Sunday, May 20, 2018

अब क्या मिशाल दूँ

रोज की तरह उस दिन भी मेरी सुबह की ही ड्यूटी  थी। जाड़े  के दिन थे। मैं ठीक वक्त सात बजे पहुँच गया था। कुछ ही देर बाद महेंद्र मिश्रा भी आ गया था। वह रोज ही हरिद्वार से ड्यूटी करने देहरादून आता था। उसकी ट्रेन यहाँ सुबह - सुबह साढ़े सात बजे पहुँच जाती थी। वैसे उसकी ड्यूटी  दस बजे से थी। किन्तु दस बजे तक पहुँचने के लिए कोई दूसरी ट्रेन नहीं थी नहीं थी। वह आकर ऑफिस के बाहर रक्खे बेंच पर बैठ गया था बहुत खामोश और ग़मगीन  , उदास। वह मुझ से बहुत जूनियर था। वह मुझे बहुत पसंद था क्योंकि वह कोई भी काम हो ईमानदारी और लगन से करता था। दूसरे उसकी इंग्लिश बहुत अच्छी थी। फर्राटेदार इंग्लिश बोल लेता था। किन्तु एक अवगुण उसमें घर कर गया था। वह शराब पीने का आदि हो गया था। यह शौक भी उसे पहले नहीं थी। ऑफिस के ही कुछ लोगों ने यह लत लगा दी थी। इस  कारण वह कभी - कभी ड्यूटी  पर लेट हो जाया करता था। ऑफिस में शाम को प्राय: रोज ही चौकड़ी बैठती थी और इस चौकड़ी में उसे भी शामिल कर लिया जाता था। ड्यूटी में लेट हो जाने पर इन्हीं लोगों द्वारा चीफ से शिकायत भी कर दिया जाता था जिस कारण वह चीफ साहब के कोपभाजन का शिकार हो जाता था। उन दिनों हमारे चीफ साहब  सरदार ( श्री लाभ सिंह नारंग ) जी थे। एक दिन पहले ही चीफ सहब जी ने उसे बुरी तरह डाँट लगाई थी। आज जब वह ऑफिस आया तो इसी वज़ह से उदास और ग़मगीन था। उसकी शादी हो गई थी और शायद उसके दो छोटे - छोटे  बच्चे भी थे। मैं उसे इस प्रकार उदास बैठे देखकर उसके पास गया और उसके कंधे पर हाथ रख कर पूछा कि वह इतना उदास और खामोश क्यों है ?उसकी आँखों में आँसू  आ गये। फिर उसने  कल्ह की घटना का जिक्र किया और बोला  कि चीफ साहब दूसरों की शिकायत पर आँख बंद कर विश्वास कर लेते हैं। मैं भी शादी - शुदा हूँ और बच्चों का बाप भी हूँ और चीफ साहब इस बुरी तरह व्यवहार करते हैं जैसे मैं सात साल का बच्चा हूँ। ऑफिस का कोई भी काम हो मैं पूरी तरह करता हूँ। वह सुबकने लगा था। मैंने उसे ढाढ़स बँधाया। ऑफिस का पोर्टर रामचीज  तब तक ऑफिस की सफाई कर चुका था। चीफ साहब का एक अपना अलग केबिन था जिमें दो तरफ दीवारें थीं और दो तरफ आधे लकड़ी और  आधे शीशे लगे थे। चीफ साहब जिस कुर्सी पर बैठते थे सामने गुरुनानक जी की तस्वीर लगाई हुई थी। तस्वीर के ठीक नीचे लकड़ी की दीवार से बनी थी। चीफ साहब ठीक साढ़े नौ बजे ऑफिस आ जाते थे। कुर्सी पर बैठने से पहले नियमित रूप से गुरुनानक जी की तस्वीर के सामने खड़े हो कर दोनों हाथ जोड़ कर नतमस्तक हो प्रणाम करना नहीं भूलते थे। यह उनका रोज का क्रम था। महेंद्र मिश्रा के साथ हुई  कल्ह की घटना मुझे भी मालूम थी और मुझे भी महसूस हुआ था कि इस तरह उनका डाँटना  और बिगड़ना ठीक नहीं है। किन्तु आज जब महेंद्र मिश्रा को इस तरह से देखा तो मुझे लगा कि यह उसके साथ सही नहीं हो रहा है। मैंने मन में कुछ निश्चय किया। एक चौक  ( खल्ली ) से गुरुनानक जी के तस्वीर के नीचे लकड़ी  के फ्रेम पर इस प्रकार  लिखा  -
 " ऐसी वाणी बोलिये मन का आपा खोय , औरन को शीतल करे आपहु शीतल होय "
महेंद्र मिश्रा घबरा गया ,बोला वह बहुत नाराज होंगे और सब गाज मेरे ऊपर गिरेगी। मैंने उससे कहा तुम बाहर जा कर बैठो।  तुम्हें कुछ बताने और बोलने की जरूरत नहीं है। जो कुछ करुँगा  मैं  करूंगा। राम चीज को भी बहार बैठा दिया और कहा उसे भी कुछ बोलने की जरूरत नहीं है। मैं भी अपनी कुर्सी पर बैठ कर काम करने लगा। ठीक साढ़े नौ बजे चीफ साहब आ गए। रोज की तरह उनके आते ही मैंने उनका अभिवादन किया। वे अपने चैम्बर में गए और रोज की तरह गुरनानक जी के तस्वीर के सामने खड़े हो हाथ जोड़ते-जोड़ते वे रूक गए और गरज कर रामचीज को आवाज दिया  - ये यहाँ किसने लिखा ? रामचीज ने कहा - मुझे नहीं मालूम। मैं भी रामचीज के पीछे - पीछे वहाँ  पहुँच गया। मैंने बड़े शान्त  हो कर ( जैसे मुझे कुछ भी मालूम नहीं  ) पूछा क्या हो गया साहब  ? यह यहाँ तस्वीर के नीचे - उन्होंने मुझे अपने हाथ की ऊँगली से इशारा कर दिखाया । मैंने उन पँक्तियों को पढ़ा और कहा यह तो कबीर जी की उक्ति है।  बहुत सुन्दर है। उन्होंने कहा - है पर लिखा किसने ? मैंने शान्त  हो कर कहा - मैंने लिखा। उनका अगला प्रश्न भी उसी गुस्से और गरज के साथ था क्यों लिखा। मैंने बहुत ही शान्त हो कर कहा - पहले आप गुरु जी को नमस्कार कर लें और शान्त हो जायें। लेकिन उनका गुस्सा शान्त नहीं हुआ। तब मैंने उनसे कहा - आप रोज ही नियमित रूप से गुरुनानक जी की तस्वीर के सामने  हाथ जोड़ कर नमस्कार करते हैं  - क्या फायदा है जब आप इतनी सही और छोटी बात के लिए इतना  क्रुद्ध हो रहे हैं कि आप नमस्कार करना भी भूल  गए। फिर मैंने यह क्यों लिखा यह विस्तार से बताया। मैंने कहा - महेंद्र मिश्रा कोई दूध पीता बच्चा नहीं है। शादी - शुदा है। खुद बच्चों का पिता है। आपका दूसरे की जायज - नाजायज शिकायतों पर वेवजह डाँटना क्या उचित है  ? कल्ह आपकी डाँट से क्षुब्ध हो कर कुछ  ऐसी -वैसी बात कर ले तो कौन जिम्मेदार होगा ? वह अगर काम ठीक नहीं करता हो , काम छोड़ कर चला जाता हो तो कोई बात है। शायद उन्हें अपनी इस बात का अहसास हुआ और तब से उन्होंने महेंद्र मिश्रा से प्यार से पेश आने लगे। बहुत बाद में होली के अवसर पर महेंद्र मिश्रा ने ऑफिस के सभी स्टाफ के लिए कुछ - कुछ पंक्तियाँ लिखी जिसमें मेरे लिए उसने लिखा -  " अब क्या मिशाल दूँ मैं  तुम्हारे शबाब की , इंसान बन गई है किरण आफ़ताब की " । अब मेरे सेवानिवृत हुए ग्यारह वर्ष बीत गए हैं , महेंद्र मिश्रा भी सेवानिवृत हो गया है। पर अब भी उसका हमसब के साथ हँसना  - हँसाना याद आता है। वह एक बहुत अच्छा दोस्त था।

Friday, March 30, 2018

कहानी

                                      सफर कोई भी हो , हमसफर मिल ही जाते हैं। ऐसे ही एक सफर की यह कहानी है।      फरवरी का अंतिम सप्ताह था जब हमने गोवा जाने का प्रोग्राम बनाया। निज़ामुद्दीन से राजधानी एक्सप्रेस ठीक समय 11 बजे छूट गई। हमारे बैठने के थोड़ी देर बाद ही कैटेरिंग से पानी का बोतल और फिर चाय आ गई। हमलोग अभी अपने - अपने सामान एडजस्ट करने में ही लगे थे। सामान  एडजस्ट करने के बाद हमने चाय पी। हमारी दोनों बर्थ नीचे की आमने - सामने की ही थी। ऊपर वाले बर्थ पर एक लड़का था जो अभी हमारे साथ ही बैठा था। हमारे केबिन का ऊपर का बर्थ खाली था। खाना खाने के बाद उस लड़के से हमारी बात - चीत होने लगी।उसने बताया कि वह त्रिवेन्द्रम में रहता है। वैसे वह दिल्ली का रहने वाला है। बातों में हम इतने मगशूल हो गये कि हमें पता ही नहीं चला कि शाम हो गई है। रात का खाना खाने के बाद हम लोग सो गये। सुबह हमारे उठने से पहले ही चाय आ गई थी। फिर हम सब ने चाय पी।  मैंने उसे अपने पास रखी मिठाई भी खिलाई। पहले वह मना करता रहा पर मेरे विशेष आग्रह पर उसने मिठाई खा लिया। मेरी श्रीमती जी तो चाय पीने का बाद फिर से सो गईं। परन्तु हम उस लड़के के साथ बात करने लगे। वह लड़का मुझे शिक्षित और शिष्ट लगा। कभी - कभी हम केबिन के अंदर से ही बाहर का नजारा भी देख रहे थे। सुबह - सुबह की धूप में बाहर का नजारा भी मनमोहक लग रहा था। बात - चीत के क्रम में उसने अपने जीवन की एक रोचक और मजेदार वाकया सुनाया जिसे सुनकर हम खूब हँसे भी। उसने जो सुनाया वह मैं आपको ज्यों का त्यों सुनाता हूँ।  " बहुत पुरानी बात है। एक बार मेरे पिता जी के एक दोस्त ने मुझे अपने घर खाना खाने पर बुलाया। तब मैं कॉलेज का विद्यार्थी ही था। उन दिनों मैं घर पर अकेला ही था। माँ और पिता जी कुछ घरेलु कार्यवश बहर गए हुए थे। वैसे मुझे कहीं किसी के घर आना - जाना पसन्द नहीं था। किन्तु मैं उनके घर चला गया था। वह इसलिए कि उनके घर हमारा पहले से भी आना - जाना था। वह एक देर शाम का वाकया है। उन्होंने दरवाजा खोल कर स्वागत किया। इधर - उधर की कुछ बातें हुईं। फिर खाने का समय हो गया था। खाने की मेज पर  हमारा खाना लगाया गया। मैं भी जल्द से जल्द घर वापस आना चाह रहा था। तभी खाना खाने के बीच में बड़े प्यार से वे कहने लगे - खाना कैसा लगा  ? फिर मेरे उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना बोले सब्जी मैंने काटे - छीले हैं ताकि जल्द से जल्द खाना बन सके और यह जो पुदीने - धनिया की चटनी तुम खा रहे हो , जानते हो इसे किसने बनाया  ? यह मेरे बेटे रॉनी ने बनाया है - बड़ी मेहनत से उसने हाथों -पैरों से पीस - पीस कर बनाया है। एकबारगी मेरा मन कसैला हो गया।  मैंने सिर उठा कर उनकी तरफ हिकारत से देखा - यह सरासर मेरा अपमान था। यह रॉनी दरअसल उनके डॉगी का नाम था ,वह बोलते रहे ,  हाँ - हाँ मैं सच कह रहा हूँ। बेचारा रॉनी हाँफता रहा परन्तु चटनी पीस कर ही दम लिया। मैंने कोई प्रत्युत्तर नहीं दिया।  मैं खाने से उठ गया और अपने घर वापस हो लिया। तब से आज तक मैं दुबारे उनके घर नहीं गया। पता नहीं उनका वह बेटा रॉनी अब भी उनके साथ है या कहीं और। इतना कह कर वह मेरी तरफ देख कर हलके से मुस्कुराया, शायद वह मेरी प्रतिक्रिया जानना चाह रहा होगा। उसके साथ -साथ मेरा मन भी कसैला हो गया था। मैंने उससे सिर्फ इतना ही पूछा - क्या तुम्हें तब गुस्सा नहीं आया ? तब तो तुम युवा ही  रहे होगे  ? उस लड़के ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया  - " नहीं " । फिर कुछ रूक कर उसने जो कहा वह सुन कर उसका शान्त और आत्मविश्वास से लवरेज़ चेहरा देख रहा था।
उसने कहा  -  मैं अपना मुँह गन्दा क्यूँ करता। वह स्वयं ही अपनी  रुग्ण और ओछी मानसिकता का परिचय दे रहे थे। वह मुझे दम्भी और विकृत प्रवृति के लगे। ऐसा व्यक्ति चाहे कितना ही धनवान हो जाए। उसकी ओछी हरकत किसी से छुपी नहीं रह सकती।  उनहोंने अपने लिये यही पूंजी एकत्रित की थी।
                     समय बहुत निकल गया था।  मेरा गन्तव्य स्टेशन मडगांव आने ही वाला था। उसे तो और भी आगे जाना था। मैं अपने स्टेशन पर उतर गया। उसने मेरे सामान उतारने में भी मदद की। मैं घर चला आया। उस लड़के की  तथा उसके साथ हुई घटना की याद अब भी आती है  ,  कैसे -कैसे विकृत मानसिकता के लोग होते हैं ? दूसरे का अपमान करने में ही गर्व करते हैं। सचमुच ऐसे लोगों का साथ तो छोड़ ही देना चाहिये।

Wednesday, February 21, 2018

दो शब्द :-

 दो शब्द  :-
वर्ष 2018के 14 जनवरी को सम्मानीय शायर ज़नाब राशिद आरफ़ी जी के प्रयास और सहयोग से हरबर्टपुर
( देहरादून ) में  पछवादून  " साहित्यिक चौपाल " का सफल एवं भव्य आयोजन किया गया। यह साहित्यिक चौपाल विशेष कर वरिष्ठ साहित्यकारों जिनकी उम्र 65 वर्ष से ऊपर थी , के सम्मान में आयोजित किया गया था  जो वस्तुत:अपने आप में अनूठा था। ऐसा यह पहला अवसर ही है जिसमें वरिष्ठ  बुजुर्गवार साहित्यकारों को जो उम्र के कुछ पड़ाव पर अपने आप में अकेले पड़ने लगते हैं  , के  लिए  था। इस चौपाल की एक और विशिष्टता थी कि इसमें देहरादून और हिमाचल प्रदेश के ही लगभग पचास  - पचपन शायर , कवि और साहित्यकार  जुटे थे। यह महान सोच महान व्यक्ति का ही हो सकता है। यह ज़नाब राशिद जी की महानता ही है। मुझे भी इस चौपाल में उपस्थित होने का गौरव प्राप्त हुआ।मुझे कई विद्वान् कवियों और शायरों की उम्दा रचनाएं सुनने और उनसे मिलने का अवसर प्राप्त हुआ। मैं श्री राशिद साहब जी से मिल कर उनकी सादगी और सरलता से अविभूत हुआ। कुल मिला कर कहा जाये तो यह एक अति सफल आयोजन था जिसकी सफलता का श्रेय श्री राशिद साहब तथा उनके सहयोगी और पछवादून के लोगों को जाता है।
                                                                        ------  विजय कुमार सिन्हा  " तरुण "
                                                                                  डी - 40 , रेस कोर्स , देहरादून  ( उत्तराखण्ड  )

Wednesday, January 10, 2018

बाबाओं का मकड़जाल

     
                       भले ही हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं , किन्तु , अंधविश्वास और रूढ़िवादिता के मकरजाल से निकल नहीं पाए हैं। यही कारण है कि भारत में विशेष कर मंत्र -तंत्र , झाड़ -फूंक और बाबाओं का वर्चस्व बना है। अनपढ़ तो अनपढ़ , पढ़े लिखे भी इनमें उलझ जाते हैं।  हम बाबाओं पर आँख मूँद कर विश्वास  कर लेते हैं , अपना विवेक खो देते हैं। आज हम आये दिन तमाम समाचार पत्रों और टी . वी चैनलों पर इन पाखंडी  बाबाओं के कुकृत्य के समाचार से अवगत होते रहते हैं। इन सब के बाबजूद ऐसे बाबाओं के कारनामे बंद नहीं होते हैं। इनकी धर्म की दुकान फलती -फूलती रहती है।इसका कारण अशिक्षा का होना भी है। एक ओर हिन्दुस्तान में जहाँ इतनी गरीबी है , लोगों के पास सिर छिपाने के लिए अपना एक छोटा सा घर  नहीं है , वहीँ दूसरी ओर तथाकथित बाबाओं के पास बेसुमार दौलत होती है , बेहिसाब जमीन होती है , जहाँ ये अपना एक अलग  साम्राज्य स्थापित कर लेते हैं। इनकी अपनी एक अलग सत्ता होती है।  एक तरह से कुछेक तो राज्य सरकार के इतर समानांतर सरकार चलाते हैं।  इनकी अपनी फ़ौज होती है जो आधुनिक अस्त्र - शस्त्र  से भी सुसज्जित होती है  . ( राम - रहीम  इसके उदाहरण स्वरूप हैं। ) इनको सरकार का संरक्षण प्राप्त होता है। सरकार  कोई भी हो , इन्हें कौड़ी के भाव जमीन बेच देती है या फिर दान में दे देती है। आम आदमी के लिए जमीन  के  ऊँचे  भाव के कारण जमीन  खरीदना मुहाल होता है , परन्तु बाबाओं के पास कई - कई सौ एकड़ जमीन पड़ी होती हैं जहाँ धर्म और कर्म के नाम पर ऐय्यासियां होती हैं। ऐसे कितने ही  बाबा हैं जिनकी पोल खुली है और अभी और ऐसे कई बाबा होंगे जिनकी  पोल का अभी पता नहीं चल पाया होगा। ये तथाकथित बाबा लोगों में धर्म का डर बिठा कर , इहलोक और परलोक का भय दिखाकर , अपनी दैवीय शक्ति का हवाला देकर लोगों की आँखों में धूल  झोंकते हैं , उन्हें ठगते हैं। इस कार्य में परोक्ष रूप से नेताओं और सरकार भी शामिल हैं जो अपना उल्लू इन्हीं बाबाओं के माध्यम से साधते रहते हैं। अभी हाल - फिलहाल मध्य प्रदेश  सरकार ने पांच बाबाओं को राज्य मंत्री का दर्जा दिया। लोग भी बाबाओं के बहकावे में आ जाते हैं जिनमें औरतें अधिक होती हैं  -  Soft  Target ..।
भले ही वे अपने पति के पैर नहीं पूजतीं  पर बाबाओं के पैर पूजने को तत्पर रहती हैं जिन्हें वे अच्छी तरह से जानती तक नहीं और बाबाओं के जाल में बुरी तरह से फँस जाती हैं। लोग बाबाओं को भगवान् की तरह पूजते हैं  , उनपर आँख बंद कर विश्वास करते हैं और ये बाबा उनकी आस्था से खिलवाड़ करते है और अनैतिक कार्य करते हुए  , सारी हदें पार कर  गुरु - शिष्य , भक्त और भगवान् के रिश्तों को शर्मशार करते हैं।  कई - कई तो संगीन अपराधों में लिप्त पाए गए हैं। धर्म की आड़ में बलात्कार , ह्त्या और धोखाधड़ी  ही इनका पेशा बन जाता है। ऐसे कितने ही बाबा हैं जिनकी अनैतिकता की पोल खुली और वे जेल गए। इनमें आशा राम , बाबा गुरमीत राम रहीम , स्वामी परमानंद ,नित्यानंद स्वामी , नारायण साई  , स्वामी भीमानंद महाराज, राधे माँ ,और बाबा रामपाल जेल जा चुके हैं। अभी - अभी ताजा नाम और कारनामा दाती महाराज  का आया है  जिन पर उन्हीं के आश्रम की शिष्या ने बलात्कार के गंभीर आरोप लगाए हैं। ऐसे ही आरोपों ले कारण  आशा राम और नारायण साई अभी जेल में बंद हैं।वीरेंद्र देव दीक्षित का भी नाम जुड़ा है जिनके आश्रम से 41 लड़कियों को सीबीआई ने छुड़ाया था। तरस तो उन माँ - बाप पर भी आता है जो अपनी संतानों को  बिना सोचे - समझे , बिना जाँचे - परखे बेटे और बेटियों को आश्रमों में छोड़ देते हैं। इनके खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए। राज्य के सरकारों को हरेक आश्रमों की पड़ताल कराते रहनी चाहिए और सभी राज्यों के आश्रमों की निष्पक्ष जाँच अलग से केंद्र सरकार को भी कराते रहना चाहिए। इसके अतिरिक्त गाँव - कस्बों में गरीब और सामान्य वर्गों की उचित शिक्षा की व्यवस्था करानी चाहिए ताकि  इन बच्चों को किसी साधू - महात्मा के आश्रमों में ना जाना पड़े। ये तो अभी कुछ ही आँकड़े सामने  आये हैं अभी और कितने पाए जाएंगे उसका पता तो भविष्य में चलेगा। शिक्षा का मतलब सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं बल्कि सामाजिक ज्ञान और अच्छे - बुरे की पहचान  की होनी चाहिए।बाबाओं पर निगरानी के साथ - साथ इन पर नकेल भी कसी जानी चाहिए। आश्रमों में पलने और पढ़ने वाले बच्चे के भविष्य के बारे में सरकारों को भी सोचना चाहिए। अन्यथा ये बच्चे स्वयं के लिए और समाज तथा देश के लिए भी बोझ  ही होते हैं।  इनको सही शिक्षा देकर देश के विकास  की मुख्य धारा में जोड़ना चाहिए। 

Monday, April 17, 2017

हम और हमारा परिधान

             आज हम कहीं भी जायें , हमें अपने चारों ओर भिन्न - भिन्न तथा अजीबो -गरीब फैशन का नजारा देखने को मिलता है। हमारा पहरावा कैसा हो , यह हमें ही तय करना है। साथ - साथ हमें घर , परिवार, समाज और राष्ट्र का मान भी रखना है। हमारे परिधान से ही हमारे परिवार ,समाज और राष्ट्र का सम्मान और संस्कार झलकता है।
             आज जो हम चारों तरफ विभिन्न व अजब - गजब के परिधानों में लिपटे स्त्री - पुरुषों , युवक -युवतियों को देखते हैं तो एक प्रश्न मन में उठता है - क्या शरीर का सौंदर्य दिखाने से ही वास्तविक सौंदर्य दिखता है ? क्या सौंदर्य ही व्यक्तित्व का मापदंड है ? आखिर हम ऐसे अधखुले पहनावों  से समाज को क्या दिखाना चाहते हैं ? जिस्म का प्रदर्शन और खुलापन विकार तो ला सकता है पर सौंदर्य का प्रतीक नहीं हो सकता।
             आज  ( विशेष कर बड़े शहरों में ) आँचल की अवधरणा तो  लुप्तप्राय हो गई है ( अभी मृतप्राय   नहीं हुई है ) जिसका महत्व कभी एक मायने रखता था , जो स्त्रियों की गरिमा और शीलता का परिचायक होता था। पता नहीं हमारी बुद्धि , हमारा विवेक कहाँ खो गया है  ? आज हम सिनेमा , टी.वी पर दिखाए जाने वाले नाटकों तथा विज्ञापनों में दिखाये नायकों - नायिकाओं के परिधानों को ही अपनाने में अपना गौरव महसूस करते हैं। आज कोई भी विज्ञापन बिना स्त्रियों के पूर्ण नहीं दीखते हैं। यहाँ उनका व्यवसायिक रूप में वस्तु की तरह इस्तेमाल होता है और वे इस्तेमाल होती हैं। हम उन्हीं के अनुरूप परिधानों को अपनाते हैं। उन्हें तो पैसा कमाना है  , अत: वे न तो किसी भी तरह के परिधानों के पहनने से गुरेज करती हैं न ही अंग प्रदर्शन से।
              यदि कोई संस्था , कोई स्कूल , कोई कार्यालय  ड्रेस - कोड की बात करता है तो स्त्रियों की आजादी के नाम पर ववाल मचता है। स्त्रियों की आजादी का अर्थ क्या समझा जाए - फूहड़पन पहिरावा क्या आजादी का पर्याय है ? इससे हम अनचाहे मुसीबत को आमंत्रण तो देते ही हैं साथ - साथ हम कई तरह के चर्म रोगों को भी  आमंत्रित करते हैं। वायु में इतना प्रदूषण है कि शरीर का जो भाग खुला रहता है उस पर दूषित वायु जिसमें  कई प्रकार के विषाक्त धूल- कण होते हैं , संसर्ग में आते हैं और हमारे शरीर की त्वचा को रुग्ण करते हैं।
               पहनावा तो वय , समाज और देश व काल के  अनुरूप ही धारण करना चाहिए। पहनावा ऐसा हो कि जिसमें उस व्यक्ति  ( स्त्री - पुरुष ) की गरिमा और स्त्रियों की स्मिता की झलक हो।
               यह सही है कि आज स्त्रियां पुरुषों के कदम से कदम मिला कर चल रही हैं , हर क्षेत्रों में उन्नति कर रही हैं  - स्वागत है उनका और धन्यवाद भी। तथापि जिस आजादी व स्वतंत्रता की बात परिधान के लिए होती है , वह आकर्षण तो पैदा कर सकती है  , सम्मान नहीं दिला सकती है। इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता पर इसे स्वीकारने में न जाने क्यों लोगों को झिझक होती है।
                आजादी और आधुनिकता की चाह में आधुनिक फैशन की होड़ में ऐसे खुले अंगों वाले परिधानों की ओर धनाढ्य घरों और उच्च मध्यम वर्गों  की महिलाओं  के साथ - साथ ( विशेष कर ) युवतियां आकर्षित होती हैं। एक दूसरे की देखा - देखी , एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा , टी.वी सीरियलों , विज्ञापनों और सिनेमाओं की तारिकाओं की वेश - भूषा अपरिपक्व मस्तिष्क को प्रभावित करती हैं। इसी चमक - दमक को वे सभी अपनाना चाहती हैं - परिणाम , दुष्परिणाम से बेखबर , निश्चिन्त। लेकिन इसका दोष केवल लड़के व लड़कियों को ही नहीं दिया जा सकता। अभिभावक विशेष रूप से जिम्मेदार हैं जो अपनी संतानों को सौंदर्य की सही परिभाषा सम्पादित नहीं कर पाते हैं। आज का समाज भी दोषी है। साधारण तौर - तरीके और सलीके के वस्त्रों में रहने वाले परिवार को पिछड़ा , दब्बू और दकियानूस बताने में हिचकिचाते नहीं हैं। लिहाजा उन्हें भी उसी हवा में बहना  होता है।
               यह हमें नहीं भूलना चाहिए कि जीवन की दौड़ में जब हम किसी इंटरव्यू - साक्षात्कार के लिए जाते हैं तो हमारे परिधानों  पर विशेष गौर किया जाता है शालीनता को ही प्रधानता देते हैं अथवा कार्यालय के मापदण्ड के अनुरूप  परिधानों की प्राथमिकता होती है। उसके बाद ही शैक्षणिक और बौद्धिक परीक्षाएं होती हैं।
               हम बस अपने - आप में सिमट कर सिर्फ आज को देखते हैं।  यद्यपि भविष्य हमारे हाथ में नहीं है , जो है सिर्फ आज है , आज का पल है। तथापि हम सभी भविष्य का ताना - बाना बुनते तो हैं , लेकिन वह भी सीमित। हम यदि अपने अगले भविष्य की संतति की ओर गौर करें तो शायद हम और आप स्वयं सोचेंगे कि आने वाले संतति को हम क्या परोसेंगे। उन्हें जीवन जीने को कौन सा सलीका सिखलायेंगे। यदि इन सब बातों पर गौर करेंगे तो निश्चय ही सही तरीके से जीना और रहना आ जाएगा , यह विश्वास है।

                                              --------- ( प्रकाशित )