राजनीति और सेवा - दो अलग - अलग धारायें हैं। सेवा करने वाले राजनीति नहीं करते और राजनीति करने वाले सेवा नहीं करते। यह निर्निवाद सत्य है। सच यह भी है कि देश की प्रगति सरकार से नहीं , देश में काम करने वाले कामगारों और मजदूरों के कंधों पर है। सरकार का काम सिर्फ और सिर्फ नीति निर्धारण का है -अमल में लाना कामगारों का। लेकिन जब यह व्यवस्था भी पटरी से उतरने लगे , भ्रष्टाचार की नाव में सवार होने लगे , तो फिर ईश्वर ही मालिक है। मेरा मानना है कि सांसद और विधायक " सरकार " का एक हिस्सा हैं जो नीति निर्धारण में सहयोग करते हैं। अपने - अपने क्षेत्र की पहचान सांसदों और विधायकों को होनी चाहिए , क्षेत्र की समस्याओं से उन्हें अवगत होनी चाहिये एवं उनके समाधान को सरकारी अमले को लगाया जाना चाहिये जिसमें क्षेत्रवासियों के सहयोग को भी समावेशित किया जाना चाहिये , क्योंकि क्षेत्रवासी ही अपने क्षेत्र की समस्याओं के सबसे निकट होते हैं।
सांसद निधि और विधायक निधि भी इसी काम के लिए जारी किया जाता है जिसका भरपूर उपयोग सांसदों और विधायकों द्वारा किया जाना चाहिए। इससे उनकी साफ़ - सुथरी छवि तो जनमानस में बनती ही है साथ में उनका सम्मान भी बढ़ता है। मेरा मत है कि सहजता और सरलता सांसदों और विधायकों का अस्त्र होना चाहिए , गुण होना चाहिए। जो जितना सहज होगा ,सरल होगा , वही जनता के दिल पर राज करेगा। उसे फिर किसी बात का भय नहीं रहेगा , न उसे किसी विशेष सुरक्षा की ही आवश्यकता महसूस होगी , न ही किसी चुनाव में हारने का डर।
नेता और जनता के बीच समन्वय हो , संवाद हो ,निकटता हो - बहुधा यह देखने को नहीं मिलता। नेता बनते ही दोनों के बीच की दूरियाँ बढ़ जाती हैं। जिस कारण नेता की लोकप्रियता घटने लगती है। जनता के दुःख - दर्द को स्वयं में महसूस करना और चुनाव को ध्यान में रख कर पैदल गाँव - गाँव घूमना ,घर - घर पहुँचना , दिखावटी हमदर्दी जतलाना , दोनों अलग - अलग अस्तित्त्व रखती है। आम जनता भी इस मनोभाव को खूब समझती है और उसी अनुरूप समय आने पर माकूल जबाब भी देती है।
हमारे पास संसाधन की कोई कमी नहीं है - कमी है तो बस मनोबल की ,दृढ संकल्प की, इच्छा शक्ति की ,स्व के इर्द - गिर्द घूमते रहने की। हम त्याग का उपदेश बहुत देते हैं पर स्वयं त्याग करने से कतराते हैं। " पर उपदेश कुशल बहुतेरे "।
काम कोई छोटा या बड़ा नहीं होता। काम तो काम है -चाहे वह दीवार बनाने का हो ,मोची का जूता गाँठने का हो , बढ़ई का काम हो ,ऑफिस - कार्यालय का हो , चाहे हम पुलिस में हों या फिर फ़ौज में, डॉक्टर हों या दुकानदार - काम का कोई भी क्षेत्र हो , उसमें हम थोड़ी सी भी ईमानदारी निभायें तो समाज का उत्थान होगा ही होगा , हमारा भी मान - सम्मान ,यश बढ़ेगा। यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है और मानना भी। हम जहाँ भी काम करें , जिस पद पर भी काम करें ,अपनी जिम्मेदारी समझें , जवाबदेही समझें , काम के प्रति ईमानदारी बरतें। यह हमारा लक्ष्य होना चाहिये। इसमें कभी चूक भी हो सकती है , फिर भी हम सतर्क रहें कि चूक की पुनरावृति न हो। ग्रह - नक्षत्र , तारे - सितारे , चाँद -सूरज , प्रकृति सभी एक नियम में बद्ध हैं। इनमें ज़रा सी भी अनियमितता आ जाने से क्या -क्या उथल - पुथल हो जाता है। यही बात हमारे जीवन पर भी लागू है। हमारे आचरण और स्वभाव - विचार पर भी लागू है।
तो , आइये , हम राष्ट्र की समृद्धि में, राष्ट्र के विकास में अपना योगदान करें। अपने आचरण और विचार को स्वच्छ करें और एक नए उन्नत समाज औए राष्ट्र के निर्माण में अपनी सहभागिता अर्पित करें। जय भारत , जय भारत राष्ट्र।
( प्रकाशित )
सांसद निधि और विधायक निधि भी इसी काम के लिए जारी किया जाता है जिसका भरपूर उपयोग सांसदों और विधायकों द्वारा किया जाना चाहिए। इससे उनकी साफ़ - सुथरी छवि तो जनमानस में बनती ही है साथ में उनका सम्मान भी बढ़ता है। मेरा मत है कि सहजता और सरलता सांसदों और विधायकों का अस्त्र होना चाहिए , गुण होना चाहिए। जो जितना सहज होगा ,सरल होगा , वही जनता के दिल पर राज करेगा। उसे फिर किसी बात का भय नहीं रहेगा , न उसे किसी विशेष सुरक्षा की ही आवश्यकता महसूस होगी , न ही किसी चुनाव में हारने का डर।
नेता और जनता के बीच समन्वय हो , संवाद हो ,निकटता हो - बहुधा यह देखने को नहीं मिलता। नेता बनते ही दोनों के बीच की दूरियाँ बढ़ जाती हैं। जिस कारण नेता की लोकप्रियता घटने लगती है। जनता के दुःख - दर्द को स्वयं में महसूस करना और चुनाव को ध्यान में रख कर पैदल गाँव - गाँव घूमना ,घर - घर पहुँचना , दिखावटी हमदर्दी जतलाना , दोनों अलग - अलग अस्तित्त्व रखती है। आम जनता भी इस मनोभाव को खूब समझती है और उसी अनुरूप समय आने पर माकूल जबाब भी देती है।
हमारे पास संसाधन की कोई कमी नहीं है - कमी है तो बस मनोबल की ,दृढ संकल्प की, इच्छा शक्ति की ,स्व के इर्द - गिर्द घूमते रहने की। हम त्याग का उपदेश बहुत देते हैं पर स्वयं त्याग करने से कतराते हैं। " पर उपदेश कुशल बहुतेरे "।
काम कोई छोटा या बड़ा नहीं होता। काम तो काम है -चाहे वह दीवार बनाने का हो ,मोची का जूता गाँठने का हो , बढ़ई का काम हो ,ऑफिस - कार्यालय का हो , चाहे हम पुलिस में हों या फिर फ़ौज में, डॉक्टर हों या दुकानदार - काम का कोई भी क्षेत्र हो , उसमें हम थोड़ी सी भी ईमानदारी निभायें तो समाज का उत्थान होगा ही होगा , हमारा भी मान - सम्मान ,यश बढ़ेगा। यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है और मानना भी। हम जहाँ भी काम करें , जिस पद पर भी काम करें ,अपनी जिम्मेदारी समझें , जवाबदेही समझें , काम के प्रति ईमानदारी बरतें। यह हमारा लक्ष्य होना चाहिये। इसमें कभी चूक भी हो सकती है , फिर भी हम सतर्क रहें कि चूक की पुनरावृति न हो। ग्रह - नक्षत्र , तारे - सितारे , चाँद -सूरज , प्रकृति सभी एक नियम में बद्ध हैं। इनमें ज़रा सी भी अनियमितता आ जाने से क्या -क्या उथल - पुथल हो जाता है। यही बात हमारे जीवन पर भी लागू है। हमारे आचरण और स्वभाव - विचार पर भी लागू है।
तो , आइये , हम राष्ट्र की समृद्धि में, राष्ट्र के विकास में अपना योगदान करें। अपने आचरण और विचार को स्वच्छ करें और एक नए उन्नत समाज औए राष्ट्र के निर्माण में अपनी सहभागिता अर्पित करें। जय भारत , जय भारत राष्ट्र।
( प्रकाशित )
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