डायरी का पन्ना- विजय कुमार सिन्हा "तरुण "
रामपुर - 27 जून 1973
रामपुर रेलवे स्टेशन का प्लेटफ़ॉर्म ।बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी । मैं अपने इंस्पेक्टर रूम में बैठा बारिश में भींगते और भागते लोगों को देख रहा था । तभी मेरी नज़र प्लेटफ़ॉर्मन नंबर 2 पर गई ।
वह सिर से पैर तक भींग गई थी । अपने कंधे से भींगे चुन्नी को उतार कर उसने निचोड़ा ।पंजाबी लिबास में वह एक गरीब औरत लग रही थी - उम्र यही कोई 25-26 की रही होगी । गोरा-गोरा रंग , बारिश की बूंदों में भींगे हुए चेहरे पर भींगी काली लटें ,जैसे चाँद को ढकने का काले बादलों का विफल प्रयास ....
ड्यूटी पर घूम रहे हवलदार की नज़र उस पर पड़ी । उसने उसके इर्द - गिर्द कई चक्कर काटे , सी. आर.पी. के जवानों की टोली की आँखे भी उठने से नहीं चूकीं, दो-चार और मनचलों की नज़रें भी उस ओर उठ
गईं । हाँ तो , उसने चुन्नी निचोड़ा और फिर उसे ही ओढ़ कर कुछ क्षण खड़ी रही फिर एक बेंच पर बैठ गई ,भींगे कपड़ों में ही ।
हवलदार चक्कर लगाता रहा , कई खूंखार व ललचाई नज़रें उसे घूरतीं रहीं । उसने अब अपना सिर अपनी गोद में छिपा लिया था । पास की बेंच पर बैठे कुछ लोग उठ कर चले गए थे। बारिस कुछ हलकी हो गई थी। उसने अब अपनी जूती पाँव से निकाल कर बेंच के नीचे रख दिया फिर उसी भींगे कपड़ों में ,भींगी चुन्नी को बदन से लपेटे उसी बेंच पर सो गई .........
रामपुर - 27 जून 1973
रामपुर रेलवे स्टेशन का प्लेटफ़ॉर्म ।बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी । मैं अपने इंस्पेक्टर रूम में बैठा बारिश में भींगते और भागते लोगों को देख रहा था । तभी मेरी नज़र प्लेटफ़ॉर्मन नंबर 2 पर गई ।
वह सिर से पैर तक भींग गई थी । अपने कंधे से भींगे चुन्नी को उतार कर उसने निचोड़ा ।पंजाबी लिबास में वह एक गरीब औरत लग रही थी - उम्र यही कोई 25-26 की रही होगी । गोरा-गोरा रंग , बारिश की बूंदों में भींगे हुए चेहरे पर भींगी काली लटें ,जैसे चाँद को ढकने का काले बादलों का विफल प्रयास ....
ड्यूटी पर घूम रहे हवलदार की नज़र उस पर पड़ी । उसने उसके इर्द - गिर्द कई चक्कर काटे , सी. आर.पी. के जवानों की टोली की आँखे भी उठने से नहीं चूकीं, दो-चार और मनचलों की नज़रें भी उस ओर उठ
गईं । हाँ तो , उसने चुन्नी निचोड़ा और फिर उसे ही ओढ़ कर कुछ क्षण खड़ी रही फिर एक बेंच पर बैठ गई ,भींगे कपड़ों में ही ।
हवलदार चक्कर लगाता रहा , कई खूंखार व ललचाई नज़रें उसे घूरतीं रहीं । उसने अब अपना सिर अपनी गोद में छिपा लिया था । पास की बेंच पर बैठे कुछ लोग उठ कर चले गए थे। बारिस कुछ हलकी हो गई थी। उसने अब अपनी जूती पाँव से निकाल कर बेंच के नीचे रख दिया फिर उसी भींगे कपड़ों में ,भींगी चुन्नी को बदन से लपेटे उसी बेंच पर सो गई .........
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