रोज की तरह उस दिन भी मेरी सुबह की ही ड्यूटी थी। जाड़े के दिन थे। मैं ठीक वक्त सात बजे पहुँच गया था। कुछ ही देर बाद महेंद्र मिश्रा भी आ गया था। वह रोज ही हरिद्वार से ड्यूटी करने देहरादून आता था। उसकी ट्रेन यहाँ सुबह - सुबह साढ़े सात बजे पहुँच जाती थी। वैसे उसकी ड्यूटी दस बजे से थी। किन्तु दस बजे तक पहुँचने के लिए कोई दूसरी ट्रेन नहीं थी नहीं थी। वह आकर ऑफिस के बाहर रक्खे बेंच पर बैठ गया था बहुत खामोश और ग़मगीन , उदास। वह मुझ से बहुत जूनियर था। वह मुझे बहुत पसंद था क्योंकि वह कोई भी काम हो ईमानदारी और लगन से करता था। दूसरे उसकी इंग्लिश बहुत अच्छी थी। फर्राटेदार इंग्लिश बोल लेता था। किन्तु एक अवगुण उसमें घर कर गया था। वह शराब पीने का आदि हो गया था। यह शौक भी उसे पहले नहीं थी। ऑफिस के ही कुछ लोगों ने यह लत लगा दी थी। इस कारण वह कभी - कभी ड्यूटी पर लेट हो जाया करता था। ऑफिस में शाम को प्राय: रोज ही चौकड़ी बैठती थी और इस चौकड़ी में उसे भी शामिल कर लिया जाता था। ड्यूटी में लेट हो जाने पर इन्हीं लोगों द्वारा चीफ से शिकायत भी कर दिया जाता था जिस कारण वह चीफ साहब के कोपभाजन का शिकार हो जाता था। उन दिनों हमारे चीफ साहब सरदार ( श्री लाभ सिंह नारंग ) जी थे। एक दिन पहले ही चीफ सहब जी ने उसे बुरी तरह डाँट लगाई थी। आज जब वह ऑफिस आया तो इसी वज़ह से उदास और ग़मगीन था। उसकी शादी हो गई थी और शायद उसके दो छोटे - छोटे बच्चे भी थे। मैं उसे इस प्रकार उदास बैठे देखकर उसके पास गया और उसके कंधे पर हाथ रख कर पूछा कि वह इतना उदास और खामोश क्यों है ?उसकी आँखों में आँसू आ गये। फिर उसने कल्ह की घटना का जिक्र किया और बोला कि चीफ साहब दूसरों की शिकायत पर आँख बंद कर विश्वास कर लेते हैं। मैं भी शादी - शुदा हूँ और बच्चों का बाप भी हूँ और चीफ साहब इस बुरी तरह व्यवहार करते हैं जैसे मैं सात साल का बच्चा हूँ। ऑफिस का कोई भी काम हो मैं पूरी तरह करता हूँ। वह सुबकने लगा था। मैंने उसे ढाढ़स बँधाया। ऑफिस का पोर्टर रामचीज तब तक ऑफिस की सफाई कर चुका था। चीफ साहब का एक अपना अलग केबिन था जिमें दो तरफ दीवारें थीं और दो तरफ आधे लकड़ी और आधे शीशे लगे थे। चीफ साहब जिस कुर्सी पर बैठते थे सामने गुरुनानक जी की तस्वीर लगाई हुई थी। तस्वीर के ठीक नीचे लकड़ी की दीवार से बनी थी। चीफ साहब ठीक साढ़े नौ बजे ऑफिस आ जाते थे। कुर्सी पर बैठने से पहले नियमित रूप से गुरुनानक जी की तस्वीर के सामने खड़े हो कर दोनों हाथ जोड़ कर नतमस्तक हो प्रणाम करना नहीं भूलते थे। यह उनका रोज का क्रम था। महेंद्र मिश्रा के साथ हुई कल्ह की घटना मुझे भी मालूम थी और मुझे भी महसूस हुआ था कि इस तरह उनका डाँटना और बिगड़ना ठीक नहीं है। किन्तु आज जब महेंद्र मिश्रा को इस तरह से देखा तो मुझे लगा कि यह उसके साथ सही नहीं हो रहा है। मैंने मन में कुछ निश्चय किया। एक चौक ( खल्ली ) से गुरुनानक जी के तस्वीर के नीचे लकड़ी के फ्रेम पर इस प्रकार लिखा -
" ऐसी वाणी बोलिये मन का आपा खोय , औरन को शीतल करे आपहु शीतल होय "
महेंद्र मिश्रा घबरा गया ,बोला वह बहुत नाराज होंगे और सब गाज मेरे ऊपर गिरेगी। मैंने उससे कहा तुम बाहर जा कर बैठो। तुम्हें कुछ बताने और बोलने की जरूरत नहीं है। जो कुछ करुँगा मैं करूंगा। राम चीज को भी बहार बैठा दिया और कहा उसे भी कुछ बोलने की जरूरत नहीं है। मैं भी अपनी कुर्सी पर बैठ कर काम करने लगा। ठीक साढ़े नौ बजे चीफ साहब आ गए। रोज की तरह उनके आते ही मैंने उनका अभिवादन किया। वे अपने चैम्बर में गए और रोज की तरह गुरनानक जी के तस्वीर के सामने खड़े हो हाथ जोड़ते-जोड़ते वे रूक गए और गरज कर रामचीज को आवाज दिया - ये यहाँ किसने लिखा ? रामचीज ने कहा - मुझे नहीं मालूम। मैं भी रामचीज के पीछे - पीछे वहाँ पहुँच गया। मैंने बड़े शान्त हो कर ( जैसे मुझे कुछ भी मालूम नहीं ) पूछा क्या हो गया साहब ? यह यहाँ तस्वीर के नीचे - उन्होंने मुझे अपने हाथ की ऊँगली से इशारा कर दिखाया । मैंने उन पँक्तियों को पढ़ा और कहा यह तो कबीर जी की उक्ति है। बहुत सुन्दर है। उन्होंने कहा - है पर लिखा किसने ? मैंने शान्त हो कर कहा - मैंने लिखा। उनका अगला प्रश्न भी उसी गुस्से और गरज के साथ था क्यों लिखा। मैंने बहुत ही शान्त हो कर कहा - पहले आप गुरु जी को नमस्कार कर लें और शान्त हो जायें। लेकिन उनका गुस्सा शान्त नहीं हुआ। तब मैंने उनसे कहा - आप रोज ही नियमित रूप से गुरुनानक जी की तस्वीर के सामने हाथ जोड़ कर नमस्कार करते हैं - क्या फायदा है जब आप इतनी सही और छोटी बात के लिए इतना क्रुद्ध हो रहे हैं कि आप नमस्कार करना भी भूल गए। फिर मैंने यह क्यों लिखा यह विस्तार से बताया। मैंने कहा - महेंद्र मिश्रा कोई दूध पीता बच्चा नहीं है। शादी - शुदा है। खुद बच्चों का पिता है। आपका दूसरे की जायज - नाजायज शिकायतों पर वेवजह डाँटना क्या उचित है ? कल्ह आपकी डाँट से क्षुब्ध हो कर कुछ ऐसी -वैसी बात कर ले तो कौन जिम्मेदार होगा ? वह अगर काम ठीक नहीं करता हो , काम छोड़ कर चला जाता हो तो कोई बात है। शायद उन्हें अपनी इस बात का अहसास हुआ और तब से उन्होंने महेंद्र मिश्रा से प्यार से पेश आने लगे। बहुत बाद में होली के अवसर पर महेंद्र मिश्रा ने ऑफिस के सभी स्टाफ के लिए कुछ - कुछ पंक्तियाँ लिखी जिसमें मेरे लिए उसने लिखा - " अब क्या मिशाल दूँ मैं तुम्हारे शबाब की , इंसान बन गई है किरण आफ़ताब की " । अब मेरे सेवानिवृत हुए ग्यारह वर्ष बीत गए हैं , महेंद्र मिश्रा भी सेवानिवृत हो गया है। पर अब भी उसका हमसब के साथ हँसना - हँसाना याद आता है। वह एक बहुत अच्छा दोस्त था।
" ऐसी वाणी बोलिये मन का आपा खोय , औरन को शीतल करे आपहु शीतल होय "
महेंद्र मिश्रा घबरा गया ,बोला वह बहुत नाराज होंगे और सब गाज मेरे ऊपर गिरेगी। मैंने उससे कहा तुम बाहर जा कर बैठो। तुम्हें कुछ बताने और बोलने की जरूरत नहीं है। जो कुछ करुँगा मैं करूंगा। राम चीज को भी बहार बैठा दिया और कहा उसे भी कुछ बोलने की जरूरत नहीं है। मैं भी अपनी कुर्सी पर बैठ कर काम करने लगा। ठीक साढ़े नौ बजे चीफ साहब आ गए। रोज की तरह उनके आते ही मैंने उनका अभिवादन किया। वे अपने चैम्बर में गए और रोज की तरह गुरनानक जी के तस्वीर के सामने खड़े हो हाथ जोड़ते-जोड़ते वे रूक गए और गरज कर रामचीज को आवाज दिया - ये यहाँ किसने लिखा ? रामचीज ने कहा - मुझे नहीं मालूम। मैं भी रामचीज के पीछे - पीछे वहाँ पहुँच गया। मैंने बड़े शान्त हो कर ( जैसे मुझे कुछ भी मालूम नहीं ) पूछा क्या हो गया साहब ? यह यहाँ तस्वीर के नीचे - उन्होंने मुझे अपने हाथ की ऊँगली से इशारा कर दिखाया । मैंने उन पँक्तियों को पढ़ा और कहा यह तो कबीर जी की उक्ति है। बहुत सुन्दर है। उन्होंने कहा - है पर लिखा किसने ? मैंने शान्त हो कर कहा - मैंने लिखा। उनका अगला प्रश्न भी उसी गुस्से और गरज के साथ था क्यों लिखा। मैंने बहुत ही शान्त हो कर कहा - पहले आप गुरु जी को नमस्कार कर लें और शान्त हो जायें। लेकिन उनका गुस्सा शान्त नहीं हुआ। तब मैंने उनसे कहा - आप रोज ही नियमित रूप से गुरुनानक जी की तस्वीर के सामने हाथ जोड़ कर नमस्कार करते हैं - क्या फायदा है जब आप इतनी सही और छोटी बात के लिए इतना क्रुद्ध हो रहे हैं कि आप नमस्कार करना भी भूल गए। फिर मैंने यह क्यों लिखा यह विस्तार से बताया। मैंने कहा - महेंद्र मिश्रा कोई दूध पीता बच्चा नहीं है। शादी - शुदा है। खुद बच्चों का पिता है। आपका दूसरे की जायज - नाजायज शिकायतों पर वेवजह डाँटना क्या उचित है ? कल्ह आपकी डाँट से क्षुब्ध हो कर कुछ ऐसी -वैसी बात कर ले तो कौन जिम्मेदार होगा ? वह अगर काम ठीक नहीं करता हो , काम छोड़ कर चला जाता हो तो कोई बात है। शायद उन्हें अपनी इस बात का अहसास हुआ और तब से उन्होंने महेंद्र मिश्रा से प्यार से पेश आने लगे। बहुत बाद में होली के अवसर पर महेंद्र मिश्रा ने ऑफिस के सभी स्टाफ के लिए कुछ - कुछ पंक्तियाँ लिखी जिसमें मेरे लिए उसने लिखा - " अब क्या मिशाल दूँ मैं तुम्हारे शबाब की , इंसान बन गई है किरण आफ़ताब की " । अब मेरे सेवानिवृत हुए ग्यारह वर्ष बीत गए हैं , महेंद्र मिश्रा भी सेवानिवृत हो गया है। पर अब भी उसका हमसब के साथ हँसना - हँसाना याद आता है। वह एक बहुत अच्छा दोस्त था।

