Tuesday, September 15, 2015

राजनीति और सेवा

              राजनीति और सेवा - दो अलग - अलग धारायें हैं। सेवा करने वाले राजनीति नहीं करते और राजनीति करने वाले सेवा नहीं करते। यह निर्निवाद सत्य है। सच यह भी है कि देश की प्रगति सरकार से  नहीं , देश में काम करने वाले कामगारों और मजदूरों के कंधों पर है।  सरकार का काम सिर्फ और सिर्फ नीति निर्धारण का है -अमल में लाना कामगारों का। लेकिन जब यह व्यवस्था भी पटरी से उतरने लगे , भ्रष्टाचार की नाव में सवार होने लगे  , तो फिर ईश्वर ही मालिक है। मेरा मानना है कि सांसद और विधायक " सरकार " का एक हिस्सा हैं जो नीति निर्धारण में सहयोग करते हैं। अपने - अपने क्षेत्र की पहचान सांसदों और विधायकों को होनी चाहिए , क्षेत्र की समस्याओं से  उन्हें अवगत होनी चाहिये एवं उनके समाधान को सरकारी अमले को लगाया जाना चाहिये जिसमें क्षेत्रवासियों के सहयोग को भी समावेशित किया जाना चाहिये , क्योंकि क्षेत्रवासी ही अपने क्षेत्र की समस्याओं के सबसे निकट होते हैं।
                 सांसद निधि और विधायक निधि भी इसी काम के लिए जारी किया जाता है जिसका भरपूर उपयोग सांसदों और विधायकों  द्वारा किया जाना चाहिए। इससे उनकी साफ़ - सुथरी छवि तो जनमानस में बनती ही है साथ में उनका सम्मान भी बढ़ता है। मेरा मत है कि सहजता और सरलता सांसदों और विधायकों का अस्त्र होना चाहिए , गुण होना चाहिए। जो जितना सहज होगा ,सरल   होगा , वही जनता के दिल पर राज करेगा। उसे फिर किसी बात का भय नहीं रहेगा , न उसे किसी विशेष सुरक्षा की ही आवश्यकता महसूस होगी ,  न ही किसी चुनाव में हारने का डर।
                  नेता और जनता के बीच समन्वय हो , संवाद हो ,निकटता हो - बहुधा यह देखने को नहीं मिलता। नेता बनते ही दोनों के बीच की दूरियाँ बढ़ जाती हैं। जिस कारण नेता की लोकप्रियता घटने लगती है। जनता के दुःख - दर्द को स्वयं में महसूस करना और चुनाव को ध्यान में रख कर पैदल गाँव - गाँव घूमना ,घर - घर पहुँचना , दिखावटी हमदर्दी जतलाना , दोनों अलग - अलग अस्तित्त्व रखती है। आम जनता भी इस मनोभाव को खूब समझती है और उसी अनुरूप समय आने पर माकूल जबाब भी देती है।
                 हमारे पास संसाधन की कोई कमी नहीं है - कमी है तो बस मनोबल की ,दृढ संकल्प की, इच्छा शक्ति की ,स्व के इर्द - गिर्द घूमते रहने की। हम त्याग का उपदेश बहुत देते हैं पर स्वयं त्याग करने से कतराते हैं। " पर उपदेश कुशल बहुतेरे "।
                  काम कोई छोटा या बड़ा नहीं होता।  काम तो काम है -चाहे वह दीवार बनाने का हो ,मोची का जूता गाँठने का हो , बढ़ई का काम हो ,ऑफिस - कार्यालय का हो , चाहे हम पुलिस में हों या फिर फ़ौज में, डॉक्टर हों या दुकानदार - काम का कोई भी क्षेत्र हो , उसमें हम थोड़ी सी भी ईमानदारी निभायें तो समाज का उत्थान होगा ही होगा , हमारा भी मान - सम्मान ,यश बढ़ेगा। यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है और मानना भी। हम जहाँ भी काम करें , जिस पद पर भी काम करें ,अपनी जिम्मेदारी समझें , जवाबदेही समझें , काम के प्रति ईमानदारी बरतें।  यह हमारा लक्ष्य होना चाहिये। इसमें कभी चूक भी हो सकती है , फिर भी हम सतर्क रहें कि चूक की पुनरावृति न हो। ग्रह - नक्षत्र , तारे - सितारे , चाँद -सूरज , प्रकृति सभी एक नियम में बद्ध हैं।  इनमें ज़रा सी भी अनियमितता आ जाने से क्या -क्या उथल - पुथल हो जाता है। यही बात हमारे जीवन पर भी लागू है। हमारे आचरण और स्वभाव - विचार पर भी लागू है।
                    तो , आइये , हम राष्ट्र की समृद्धि में, राष्ट्र के विकास में अपना योगदान करें।  अपने आचरण और विचार को स्वच्छ करें और एक नए उन्नत समाज औए राष्ट्र के निर्माण में अपनी सहभागिता अर्पित करें। जय भारत , जय भारत राष्ट्र।

 ( प्रकाशित )

                     
    
                         
     

Wednesday, August 19, 2015

हिन्दी दिवस


               प्रत्येक वर्ष हम 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस मनाते हैं। कभी - कभी आवाज उठती है कि हम हिन्दी दिवस क्यों मनाते हैं ,जबकि यह हमारी मातृभाषा है। क्या बाध्यता है ? यह राजभाषा क्यों है ? राष्ट्रभाषा क्यों नहीं है ?
                भारत को आजादी मिलने के पश्चात सरकारी कामकाज में अधिकृत भारतीय भाषा का चयन आवश्यक था।  भारत में बोली जाने वाली भाषाओं में , हिन्दी सर्वाधिक बोलने , समझने वाली भाषा थी ( और है भी ) । अत: 14 सितम्बर  1949  को संवैधानिक रूप से हिन्दी  ( देवनागरी लिपि ) को सरकारी कार्यालयों में कामकाज के लिए अधिकृत किया गया तथा 26 जनवरी 1950 से इसे लागू कर दिया गया। इसलिए हम प्रति वर्ष की 14 सितम्बर के दिन को हिन्दी दिवस के रूप में मनाते हैं।
                 सच तो यह है कि हम रोज ही हिन्दी दिवस मनाते हैं - रोज हिन्दी बोलते , पढ़ते , लिखते और हिन्दी में ही सोचते हैं। हिन्दी सिनेमा भी अधिक देखते हैं। यहां तक कि हम सपने भी हिन्दी में  देखते हैं। इस तरह से हम रोज ही हिन्दी दिवस मनाते हैं। फिर भी हमें प्रत्येक वर्ष की 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस के रूप में मनाना पड़ता है - क्योंकि कुछ राज्यों तथा कुछ प्रतिशत लोगों एवं सरकारी तंत्र ,  अभी भी अंग्रेजी गुलामी वाली मानसिकता से उबर नहीं पाये हैं , उन्हें जगाया जा सके। उन्हें अपने देश और भाषा के सम्मान तथा उन्नति के लिये कुछ करने की प्रेरणा मिल सके। दूसरी यह कि जितना ही अधिक प्रचार और प्रसार होगा , हिन्दी उतनी ही समृद्ध होगी।
                    अंग्रेजी काल के 200 वर्ष की गुलामी के कारण विकृत अंग्रेजियत मानसिकता , अधिकारी तंत्र की हठधर्मिता तथा वोट की राजनीति  ( एवं कुछ क्षेत्रीय संकुचित मनोभाव के कारण भी ) हिन्दी को जो राष्ट्रभाषा का गौरव प्रदान होना चाहिए वह प्राप्त नहीं हो पाया है और यह संप्रति राजभाषा बन कर रह गई है। किन्तु इसका विकास अवरुद्ध नहीं हुआ है।  यह निरंतर विकास के पथ पर अग्रसर है। क्षेत्रीय  भाषा के आधार पर भारत के राज्यों को हिन्दीभाषी तथा अहिन्दीभाषी क्षेत्रों के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इनमें बिहार , उत्तर प्रदेश ,मध्य प्रदेश ,झाररखण्ड ,उत्तराखंड ,
 छत्तीसगढ़  ,हरियाणा ,राजस्थान और हिमाचल ( महाराष्ट्र में मराठी तथा हिन्दी ,दोनों भाषाएँ प्रचलित हैं तथा केंद्र शासित दिल्ली भी हिन्दीभाषी क्षेत्र जाने जाते हैं ) हैं।
                     सत्यता यह है कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत का कोई भी राज्य ऐसा नहीं है जहाँ के लोग कमोबेश हिन्दी नहीं समझते हैं। वरन , समझते ,बोलते , पढ़ते हैं और सीखने की कोशिश भी करते हैं। पंजाब में अगर लोग हिन्दी बोलते नहीं हैं तो समझते तो हैं ही। यही हाल कश्मीर की भी है। अकेले मुंबई  ( महाराष्ट्र ) बॉलीवुड से कितनी ही हिन्दी फिल्में  तैयार की जाती हैं।  सभी जगहों पर दिखाई जाती हैं ,पसंद भी किया जाता है। लोग इसके गानों को याद करते हैं , गुनगुनाते हैं।
हिन्दी समाचारपत्रों , टी. वी चैनलों की भी भरमार है जो रात-दिन चलती रहती हैं। यह हिन्दी का विकास नहीं तो और क्या है ?
                      मैं स्वयं भारत के कई स्थानों पर गया हूँ - बंगलुरु ,मैसूर ,ऊटी ,कोच्चि , कोल्लम ,तिरुअनन्तपुरम , कन्याकुमारी  ( जहाँ अधिकांशत: हिन्दीभाषी लोग मिलते हैं , खूब सरलता से हिन्दी समझते हैं और बोलते भी हैं ) , हर जगह हिन्दी समझने और बोलने वाले लोग मिल जाते हैं। कुछ जगह विशेष ( कर्नाटक ,आंध्रप्रदेश , तमिलनाडू ) में कुछ कठिनाइयाँ हैं जहाँ क्षेत्रीय भाषाओं  का सर्वाधिक महत्व है।
                       मुझे सुखद आश्चर्य हुआ जब मैंने अप्रैल 2015 में बंगलोर की कुछ पुस्तकों की दुकानों पर हिन्दी अखबार  तथा हिन्दी पत्रकायें भी देखी। लोग मुझे हिन्दी समाचारपत्र पढ़ते भी दिखे। मुझे लगा , कुछ विलम्ब हो सकता है , किन्तु हिन्दी का विकास निश्चित है।
                       चीनी भाषा के बाद यह विश्व में सबसे अधिक  बोली जाने वाली भाषा जानी जाती है। भारत और अन्य देशों सहित 258 करोड़ से अधिक लोग स्वभाविक / जन्मगत  रूप से हिन्दी बोलते हैं।विश्व में इसका स्थान चौथे पायदान पर  है। पड़ोसी राज्य नेपाल और पाकिस्तान भी  मामले में अपवाद नहीं है। यह विश्व में फिजी ,मॉरीशस , गुयाना ,सूरीनाम ,जैसे दूसरे देशों में भी अधिकतर जनता हिन्दी बोलती है। इसके अतिरिक्त जर्मनी ,ब्रिटेन ,यूनाइटेड स्टेट ,रूस ,फ्रांस ,साउथ कोरिया ,मलेशिया ,पोलैंड, रूमानिया ,उक्रेन आदि जगहों की जनता  हिन्दी पढ़ती हैं और हिन्दी पढ़ना - बोलना पसंद  करती हैं।
                            विगत कुछ वर्षों से विश्व हिन्दी दिवस भी मनाया जाने लगा है जो प्रति वर्ष के जनवरी माह की 10 तारीख को होता है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि हिन्दी संयुक्त राष्ट्र संघ की सातवीं ऑफिसियल लैंग्वेज है।
                             हमारे पूर्व प्रधान मंत्री  श्री अटलविहारी वाजपेयी जी ने बहुत पहले ही
 संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी में व्याख्यान दे कर सबको चौंका दिया और हिन्दी के विकास का एक ईंट रख दिया था। अभी - अभी अबुधबी  ( यू . ऐ . ई ) में हमारे वर्तमान प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने अपना भाषण हिन्दी में दिया जिसे वहाँ की जनता तथा वहाँ बसे भारतीय ही नहीं विश्व के अन्य भागों के लोगों ने भी सराहा।  निःसंदेह भारत का गौरव बढ़ा है - हिन्दी बढ़ा है।
                               यहाँ यह बताना सार्थक होगा कि भाषा का विकास और शिक्षा दो अलग - अलग
पहलू हैं। शिक्षा के विकास के लिए हमें अन्य भाषायें भी , जो हमारी उन्नति में सहायक हो सीखनी चाहिए ताकि हम हर  क्षेत्र में पैर जमा सकें। लेकिन जब भाषा का प्रश्न खड़ा हो तो बेहिचक अपनी मिट्टी की भाषा ही सर्वतोन्मुखी है। उसके विकास के लिए निरंतर प्रयास की आवश्यकता है। अत: आइये हम सब मिल कर " हिन्दी दिवस " मनायें। हिन्दी को विकास की चोटी पर ले जायें और वह राजभाषा से ऊपर उठ कर राष्ट्रभाषा बन जाये।

  ( प्रकाशित )

Tuesday, May 5, 2015

सफलता की कुंजी

प्यारे बच्चों ,          

                 आप सभी होनहार हैं। अपने माता-पिता , गुरुजनों के प्रिय हैं। आप से हम सबों को और देश को बहुत आशाएँ हैं। हम सब आप की सफलता की कामना करते हैं।
                 जीवन में सफलता पाने व आगे बढ़ने के लिये मेहनत  ( परिश्रम  ) ,लगन और ईमानदारी , इन तीन बातों का होना अति आवश्यक है।क्षेत्र चाहे पढ़ाई का हो , खेल का हो या कोई अन्य कार्य का हो , पूरी ईमानदारी ,दृढ़ता और मेहनत से जुट जाना चाहिए।
                  दूसरी , जो , जीवन में सफलता के लिए बहुत ही आवश्यक है - वह है- COMMITMENT - PROMISE  अर्थात वादा। आप पूरे मन से अपने - आप से प्रॉमिस करे , वादा करें, निश्चय करें - यह काम, यह पढ़ाई , यह खेल आपको भली - भाँती करना है -आप ही करेंगे , तो निश्चय ही यह कार्य आप करेंगे। कार्य कोई भी हो , शुरु करें तो उसे अधूरा न छोड़ें , उसे पूरा करें।
                     कभी-कभी , कार्य करने में कठिनाइयाँ भी आती हैं , बाधाएं भी आती हैं। इन बाधाओं से , इन कठिनाइयों से घबराना नहीं चाहिए , ना ही , हिम्मत ही हारनी चाहिए।
                    इसी प्रकार , जीवन में  किसी से कोई प्रॉमिस -वादा करें तो उसको पूरा करने का प्रयास करें। इससे आपके मन का आत्मविश्वास बढ़ेगा। इससे परिवार में, समाज में दोस्तों में ,आपका सम्मान होगा और जीवन के हर क्षेत्र में आप आगे ही आगे बढ़ते जाएंगे।
                   इसी विश्वास के साथ , हम एक बार फिर आप सभी के जीवन में सफलता की कामना करते हैं।
                                                        ----  विजय कुमार सिन्हा  " तरुण "
                                                               
दिनांक - 05 - 05 - 2015 .

Thursday, March 26, 2015

" आँखें "


मॉल में आज बहुत भीड़ थी। शहर का सबसे सुंदर और बड़ा मॉल था। घूमते-घूमते रमन की नजर सामने टेरेस पर खड़ी एक लड़की पर गई। रह -रह कर वह अपनी कलाई की ओर देख रही थी। उसकी अाँखे किसी के इन्तजार में बेचैन सी दिखी - " आँखें " सहसा रमन को झटका सा लगा,कहीं कुछ उसके दिल में चुभा। वह वहाँ से तुरंत घर वापस आ गया। रात आधी से ज्यादा बीत गई थी। रमन की आँखों में नींद नहीं थी। कभी वह बिस्तर पर करवटें बदलता, कभी उठ कर कमरे में टहलने लगता। उसके माथे पर परेशानी की लकीरें स्पष्ट देखी जा सकती थीं। उसे अब भी लगता कि वो दो "आँखे " अब भी उसे देख रही हैं। हाँ ,वो " दो आँखें ",
जो उसने आज से करीब चालीस साल पहले अंतिम बार देखी थी। एक लंबा गुजरा हुआ अंतराल। तब वह हाई स्कूल का छात्र था और वह  इंटर की छात्रा थी। स्कूल घर से लगभग तीन - चार किलोमीटर दूर था। उन दिनों  को-एजुकेशन का इतना प्रचलन नहीं था। दोनों अलग - अलग स्कूल में थे। पर आने -जाने का रास्ता एक ही था और समय भी। इस आने -जाने के क्रम में कब वे एक दूसरे को चाहने लगे, पता ही नहीं चला। यही चाहत धीरे -धीरे प्यार में बदल गया।
        दोनों एक ही मोहल्ले के थे।दोनों के घरों के बीच बहुत फासला था। स्कूल का रास्ता उस लड़की के घर के ठीक सामने से गुजरता था। वह  रोज ही स्कूल के लिए घर से सहेलियों संग तब निकलती थी जब उसे दूर से ही रमन दोस्तों संग आता दिखाई देता था।रमन का आकर्षण भी उसमें बढ़ने लगा पर उससे कैसे कहे कि वह भी उसे चाहने लगा है। अभी तो उसकी उम्र भी चाहने, न चाहने की नहीं थी। किन्तु प्यार और आकर्षण कोई उम्र नहीं देखता।  धीरे - धीरे समय गुजर रहा था। रस्ते में आँख मिचौली भर हो जाती थी। इससे अधिक कुछ नहीं। उम्र का डर, समाज का डर, घर-परिवार का डर ,सब साथ-साथ चल रहा था।हाई स्कूल के बोर्ड की परीक्षा के दिन निकट आ गए थे। रमन परीक्षा की तैयारी में जी -जान से लगा  था। उन्हीं दिनों एक शाम एक छोटा सा लड़का ,उम्र यही कोई आठ -नौ साल का रहा होगा ,रमन के घर आया। उसने कहा - वह अंकित है और दीदी ने उसके लिए किताबें और नोट्स भेजे हैं। एक क्षण के लिए तो रमन भौंचक्का रह गया। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह क्या हुआ। उसने किताबें व नोट्स अंकित से ले लिए। अंकित के जाने के बाद रमन ने देखा -वो इंग्लिश और गणित के कुछ नोट्स, कुछ किताबें ,विगत कुछ वर्षों के बोर्ड के प्रश्न पत्र तथा  साथ में एक छोटा चिट था -" रमन यह तुम्हारे लिए, मन लगा कर तैयारी करो-शुचिता "।रमन का दिल बाँसों उछलने लगा -अच्छा तो यह शुचिता है।उस रात उसे नींद नहीं आई। शुचिता के ख्याल में ही डूबता -उतराता रहा। वह उसका सान्निध्य ,उसकी निकटता पाने को बेताब हो रहा था। अगले दिन स्कूल जाते हुए रमन ने आँखों ही आँखों में उसका आभार जताया।
        बोर्ड की परीक्षा की तैयारी के लिए रमन की छुट्टियाँ पड़ गई। अब दोनों का रोज का मिलना बंद हो गया था। इसी बीच एक दुर्घटना हो गई। शुचिता के चाचा का अचानक ह्रदय गति रूकने से मौत हो गई। घर में कोहराम मच गया। मोहल्ले के ढेर सारे लोग वहाँ इकट्ठे हो गए थे। खबर सुन कर रमन भी पहुँच गया। उनकी उम्र अधिक नहीं थी किन्तु बहुत शराब पीते रहने के कारण उनका फेफड़ा खराब हो गया था। उनके दो छोटे - छोटे बच्चे थे। सात साल की रम्या और चार साल का हेमन्त। शुचिता के दादा - दादी का रो -रो कर बुरा हाल हो रहा था। उसकी चाची मूर्छित हो कर गिर पड़ी  थी। उनके दाँत भिंच गए थे। उसे होश में लाने के लिए लोग पानी के छींटे मार रहे थे। रमन ने तत्परता दिखाई। जेब से रुमाल निकाल कर अपनी ऊँगली में लपेट कर बामुश्किल उनकी दाँतो के बीच डाल कर होश में लाने का प्रयत्न करने लगा। कुछ ही देर में उनकी बेहोशी टूटी। सहारा देकर उन्हें बिठाया,पानी पिलाया अपने कंधे पर उनका सिर रख कर सहलाया,ढाढ़स बँधाया। उनकी आँखों से अब भी आँसू बह  रहे थे।रमन वहाँ बहुत देर तक रहा। इस घटनाक्रम के बाद से शुचिता के घर - परिवार से रमन की निकटता सहज और सम्मानजनक हो गई थी। शुचिता की नजरों में भी वह ऊपर उठ गया था।
            रमन कभी - कभी दादा जी से मिलने चला जाता था। उनकी तबियत अक्सर ख़राब रहा करती थी।समय आगे बढ़ रहा था। रमन को अब रिजल्ट का इन्तजार था। वह अच्छे नंबरों से पास हो गया था। उन  दिनों हाई स्कूल पास कर जाना ही  बड़ी बात होती थी। मोहल्ले में उसका सम्मान बढ़ गया था।अब वह कॉलेज जाने लगा था।उसका आत्मविश्वास भी बढ़ गया था। जब तक रमन ने आई. एस. सी .किया ,शुचिता भी  बी.ए में आ गई थी। रमन का शुचिता से मिलना सुलभ हो गया था। दोनों एक दूसरे से मन ही मन में प्यार करने लगे। लेकिन यह क्रम बहुत दिनों तक नहीं चल पाया। शुचिता के विवाह की बात चलने लगी थी। उसके पिता बिजली विभाग में अच्छे ओहदे पर थे। वे जल्द से जल्द बेटी का विवाह कर देना चाहते थे। शुचिता उदास रहने लगी थी।रमन इन सब बातों से बेखबर वैसे ही उससे मिलता रहा। एक दिन लड़की देखने को लड़के वाले आने वाले  थे। उस दिन शुचिता ने दृढ़ता से माँ से अपने आपको शो -पीस बनने से मना कर दिया। उसकी माँ ने भी गुस्से में आकर उसे थप्पड़ जड़ दिया।सभी लड़कियों की शादी इसी प्रकार तय होती है, तेरे लिए कोई डोली लेकर खड़ा नहीं है। वह विफर पड़ी-मैं कुँवारी रह जाऊँगी ,इस प्रकार शो -पीस नहीं बनूँगी। उसने अपने आपको कमरे में बंद कर लिया। उस दिन वह खूब रोई। उसके पिता को  यह सब मालूम हुआ, उस पर सख्ती बढ़ गई। उसका कॉलेज जाना बंद कर दिया गया। कुछ दिन बाद माँ ने उसे फिर समझाया।उसने माँ से अपने दिल की बात बता दिया कि वह रमन को चाहती है ,उसी से शादी करेगी।उसकी माँ का माथा ठनका ,पर वह सँभल गई। उन्होंने  उससे कुछ नहीं कहा। वह रमन और उसके परिवार को भी जानती थी। रमन की माँ से भी वह कई बार मिल चुकी थी। दोनों एक ही कॉलेज में थे , दोनों  की उम्र लगभग बराबर थी,दोनों अक्सर मिलते -जुलते भी थे ,पर इस बात पर उन्होंने कभी गौर ही नहीं किया था।उन्होंने शुचि के पिता से बात किया। वे नहीं माने।बोले - रमन अभी पढ़ रहा है और वे नौकरी करने वाला लड़का ढूंढ़ रहे हैं।
            इधर, शुचिता जब कॉलेज से अनुपस्थित  रहने लगी तो एक दिन रमन शुचिता के घर आ गया। पहले वह दादा जी और चाची से मिला। वहीं उसको पता चला कि शुचिता की शादी की बात चल रही है। वह उसकी माँ से भी मिला।कोई विशेष बात नहीं हुई। शुचिता कहीं नजर नहीं आई। कुछ देर रुक कर वह वहाँ से चला आया।अब वह अनमना सा रहने लगा। किसी काम में उसका दिल नहीं लगता।वह जितना ही सोचता उतना ही बेचैन हो जाता। परीक्षा का समय निकट आ गया तब उसकी तन्द्रा टूटी। पढ़ाई में दिल लगाने की कोशिश करने लगा। तभी एक दिन कॉलेज में शुचिता से अचानक ही मुलाक़ात हो गई। दोनों कॉलेज के पार्क के एक किनारे बैठ गए। पहले तो वह खूब रोई-रमन तो गूंगा सा हो गया था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह कहाँ से बात शुरु करे।शुचिता ने ही बात शुरु की।बैग से शादी का एक कार्ड निकाल कर रमन के हाथ में दिया। मैं हार गई,रमन,मै वक्त से हार गई,अपने-आप से हार गई हूँ। मेरी शादी में जरूर आना ,मैं तुम्हे प्यार करती हूँ ,करती रहूँगी ,तुम्हारा इंतज़ार करुँगी ,आखिरी बार मेरी डोली में कंधे लगाने आ जाना ,मुझे प्यार से विदा कर देना रमन। इतना कह कर वह रमन के कंधे पर सिर रख कर रोने लगी। बहुत देर तक रमन भी खामोश रोता रहा,बोला कुछ नहीं। बहुत देर तक दोनों रोते रहे। फिर वे दोनों अलग हुए और घर आ गए।
            रमन परीक्षा की तैयारी और परीक्षा में व्यस्त हो गया। शुचिता की शादी हो गई। लड़के के पिता शुचिता के पिता के साथ पहले उसी विभाग में काम करते थे। अब वह किसी दूसरे शहर में रह रहे थे। दोनों में अच्छी दोस्ती थी। खूब धूम -धड़ाके ,गाजे - बाजे के साथ बरात आई थी।रमन बारात भर देख सका। शुचिता को विदा करने का साहस  उसमें नहीं था। वह उसकी शादी में नहीं गया। शुचिता ससुराल चली  गई।
             रमन  की परीक्षा समाप्त हो गई। अब उसका मन उदास रहने लगा। इस उदासी से वह बहुत घबराने लगा। एक दिन वह अपने दोस्त वैभव के साथ उसके गाँव चला गया। वैभव के पिता वकालत करते थे। उनका पुश्तैनी घर गाँव में था। घर क्या था ,पूरी हवेली थी। एक ही आँगन में कई परिवार रहते थे। उसके दादा-दादी ,चाचा-चाची ,और भी कई लोग। उसने सबसे रमन का परिचय करवाया। उसकी भाभी ने तो रमन के गाल पर चिकोटी काट कर स्वागत किया। एकबारगी रमन शरमा गया। शहर से वे दोनों सुबह ही बस से चले थे। यहाँ तक पहुँचते-पहुँचते दोपहर हो गई थी। बस से उतर कर घर तक का रास्ता पैदल ही था। वहाँ कोई रिक्शा या ताँगा नहीं चलता था। कच्ची सड़क थी। कहीं-कहीं खेतों की पतली मेड़ ही पगडंडी का काम कर रही थी। वहाँ वह वैभव के साथ कई दिन रहा। रोज शाम को खेतों पर घूमने जाना उसे अच्छा लगता था। कहीं चने,कहीं  मटर के पौधे लगे थे,कहीं तीसी-सरसों के नीले-पीले फूल हँस रहे थे।हर ओर हरियाली देख कर उसे बहुत आनंद आता था। वैभव की भाभी और प्रियांशी रमन का विशेष ध्यान रखती थीं।प्रियांशी वैभव के चाचा की लड़की थी। कक्षा सात तक ही पढ़ी थी। घर के कामों में हाथ बँटाती थी।वैभव के चाचा ग़ाँव में रह कर ही खेती-बाड़ी  का काम संभालते थे।प्रियांशी को पढ़ने का शौक था किन्तु एक तो ग़ाँव में इससे आगे का स्कूल नहीं था दूसरे चाचा जी के विचार से लड़कियों का अधिक पढ़ना-लिखना अच्छा नहीं होता था ,सो उन्होंने उसे आगे नहीं पढ़ाया और अच्छा सा घर-वर देख कर उसकी शादी कर देना चाहते थे। यद्यपि उसकी उम्र अभी शादी के लायक नहीं थी किन्तु उन दिनों गाँव में कम  उम्र में ही लड़कियों और लड़कों की शादी कर दी जाती थीं। बस लड़के के पिता के पास जमीन-जायदाद होनी चाहिए थी। रमन अपने साथ कुछ उपन्यास ,कुछ कहानियों की किताबें ले गया था। वह उसे पढ़ने को किताबें दे देता था। उसे पढ़ कर वह बहुत खुश होती थी।
धीरे-धीरे बहुत समय बीत गया। रमन शहर लौटना चाह रहा था। उसने वैभव और भाभी से अपने मन की बात बताई और सबसे इजाजत लेकर गाँव से शहर आ गया। वैभव को अभी गाँव में ही रहना था। रमन को उसने बस में बिठा दिया। रमन को छोड़ने कुछ दूर तक दादी, भाभी और प्रियांशी आई थीं। बस चलने के बाद रमन अपनी सीट पर आँखें बंद कर बैठ गया था। उसने देखा- नहाने,खाने से लेकर उसके सोने तक प्रियांशी कितना ख़याल रखती थीं। अपनी तंद्रिल आँखों में उसने देखा -प्रियांशी हाथ हिला कर विदा कर रही है ,वह उदास हो गई है ,और न जाने क्या-क्या। उसकी तन्द्रा तब भंग हुई जब शहर आ गया।
           एक दिन शुचिता का  चचेरा भाई हेमंत मिला। उसने बताया कि उसकी माँ ने उसे बुलाया है। वह उनसे मिलने गया। आज वह बहुत दिनों बाद उनसे मिला था। बहुत सी बातें हुईं। चाची जी से ही उसे पता चला कि शुचिता अपने ससुराल में खुश नहीं है। दहेज़ में कम  सामान मिलने की शिकायत कर कभी-कभी उसे पीटते भी हैं। वे लोग अच्छे आदमी नहीं हैं। यह सब सुन कर रमन तिलमिला उठा पर अब वह कर ही क्या सकता था।कभी उसका मन उससे विद्रोह करने लगता।तभी एक दिन उसको खबर मिली कि  खराब हालत में शुचिता को मायके पहुँचा दिया गया। उसे अस्पताल में भर्ती किया गया किन्तु वह  बच नहीं सकी। रमन भागा-भागा अस्पताल पहुँचा। वहाँ उसके माता-पिता ,भाई-बहन ,परिजन सभी मौजूद थे। सभी रो रहे थे। इमरजेन्सी के बाहर ही उसका मृत शरीर स्ट्रेचर पर पड़ा था। उसके दोनों हाथ उसकी छाती पर क्रॉस का चिन्ह बनाये पड़ा था। उसके शांत होंठ  लगते थे कि अभी वह हँसने वाली है ,उसकी दोनों आँखें खुली थीं......" कागा सब तन खाइयो ,चुन-चुन खइयो मास , मेरे दो नैना मत खाइयो , मोहे पीया मिलान की आश "। अब रमन से नहीं रहा गया ,वह किसी की भी परवाह किये बिना स्ट्रेचर के पास आया ,उसके सिर को चूमा और फिर उसकी दोनों आँखों की पलकों को अपनी हाथों से ढँक दिया -जो रमन को ही पुकार रही थीं ,जो रमन को आखिरी बार देखने को ही खुली रह गई थीं। 
इस प्रकार एक मौन प्रेम कहानी का अंत हो गया।