अब भी आती है , कैसे -कैसे विकृत मानसिकता के लोग होते हैं ? दूसरे का अपमान करने में ही गर्व करते हैं। सचमुच ऐसे लोगों का साथ तो छोड़ ही देना चाहिये।