Monday, April 17, 2017

हम और हमारा परिधान

             आज हम कहीं भी जायें , हमें अपने चारों ओर भिन्न - भिन्न तथा अजीबो -गरीब फैशन का नजारा देखने को मिलता है। हमारा पहरावा कैसा हो , यह हमें ही तय करना है। साथ - साथ हमें घर , परिवार, समाज और राष्ट्र का मान भी रखना है। हमारे परिधान से ही हमारे परिवार ,समाज और राष्ट्र का सम्मान और संस्कार झलकता है।
             आज जो हम चारों तरफ विभिन्न व अजब - गजब के परिधानों में लिपटे स्त्री - पुरुषों , युवक -युवतियों को देखते हैं तो एक प्रश्न मन में उठता है - क्या शरीर का सौंदर्य दिखाने से ही वास्तविक सौंदर्य दिखता है ? क्या सौंदर्य ही व्यक्तित्व का मापदंड है ? आखिर हम ऐसे अधखुले पहनावों  से समाज को क्या दिखाना चाहते हैं ? जिस्म का प्रदर्शन और खुलापन विकार तो ला सकता है पर सौंदर्य का प्रतीक नहीं हो सकता।
             आज  ( विशेष कर बड़े शहरों में ) आँचल की अवधरणा तो  लुप्तप्राय हो गई है ( अभी मृतप्राय   नहीं हुई है ) जिसका महत्व कभी एक मायने रखता था , जो स्त्रियों की गरिमा और शीलता का परिचायक होता था। पता नहीं हमारी बुद्धि , हमारा विवेक कहाँ खो गया है  ? आज हम सिनेमा , टी.वी पर दिखाए जाने वाले नाटकों तथा विज्ञापनों में दिखाये नायकों - नायिकाओं के परिधानों को ही अपनाने में अपना गौरव महसूस करते हैं। आज कोई भी विज्ञापन बिना स्त्रियों के पूर्ण नहीं दीखते हैं। यहाँ उनका व्यवसायिक रूप में वस्तु की तरह इस्तेमाल होता है और वे इस्तेमाल होती हैं। हम उन्हीं के अनुरूप परिधानों को अपनाते हैं। उन्हें तो पैसा कमाना है  , अत: वे न तो किसी भी तरह के परिधानों के पहनने से गुरेज करती हैं न ही अंग प्रदर्शन से।
              यदि कोई संस्था , कोई स्कूल , कोई कार्यालय  ड्रेस - कोड की बात करता है तो स्त्रियों की आजादी के नाम पर ववाल मचता है। स्त्रियों की आजादी का अर्थ क्या समझा जाए - फूहड़पन पहिरावा क्या आजादी का पर्याय है ? इससे हम अनचाहे मुसीबत को आमंत्रण तो देते ही हैं साथ - साथ हम कई तरह के चर्म रोगों को भी  आमंत्रित करते हैं। वायु में इतना प्रदूषण है कि शरीर का जो भाग खुला रहता है उस पर दूषित वायु जिसमें  कई प्रकार के विषाक्त धूल- कण होते हैं , संसर्ग में आते हैं और हमारे शरीर की त्वचा को रुग्ण करते हैं।
               पहनावा तो वय , समाज और देश व काल के  अनुरूप ही धारण करना चाहिए। पहनावा ऐसा हो कि जिसमें उस व्यक्ति  ( स्त्री - पुरुष ) की गरिमा और स्त्रियों की स्मिता की झलक हो।
               यह सही है कि आज स्त्रियां पुरुषों के कदम से कदम मिला कर चल रही हैं , हर क्षेत्रों में उन्नति कर रही हैं  - स्वागत है उनका और धन्यवाद भी। तथापि जिस आजादी व स्वतंत्रता की बात परिधान के लिए होती है , वह आकर्षण तो पैदा कर सकती है  , सम्मान नहीं दिला सकती है। इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता पर इसे स्वीकारने में न जाने क्यों लोगों को झिझक होती है।
                आजादी और आधुनिकता की चाह में आधुनिक फैशन की होड़ में ऐसे खुले अंगों वाले परिधानों की ओर धनाढ्य घरों और उच्च मध्यम वर्गों  की महिलाओं  के साथ - साथ ( विशेष कर ) युवतियां आकर्षित होती हैं। एक दूसरे की देखा - देखी , एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा , टी.वी सीरियलों , विज्ञापनों और सिनेमाओं की तारिकाओं की वेश - भूषा अपरिपक्व मस्तिष्क को प्रभावित करती हैं। इसी चमक - दमक को वे सभी अपनाना चाहती हैं - परिणाम , दुष्परिणाम से बेखबर , निश्चिन्त। लेकिन इसका दोष केवल लड़के व लड़कियों को ही नहीं दिया जा सकता। अभिभावक विशेष रूप से जिम्मेदार हैं जो अपनी संतानों को सौंदर्य की सही परिभाषा सम्पादित नहीं कर पाते हैं। आज का समाज भी दोषी है। साधारण तौर - तरीके और सलीके के वस्त्रों में रहने वाले परिवार को पिछड़ा , दब्बू और दकियानूस बताने में हिचकिचाते नहीं हैं। लिहाजा उन्हें भी उसी हवा में बहना  होता है।
               यह हमें नहीं भूलना चाहिए कि जीवन की दौड़ में जब हम किसी इंटरव्यू - साक्षात्कार के लिए जाते हैं तो हमारे परिधानों  पर विशेष गौर किया जाता है शालीनता को ही प्रधानता देते हैं अथवा कार्यालय के मापदण्ड के अनुरूप  परिधानों की प्राथमिकता होती है। उसके बाद ही शैक्षणिक और बौद्धिक परीक्षाएं होती हैं।
               हम बस अपने - आप में सिमट कर सिर्फ आज को देखते हैं।  यद्यपि भविष्य हमारे हाथ में नहीं है , जो है सिर्फ आज है , आज का पल है। तथापि हम सभी भविष्य का ताना - बाना बुनते तो हैं , लेकिन वह भी सीमित। हम यदि अपने अगले भविष्य की संतति की ओर गौर करें तो शायद हम और आप स्वयं सोचेंगे कि आने वाले संतति को हम क्या परोसेंगे। उन्हें जीवन जीने को कौन सा सलीका सिखलायेंगे। यदि इन सब बातों पर गौर करेंगे तो निश्चय ही सही तरीके से जीना और रहना आ जाएगा , यह विश्वास है।

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