आये दिन हम रोज ही समाचार पत्रों और टी वी चैनलों में स्त्रियों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार- व्यभिचार की घटनायें पढ़ते और देखते रहते हैं। अपराधियों को सजा मिले - इसके लिए क़ानून बने हैं और बनते भी हैं , अपराधियों को कोर्ट - कचहरी की लम्बी प्रक्रिया के उपरांत सजा भी मिले हैं , बाबजूद इसके इन घटनाओं में कोई कमी नहीं दिखाई पड़ती है। अच्छे ओहदे पर आसीन और समाज में में अच्छे और संभ्रांत कहे जाने वाले कुछ लोग भी इस कुकृत्य में संलिप्त पाये जाते हैं। आखिर क्यों ? प्रश्न सरल सरल है पर उत्तर नहीं।
सही तो यह दीखता है कि इन घटनाओं के लिए अकेला पुरुष समाज ही दोषी नहीं है। आज आजादी और फैशन के नाम पर पहरावे में जो फूहड़पन पसरा है उस पर न परिवार की नजर है और न समाज की। आधुनिकता और हम किसी से कम नहीं के चोंचले ने स्त्रियों के दिलों - दिमाग पर ऐसा मकड़जाल बुन दिया है कि क्या अच्छा है और क्या नहीं - इसका विवेक खो गया है।
स्त्रियों के प्राकृतिक रूप से बनी शारीरिक संरचना और कुछ सामाजिक भय और किंचित लोक - लाज के कारण
सही तो यह दीखता है कि इन घटनाओं के लिए अकेला पुरुष समाज ही दोषी नहीं है। आज आजादी और फैशन के नाम पर पहरावे में जो फूहड़पन पसरा है उस पर न परिवार की नजर है और न समाज की। आधुनिकता और हम किसी से कम नहीं के चोंचले ने स्त्रियों के दिलों - दिमाग पर ऐसा मकड़जाल बुन दिया है कि क्या अच्छा है और क्या नहीं - इसका विवेक खो गया है।
स्त्रियों के प्राकृतिक रूप से बनी शारीरिक संरचना और कुछ सामाजिक भय और किंचित लोक - लाज के कारण