डायरी का पन्ना - 2
डायरी - विजय कुमार सिन्हा "तरुण "
इकवालपुर /सहारनपुर -12.10.1973
सहारनपुर का रेलवे हॉस्पिटल । डाँक्टर श्रीवास्तव के चैम्बर के बाहर पुरुषों व स्त्रियों की अलग -अलग दो लम्बी कतारें -समानान्तर । स्त्रियों की कतार में एक सोलह -सत्रह साल की सांवली लड़की मेरे ही बगल में खड़ी थी ( मैं भी पुरुषों की कतार में खड़ा था )। दरअसल 7-10-1973 को मेरा बाँया टखना चोटिल हो गया था और उसमें मोच आ गया था जिस कारण उसमें बहुत दर्द तथा सूजन आ गई थी । उन दिनों मैं इकवालपुर स्टेशन पर कार्यरत था और यह स्टेशन सहारनपुर रेलवे हॉस्पिटल के ही अंतर्गत आता था ।
हाँ ,तो वह लड़की कुछ देर तक खड़ी रहने के पश्चात ,पास के ही एक बेंच पर बैठ गई । कुछ ही देर बाद वह बेहोश हो गई -मेरी नजर तब पड़ी जब उसकी छोटी बहन उसे होश में लाने का प्रयत्न कर रही थी । डाँक्टर के कमरे में प्रवेश के लिए दोनों ही कतारों में रेल -पेल चल रही थी । किसी ने भी उस लड़की का ख्याल नहीं किया -सभी को सिर्फ अपनी बारी की ही फ़िक्र थी । वह लड़की बेहोश थी -उसकी छोटी बहन उसे होश में लाने के प्रयास में उसे बार -बार पुकार रही थी।दस -पंद्रह मिनट बाद वह होश में आ गई थी किन्तु अच्छी तरह नहीं।कतार में रेल - पेल अब भी चल रही थी ,अब भी किसी ने लड़की को पहले प्रवेश की अनुमति नहीं दी । वह उसी बेंच पर बैठी रही । करीब एक घंटे के उपरान्त पुरुषों की क़तर में मेरा नंम्बर आ गया था ।रूक कर मैंने उस लड़की को इशारे से अपने पास बुलाया और वह लड़की मन्त्र -मुग्ध सी चुप -चाप मेरे पास आ गई । मैंने उससे पूछा कि उसके साथ कौन है तो उसका एक संक्षिप्त उत्तर था -छोटी बहन । तत्पशात दरवाजा खोल कर पहले उसे और उसकी छोटी बहन को प्रवेश कराया , फिर मैं गया । डाँक्टर से दिखलाकर उसे दवाई के लिए भेज दिया । मैं भी दवाई लेकर इकवालपुर स्टेशन आ गया । रास्ते भर मैं यह सोचता रहा कि क्या आज का आदमी इतना संकीर्ण, संवेदनहीन और स्वार्थलोलुप हो गया है कि किसी की वेदना , किसी का दर्द, किसी की चीख भी उसकी आत्मा को जगा नहीं पाती है ?
डायरी - विजय कुमार सिन्हा "तरुण "
इकवालपुर /सहारनपुर -12.10.1973
सहारनपुर का रेलवे हॉस्पिटल । डाँक्टर श्रीवास्तव के चैम्बर के बाहर पुरुषों व स्त्रियों की अलग -अलग दो लम्बी कतारें -समानान्तर । स्त्रियों की कतार में एक सोलह -सत्रह साल की सांवली लड़की मेरे ही बगल में खड़ी थी ( मैं भी पुरुषों की कतार में खड़ा था )। दरअसल 7-10-1973 को मेरा बाँया टखना चोटिल हो गया था और उसमें मोच आ गया था जिस कारण उसमें बहुत दर्द तथा सूजन आ गई थी । उन दिनों मैं इकवालपुर स्टेशन पर कार्यरत था और यह स्टेशन सहारनपुर रेलवे हॉस्पिटल के ही अंतर्गत आता था ।
हाँ ,तो वह लड़की कुछ देर तक खड़ी रहने के पश्चात ,पास के ही एक बेंच पर बैठ गई । कुछ ही देर बाद वह बेहोश हो गई -मेरी नजर तब पड़ी जब उसकी छोटी बहन उसे होश में लाने का प्रयत्न कर रही थी । डाँक्टर के कमरे में प्रवेश के लिए दोनों ही कतारों में रेल -पेल चल रही थी । किसी ने भी उस लड़की का ख्याल नहीं किया -सभी को सिर्फ अपनी बारी की ही फ़िक्र थी । वह लड़की बेहोश थी -उसकी छोटी बहन उसे होश में लाने के प्रयास में उसे बार -बार पुकार रही थी।दस -पंद्रह मिनट बाद वह होश में आ गई थी किन्तु अच्छी तरह नहीं।कतार में रेल - पेल अब भी चल रही थी ,अब भी किसी ने लड़की को पहले प्रवेश की अनुमति नहीं दी । वह उसी बेंच पर बैठी रही । करीब एक घंटे के उपरान्त पुरुषों की क़तर में मेरा नंम्बर आ गया था ।रूक कर मैंने उस लड़की को इशारे से अपने पास बुलाया और वह लड़की मन्त्र -मुग्ध सी चुप -चाप मेरे पास आ गई । मैंने उससे पूछा कि उसके साथ कौन है तो उसका एक संक्षिप्त उत्तर था -छोटी बहन । तत्पशात दरवाजा खोल कर पहले उसे और उसकी छोटी बहन को प्रवेश कराया , फिर मैं गया । डाँक्टर से दिखलाकर उसे दवाई के लिए भेज दिया । मैं भी दवाई लेकर इकवालपुर स्टेशन आ गया । रास्ते भर मैं यह सोचता रहा कि क्या आज का आदमी इतना संकीर्ण, संवेदनहीन और स्वार्थलोलुप हो गया है कि किसी की वेदना , किसी का दर्द, किसी की चीख भी उसकी आत्मा को जगा नहीं पाती है ?
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