जनाज़े में मैं भी शामिल था । यह ज़नाज़ा एक मशहूर शायर का था । महफिलों और काव्य गोष्ठियों में उनका कोई सानी नहीं था । क्या श्रोता क्या वक्ता सभी वाह - वाह कह उठते थे । मोटे शीशे का चश्मा हमेशा उनकी नाक पर रहता था । अक्सर वह बिना किताब - कागज़ के ही शेर सुनाया करते थे । अलग - अलग अंदाज़ की शायरी थी उनकी । कहीं जवाँ दिलों की धड़कने थाम लेते तो कहीं - कहीं उफान लाते , कहीं कुछ सुर्खरू रुबाईयोँ से बुजुर्गों के दिल में तम्मनायें जगाते ।
आज ये रौशनी बुझ गई है , शायरी खामोश हो गई है , सदा - सदा के लिये । उनके नाते - रिश्तेदार , पड़ोसी ज़नाज़े में शामिल थे , कुछ शायर और कवि भी । ऊपर आसमान पर बादल छाये थे ,बिजलियाँ खामोश थीं , जैसे वे भी शोक में डूबे हों । ज़नाज़ा उठा , थके मन से लोग ज़नाज़े के साथ चल दिये । कुछ उनमें से राह से ही अलग हो लिए तो कुछ कर्म भूमि के अंतिम पड़ाव तक पहुँच कर वापस हो लिए । अब गिनती के ही लोग श्मशान घाट पर थे । धार्मिक विधान पूरी कर मुखाग्नि का कार्यक्रम हुआ , फिर उस बुज़ुर्ग शायर की चिता धू - धू कर जल उठी । इस बीच समयावकास पाकर कुछ लोग बेंच पर बैठे , कुछ लोग खड़े - खड़े गप्पें लड़ाने लगे तो चंद शायर मिजाज़ अपने दोस्तों को शायरी सुनाने लगे - ताज़ी ग़ज़ल के चंद असार जो अभी - अभी बने हैं , सुनें ……. ।
" उनकी ज़ुल्फ़ है या है काली घटा ,
या कोई नागिन काली ,
उफ़ ! हम तो भीग भी गए ,
बेसुध भी हुए
जैसे कोई दंस दे गया मुझको
इस बरसात में ……"
वाह ! वाह ! की ध्वनि उठती , इससे पहले
ही श्मशान से विदाई का वक्त आ गया , फिर धीरे - धीरे लोग
बाहर निकल कर जल्दी - जल्दी अपने घर को चल दिये …।
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