Thursday, March 26, 2015

" आँखें "


मॉल में आज बहुत भीड़ थी। शहर का सबसे सुंदर और बड़ा मॉल था। घूमते-घूमते रमन की नजर सामने टेरेस पर खड़ी एक लड़की पर गई। रह -रह कर वह अपनी कलाई की ओर देख रही थी। उसकी अाँखे किसी के इन्तजार में बेचैन सी दिखी - " आँखें " सहसा रमन को झटका सा लगा,कहीं कुछ उसके दिल में चुभा। वह वहाँ से तुरंत घर वापस आ गया। रात आधी से ज्यादा बीत गई थी। रमन की आँखों में नींद नहीं थी। कभी वह बिस्तर पर करवटें बदलता, कभी उठ कर कमरे में टहलने लगता। उसके माथे पर परेशानी की लकीरें स्पष्ट देखी जा सकती थीं। उसे अब भी लगता कि वो दो "आँखे " अब भी उसे देख रही हैं। हाँ ,वो " दो आँखें ",
जो उसने आज से करीब चालीस साल पहले अंतिम बार देखी थी। एक लंबा गुजरा हुआ अंतराल। तब वह हाई स्कूल का छात्र था और वह  इंटर की छात्रा थी। स्कूल घर से लगभग तीन - चार किलोमीटर दूर था। उन दिनों  को-एजुकेशन का इतना प्रचलन नहीं था। दोनों अलग - अलग स्कूल में थे। पर आने -जाने का रास्ता एक ही था और समय भी। इस आने -जाने के क्रम में कब वे एक दूसरे को चाहने लगे, पता ही नहीं चला। यही चाहत धीरे -धीरे प्यार में बदल गया।
        दोनों एक ही मोहल्ले के थे।दोनों के घरों के बीच बहुत फासला था। स्कूल का रास्ता उस लड़की के घर के ठीक सामने से गुजरता था। वह  रोज ही स्कूल के लिए घर से सहेलियों संग तब निकलती थी जब उसे दूर से ही रमन दोस्तों संग आता दिखाई देता था।रमन का आकर्षण भी उसमें बढ़ने लगा पर उससे कैसे कहे कि वह भी उसे चाहने लगा है। अभी तो उसकी उम्र भी चाहने, न चाहने की नहीं थी। किन्तु प्यार और आकर्षण कोई उम्र नहीं देखता।  धीरे - धीरे समय गुजर रहा था। रस्ते में आँख मिचौली भर हो जाती थी। इससे अधिक कुछ नहीं। उम्र का डर, समाज का डर, घर-परिवार का डर ,सब साथ-साथ चल रहा था।हाई स्कूल के बोर्ड की परीक्षा के दिन निकट आ गए थे। रमन परीक्षा की तैयारी में जी -जान से लगा  था। उन्हीं दिनों एक शाम एक छोटा सा लड़का ,उम्र यही कोई आठ -नौ साल का रहा होगा ,रमन के घर आया। उसने कहा - वह अंकित है और दीदी ने उसके लिए किताबें और नोट्स भेजे हैं। एक क्षण के लिए तो रमन भौंचक्का रह गया। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह क्या हुआ। उसने किताबें व नोट्स अंकित से ले लिए। अंकित के जाने के बाद रमन ने देखा -वो इंग्लिश और गणित के कुछ नोट्स, कुछ किताबें ,विगत कुछ वर्षों के बोर्ड के प्रश्न पत्र तथा  साथ में एक छोटा चिट था -" रमन यह तुम्हारे लिए, मन लगा कर तैयारी करो-शुचिता "।रमन का दिल बाँसों उछलने लगा -अच्छा तो यह शुचिता है।उस रात उसे नींद नहीं आई। शुचिता के ख्याल में ही डूबता -उतराता रहा। वह उसका सान्निध्य ,उसकी निकटता पाने को बेताब हो रहा था। अगले दिन स्कूल जाते हुए रमन ने आँखों ही आँखों में उसका आभार जताया।
        बोर्ड की परीक्षा की तैयारी के लिए रमन की छुट्टियाँ पड़ गई। अब दोनों का रोज का मिलना बंद हो गया था। इसी बीच एक दुर्घटना हो गई। शुचिता के चाचा का अचानक ह्रदय गति रूकने से मौत हो गई। घर में कोहराम मच गया। मोहल्ले के ढेर सारे लोग वहाँ इकट्ठे हो गए थे। खबर सुन कर रमन भी पहुँच गया। उनकी उम्र अधिक नहीं थी किन्तु बहुत शराब पीते रहने के कारण उनका फेफड़ा खराब हो गया था। उनके दो छोटे - छोटे बच्चे थे। सात साल की रम्या और चार साल का हेमन्त। शुचिता के दादा - दादी का रो -रो कर बुरा हाल हो रहा था। उसकी चाची मूर्छित हो कर गिर पड़ी  थी। उनके दाँत भिंच गए थे। उसे होश में लाने के लिए लोग पानी के छींटे मार रहे थे। रमन ने तत्परता दिखाई। जेब से रुमाल निकाल कर अपनी ऊँगली में लपेट कर बामुश्किल उनकी दाँतो के बीच डाल कर होश में लाने का प्रयत्न करने लगा। कुछ ही देर में उनकी बेहोशी टूटी। सहारा देकर उन्हें बिठाया,पानी पिलाया अपने कंधे पर उनका सिर रख कर सहलाया,ढाढ़स बँधाया। उनकी आँखों से अब भी आँसू बह  रहे थे।रमन वहाँ बहुत देर तक रहा। इस घटनाक्रम के बाद से शुचिता के घर - परिवार से रमन की निकटता सहज और सम्मानजनक हो गई थी। शुचिता की नजरों में भी वह ऊपर उठ गया था।
            रमन कभी - कभी दादा जी से मिलने चला जाता था। उनकी तबियत अक्सर ख़राब रहा करती थी।समय आगे बढ़ रहा था। रमन को अब रिजल्ट का इन्तजार था। वह अच्छे नंबरों से पास हो गया था। उन  दिनों हाई स्कूल पास कर जाना ही  बड़ी बात होती थी। मोहल्ले में उसका सम्मान बढ़ गया था।अब वह कॉलेज जाने लगा था।उसका आत्मविश्वास भी बढ़ गया था। जब तक रमन ने आई. एस. सी .किया ,शुचिता भी  बी.ए में आ गई थी। रमन का शुचिता से मिलना सुलभ हो गया था। दोनों एक दूसरे से मन ही मन में प्यार करने लगे। लेकिन यह क्रम बहुत दिनों तक नहीं चल पाया। शुचिता के विवाह की बात चलने लगी थी। उसके पिता बिजली विभाग में अच्छे ओहदे पर थे। वे जल्द से जल्द बेटी का विवाह कर देना चाहते थे। शुचिता उदास रहने लगी थी।रमन इन सब बातों से बेखबर वैसे ही उससे मिलता रहा। एक दिन लड़की देखने को लड़के वाले आने वाले  थे। उस दिन शुचिता ने दृढ़ता से माँ से अपने आपको शो -पीस बनने से मना कर दिया। उसकी माँ ने भी गुस्से में आकर उसे थप्पड़ जड़ दिया।सभी लड़कियों की शादी इसी प्रकार तय होती है, तेरे लिए कोई डोली लेकर खड़ा नहीं है। वह विफर पड़ी-मैं कुँवारी रह जाऊँगी ,इस प्रकार शो -पीस नहीं बनूँगी। उसने अपने आपको कमरे में बंद कर लिया। उस दिन वह खूब रोई। उसके पिता को  यह सब मालूम हुआ, उस पर सख्ती बढ़ गई। उसका कॉलेज जाना बंद कर दिया गया। कुछ दिन बाद माँ ने उसे फिर समझाया।उसने माँ से अपने दिल की बात बता दिया कि वह रमन को चाहती है ,उसी से शादी करेगी।उसकी माँ का माथा ठनका ,पर वह सँभल गई। उन्होंने  उससे कुछ नहीं कहा। वह रमन और उसके परिवार को भी जानती थी। रमन की माँ से भी वह कई बार मिल चुकी थी। दोनों एक ही कॉलेज में थे , दोनों  की उम्र लगभग बराबर थी,दोनों अक्सर मिलते -जुलते भी थे ,पर इस बात पर उन्होंने कभी गौर ही नहीं किया था।उन्होंने शुचि के पिता से बात किया। वे नहीं माने।बोले - रमन अभी पढ़ रहा है और वे नौकरी करने वाला लड़का ढूंढ़ रहे हैं।
            इधर, शुचिता जब कॉलेज से अनुपस्थित  रहने लगी तो एक दिन रमन शुचिता के घर आ गया। पहले वह दादा जी और चाची से मिला। वहीं उसको पता चला कि शुचिता की शादी की बात चल रही है। वह उसकी माँ से भी मिला।कोई विशेष बात नहीं हुई। शुचिता कहीं नजर नहीं आई। कुछ देर रुक कर वह वहाँ से चला आया।अब वह अनमना सा रहने लगा। किसी काम में उसका दिल नहीं लगता।वह जितना ही सोचता उतना ही बेचैन हो जाता। परीक्षा का समय निकट आ गया तब उसकी तन्द्रा टूटी। पढ़ाई में दिल लगाने की कोशिश करने लगा। तभी एक दिन कॉलेज में शुचिता से अचानक ही मुलाक़ात हो गई। दोनों कॉलेज के पार्क के एक किनारे बैठ गए। पहले तो वह खूब रोई-रमन तो गूंगा सा हो गया था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह कहाँ से बात शुरु करे।शुचिता ने ही बात शुरु की।बैग से शादी का एक कार्ड निकाल कर रमन के हाथ में दिया। मैं हार गई,रमन,मै वक्त से हार गई,अपने-आप से हार गई हूँ। मेरी शादी में जरूर आना ,मैं तुम्हे प्यार करती हूँ ,करती रहूँगी ,तुम्हारा इंतज़ार करुँगी ,आखिरी बार मेरी डोली में कंधे लगाने आ जाना ,मुझे प्यार से विदा कर देना रमन। इतना कह कर वह रमन के कंधे पर सिर रख कर रोने लगी। बहुत देर तक रमन भी खामोश रोता रहा,बोला कुछ नहीं। बहुत देर तक दोनों रोते रहे। फिर वे दोनों अलग हुए और घर आ गए।
            रमन परीक्षा की तैयारी और परीक्षा में व्यस्त हो गया। शुचिता की शादी हो गई। लड़के के पिता शुचिता के पिता के साथ पहले उसी विभाग में काम करते थे। अब वह किसी दूसरे शहर में रह रहे थे। दोनों में अच्छी दोस्ती थी। खूब धूम -धड़ाके ,गाजे - बाजे के साथ बरात आई थी।रमन बारात भर देख सका। शुचिता को विदा करने का साहस  उसमें नहीं था। वह उसकी शादी में नहीं गया। शुचिता ससुराल चली  गई।
             रमन  की परीक्षा समाप्त हो गई। अब उसका मन उदास रहने लगा। इस उदासी से वह बहुत घबराने लगा। एक दिन वह अपने दोस्त वैभव के साथ उसके गाँव चला गया। वैभव के पिता वकालत करते थे। उनका पुश्तैनी घर गाँव में था। घर क्या था ,पूरी हवेली थी। एक ही आँगन में कई परिवार रहते थे। उसके दादा-दादी ,चाचा-चाची ,और भी कई लोग। उसने सबसे रमन का परिचय करवाया। उसकी भाभी ने तो रमन के गाल पर चिकोटी काट कर स्वागत किया। एकबारगी रमन शरमा गया। शहर से वे दोनों सुबह ही बस से चले थे। यहाँ तक पहुँचते-पहुँचते दोपहर हो गई थी। बस से उतर कर घर तक का रास्ता पैदल ही था। वहाँ कोई रिक्शा या ताँगा नहीं चलता था। कच्ची सड़क थी। कहीं-कहीं खेतों की पतली मेड़ ही पगडंडी का काम कर रही थी। वहाँ वह वैभव के साथ कई दिन रहा। रोज शाम को खेतों पर घूमने जाना उसे अच्छा लगता था। कहीं चने,कहीं  मटर के पौधे लगे थे,कहीं तीसी-सरसों के नीले-पीले फूल हँस रहे थे।हर ओर हरियाली देख कर उसे बहुत आनंद आता था। वैभव की भाभी और प्रियांशी रमन का विशेष ध्यान रखती थीं।प्रियांशी वैभव के चाचा की लड़की थी। कक्षा सात तक ही पढ़ी थी। घर के कामों में हाथ बँटाती थी।वैभव के चाचा ग़ाँव में रह कर ही खेती-बाड़ी  का काम संभालते थे।प्रियांशी को पढ़ने का शौक था किन्तु एक तो ग़ाँव में इससे आगे का स्कूल नहीं था दूसरे चाचा जी के विचार से लड़कियों का अधिक पढ़ना-लिखना अच्छा नहीं होता था ,सो उन्होंने उसे आगे नहीं पढ़ाया और अच्छा सा घर-वर देख कर उसकी शादी कर देना चाहते थे। यद्यपि उसकी उम्र अभी शादी के लायक नहीं थी किन्तु उन दिनों गाँव में कम  उम्र में ही लड़कियों और लड़कों की शादी कर दी जाती थीं। बस लड़के के पिता के पास जमीन-जायदाद होनी चाहिए थी। रमन अपने साथ कुछ उपन्यास ,कुछ कहानियों की किताबें ले गया था। वह उसे पढ़ने को किताबें दे देता था। उसे पढ़ कर वह बहुत खुश होती थी।
धीरे-धीरे बहुत समय बीत गया। रमन शहर लौटना चाह रहा था। उसने वैभव और भाभी से अपने मन की बात बताई और सबसे इजाजत लेकर गाँव से शहर आ गया। वैभव को अभी गाँव में ही रहना था। रमन को उसने बस में बिठा दिया। रमन को छोड़ने कुछ दूर तक दादी, भाभी और प्रियांशी आई थीं। बस चलने के बाद रमन अपनी सीट पर आँखें बंद कर बैठ गया था। उसने देखा- नहाने,खाने से लेकर उसके सोने तक प्रियांशी कितना ख़याल रखती थीं। अपनी तंद्रिल आँखों में उसने देखा -प्रियांशी हाथ हिला कर विदा कर रही है ,वह उदास हो गई है ,और न जाने क्या-क्या। उसकी तन्द्रा तब भंग हुई जब शहर आ गया।
           एक दिन शुचिता का  चचेरा भाई हेमंत मिला। उसने बताया कि उसकी माँ ने उसे बुलाया है। वह उनसे मिलने गया। आज वह बहुत दिनों बाद उनसे मिला था। बहुत सी बातें हुईं। चाची जी से ही उसे पता चला कि शुचिता अपने ससुराल में खुश नहीं है। दहेज़ में कम  सामान मिलने की शिकायत कर कभी-कभी उसे पीटते भी हैं। वे लोग अच्छे आदमी नहीं हैं। यह सब सुन कर रमन तिलमिला उठा पर अब वह कर ही क्या सकता था।कभी उसका मन उससे विद्रोह करने लगता।तभी एक दिन उसको खबर मिली कि  खराब हालत में शुचिता को मायके पहुँचा दिया गया। उसे अस्पताल में भर्ती किया गया किन्तु वह  बच नहीं सकी। रमन भागा-भागा अस्पताल पहुँचा। वहाँ उसके माता-पिता ,भाई-बहन ,परिजन सभी मौजूद थे। सभी रो रहे थे। इमरजेन्सी के बाहर ही उसका मृत शरीर स्ट्रेचर पर पड़ा था। उसके दोनों हाथ उसकी छाती पर क्रॉस का चिन्ह बनाये पड़ा था। उसके शांत होंठ  लगते थे कि अभी वह हँसने वाली है ,उसकी दोनों आँखें खुली थीं......" कागा सब तन खाइयो ,चुन-चुन खइयो मास , मेरे दो नैना मत खाइयो , मोहे पीया मिलान की आश "। अब रमन से नहीं रहा गया ,वह किसी की भी परवाह किये बिना स्ट्रेचर के पास आया ,उसके सिर को चूमा और फिर उसकी दोनों आँखों की पलकों को अपनी हाथों से ढँक दिया -जो रमन को ही पुकार रही थीं ,जो रमन को आखिरी बार देखने को ही खुली रह गई थीं। 
इस प्रकार एक मौन प्रेम कहानी का अंत हो गया।

No comments:

Post a Comment