उस लड़की की याद मुझे अब भी आती है , उसकी निश्छलता , उसका आकर्षण , और सबसे अधिक उसकी मधुर , मिठास भरी बोली , अब भी मेरे ज़ेहन में समाये हुए हैं ।
अब तक वह बहुत बड़ी हो गई होगी । शायद उसके बच्चे भी बड़े हो गए होंगे । तब वह यही कोई 6 - 7 वर्ष के वय की रही होगी । गोरी - चिट्टी , बड़ी - बड़ी गोल आँखे ,जिसमें अभाव , विस्मय , कौतूहल और प्रश्न ही तैरते दिखे मुझे । वह सदैब एक ही फ्रॉक में दिखाई पड़ती थी । जनवरी के महीने में भी अल सुबह कड़ - कड़ाती ठंढ में भी घुटनों तक का वह फ्रॉक , उस पर एक मैला सा ,हाथ का बुना ऊन का आधी बाँह का स्वेटर ।
स्टेशन का लंबा खुला प्लेटफ़ॉर्म - जाड़े की चुभती ठंढी हवा , जो मेरे वूलन कोट की दीवार को पार कर मेरी रूह को भी कँप-कँपा जाती थी .......
वह सदैव हमवय के झुण्ड में ही स्टेशन प्लेटफ़ॉर्म पर पास के ही गाँव जो स्टेशन से लगभग दो सौ मीटर रही होगी , आती थी । यह 200 मीटर का रास्ता वैतरणी पार करने से कम नहीं था - हर ओर गंदगी और कीचड़ ही कीचड़ । गाँव से कुछ ही दूरी पर पक्की सड़क थी ,दुकानें थीं और पुलिस थाना भी था जहाँ पहुँचने के लिये इसी गाँव के घरों के बीच तंग , सँकरा व गंदे पानी - कीचड़ से भरे गली से जाना होता था ।
दरअसल , इस स्टेशन से रेल के माल डिब्बों में गन्ने का लदान होता था जो कई चीनी मिलों को भेजा जाता था । स्टेशन क्या था,कुल मिला - जुला कर बस स्टेशन मास्टर का एक कमरा,जिसमें गाड़ी संचालन के साथ -साथ टिकट खिड़की भी उसी में थी और दूसरा छोटा सा कमरा स्टोर का था जहाँ मिट्टी का तेल एवं कुछ अन्य सामान रखा होता था । यह कमरा अक्सर बंद रहता था ।
मिस्टर मिर्ज़ा , इस स्टेशन पर सीनियर स्टेशन मास्टर थे । उनका घर अगले स्टेशन के शहर में था । उम्र लगभग 50 -52 के रही होगी । उनके एक बेटा और चार - पाँच बेटियाँ थीं , सभी एक से बढ़ कर एक खूबसूरत, जो कभी - कभार अपने अब्बू के साथ यहाँ घूमने आ जाया करती थीं । उनके आने का मकसद घूमने का नहीं होता था । मिर्ज़ा साहब गन्ने के ठेकेदार से गन्ने का दो - चार बण्डल गन्ने का मंगवाते थे जो वे स्वयं ही ड्यूटी ख़त्म कर अपने साथ ले जाते या फिर इन बच्चों के साथ भेज दिया करते थे ।
गन्ने का बण्डल बाहर बरामदे में रक्खा होता था । गाँव के कुछ अभावग्रस्त बच्चे गन्ने का एक टुकड़ा पाने की लालसा में बरामदे के इर्द -गिर्द चक्कर काटते रहते थे । मिर्ज़ा साहब कभी - कभार किसी ख़ास बच्चे को गन्ना दे भी देते थे , किन्तु यह तभी संभव हो पाता था जब वह बच्चा उन्हें सस्ते में अंडे देता था।
अंडे बेचना इन गरीब बच्चों की मजबूरी थी ,शायद इससे घर का कुछ गुज़ारा हो जाता ,नमक- दाल का ही जुगाड़ हो जाता हो ( उन दिनों , दाल आज की तरह मंहगी नहीं थी ) । यद्दपि एक अंडे की कीमत सिर्फ चार आने थी , वह भी देशी अंडे ।
इस गाँव के प्राय:हर घरों में मुर्गियाँ पालीं जाती थीं । इसलिए कोई द-,चार या कोई -कोई एक ही अंडा लेकर बेचने आ जाता या आ जाती थी।
मिर्ज़ा साहब रोज ही अंडे लेते थे,आठ या दस या कभी-कभी कुछ ज्यादा ही।कुछ तो ट्रेन के यात्री खरीद लेते थे कुछ ट्रेन के गार्ड और ड्राईवर । इस तरह अंडे के व्यापार से शायद उनके घर का थोड़ा बहुत खर्च निकल आता था ।
एक दिन " वह लड़की " अपने हाथ का अंडा नहीं बेच पाई।उसके हाथ में एक ही अंडा था। शायद वह देर से आई थी , ट्रेन जा चुकी थी ,कोई यात्री भी प्लेटफ़ॉर्म पर नहीं था । उसने मिर्ज़ा साहब से बार -बार मिन्नतें की ।" बीस पैसे दूँगा" - मिर्ज़ा साहब ने कहा , पर लड़की पच्चीस पैसे मांग रही थी । उन्होंने लड़की को झिड़क दिया । वह रुआँसी हो कर प्लेटफ़ॉर्म पर बने सीमेंट के बेंच पर बैठ गई । उसकी बड़ी - बड़ी गोल आँखों से आँसू निकल आये । उसके साथ की कुछ लड़कियाँ और लड़के उसे घेर कर खड़े थे । कुछ दूर पर खड़ा मैं यह सब देख रहा था , फिर मुझे क्या सूझा कि मैं उनके पास जा कर खड़ा हो गया । तब उस लड़की ने कहा - बाबूजी आप ले लो अंडे । मैने कहा - मैं अंडे नहीं खाता हूँ । वह फिर उदास हो गई और उसकी आँखों से फिर आँसू बह निकले। वह कह रही थी - मैं अम्मी को क्या बताऊँगी , अगर मैं पैसे लेकर घर नहीं गई तो अम्मी मुझे मारेगी ।
मुझे लगा कि किसी ने मेरे सीने पर हथौड़े से चोट कर दिया है । गरीबी में अक्सर छोटे बच्चे ही पिसते हैं । मैंने कहा- लाओ मुझे दे दो अंडे , कितने का है ? वह बोली- "चार आने " , पर बाबूजी आप क्या करेंगे अंडे लेकर , आप तो खाते नहीं । मैं खा लूँगा - मैंने कहा । नहीं बाबूजी आप नहीं खायेंगे , आप फेंक देंगे । नहीं , मैं खा लूंगा , मैंने उसे विश्वास दिलाया । नहीं बाबूजी , आप फेंकना नहीं , अल्लाह मुझे माफ़ नहीं करेगा । मैंने कहा,मैं सच में खा लूँगा । मैंने उसे अठन्नी दी, उसने उसे लौटा दिया - बाबूजी छुट्टे नहीं हैं । मैंने उसे रख लेने को कहा तो बोली- नहीं बाबूजी मुझे चार आने ही चाहिए,अम्मी मुझे मारेगी,कहेगी, मैंने चोरी की होगी, मैं अल्लाह को क्या ज़बाब दूँगी , मैं चोर नहीं हूँ बाबूजी …………
उसकी निश्छलता , सत्यता और भोलेपन से युक्त बातें सुन कर मैं विमुग्ध हो गया - इतनी सी उम्र और यह सोच ! मुझे अठन्नी मजबूरन वापस लेनी पड़ी और जेब से चवन्नी निकाल कर दिया फिर उन बच्चों के सामने ही मैंने अंडे को हथेली पर तोड़ कर सफेदी को बाहर गिरा दिया और ज़र्दी को कच्चा ही गटक गया । यह देख कर उस छोटी सी बच्ची के मुख से " हाय ! अल्लाह ! " का शब्द जिस लोच और विस्मय से निकला वह आज भी मेरे कानों में गूँजती रहती है। उसकी निश्छलता , उसका भोलापन , उसकी बड़ी - बड़ी , गोल - गोल डबडबाई आँखें - सब कुछ आज भी मुझे साफ - साफ दिखता है । गरीबी में भी ग़ुरबत - इतनी अशिक्षित होती हुई भी इतनी शिक्षित , धन्य है वह माँ और वह बेटी ।
कौन कहता है कि गरीबी में ग़ुरबत नहीं है ? सच तो यही है हम
शिक्षित और अमीर लोग चाहे जितनी भी ढोल पीट लें , अगर ईमानदारी और संस्कार जीवित है तो गरीबों और अशिक्षितों के दिलों में आज भी जीवित है।
विजय कुमार सिन्हा " तरुण "
डी - 40 , रेस कोर्स , देहरादून
( उत्तराखण्ड ) - 248001
मो० - 9897700208
अब तक वह बहुत बड़ी हो गई होगी । शायद उसके बच्चे भी बड़े हो गए होंगे । तब वह यही कोई 6 - 7 वर्ष के वय की रही होगी । गोरी - चिट्टी , बड़ी - बड़ी गोल आँखे ,जिसमें अभाव , विस्मय , कौतूहल और प्रश्न ही तैरते दिखे मुझे । वह सदैब एक ही फ्रॉक में दिखाई पड़ती थी । जनवरी के महीने में भी अल सुबह कड़ - कड़ाती ठंढ में भी घुटनों तक का वह फ्रॉक , उस पर एक मैला सा ,हाथ का बुना ऊन का आधी बाँह का स्वेटर ।
स्टेशन का लंबा खुला प्लेटफ़ॉर्म - जाड़े की चुभती ठंढी हवा , जो मेरे वूलन कोट की दीवार को पार कर मेरी रूह को भी कँप-कँपा जाती थी .......
वह सदैव हमवय के झुण्ड में ही स्टेशन प्लेटफ़ॉर्म पर पास के ही गाँव जो स्टेशन से लगभग दो सौ मीटर रही होगी , आती थी । यह 200 मीटर का रास्ता वैतरणी पार करने से कम नहीं था - हर ओर गंदगी और कीचड़ ही कीचड़ । गाँव से कुछ ही दूरी पर पक्की सड़क थी ,दुकानें थीं और पुलिस थाना भी था जहाँ पहुँचने के लिये इसी गाँव के घरों के बीच तंग , सँकरा व गंदे पानी - कीचड़ से भरे गली से जाना होता था ।
दरअसल , इस स्टेशन से रेल के माल डिब्बों में गन्ने का लदान होता था जो कई चीनी मिलों को भेजा जाता था । स्टेशन क्या था,कुल मिला - जुला कर बस स्टेशन मास्टर का एक कमरा,जिसमें गाड़ी संचालन के साथ -साथ टिकट खिड़की भी उसी में थी और दूसरा छोटा सा कमरा स्टोर का था जहाँ मिट्टी का तेल एवं कुछ अन्य सामान रखा होता था । यह कमरा अक्सर बंद रहता था ।
मिस्टर मिर्ज़ा , इस स्टेशन पर सीनियर स्टेशन मास्टर थे । उनका घर अगले स्टेशन के शहर में था । उम्र लगभग 50 -52 के रही होगी । उनके एक बेटा और चार - पाँच बेटियाँ थीं , सभी एक से बढ़ कर एक खूबसूरत, जो कभी - कभार अपने अब्बू के साथ यहाँ घूमने आ जाया करती थीं । उनके आने का मकसद घूमने का नहीं होता था । मिर्ज़ा साहब गन्ने के ठेकेदार से गन्ने का दो - चार बण्डल गन्ने का मंगवाते थे जो वे स्वयं ही ड्यूटी ख़त्म कर अपने साथ ले जाते या फिर इन बच्चों के साथ भेज दिया करते थे ।
गन्ने का बण्डल बाहर बरामदे में रक्खा होता था । गाँव के कुछ अभावग्रस्त बच्चे गन्ने का एक टुकड़ा पाने की लालसा में बरामदे के इर्द -गिर्द चक्कर काटते रहते थे । मिर्ज़ा साहब कभी - कभार किसी ख़ास बच्चे को गन्ना दे भी देते थे , किन्तु यह तभी संभव हो पाता था जब वह बच्चा उन्हें सस्ते में अंडे देता था।
अंडे बेचना इन गरीब बच्चों की मजबूरी थी ,शायद इससे घर का कुछ गुज़ारा हो जाता ,नमक- दाल का ही जुगाड़ हो जाता हो ( उन दिनों , दाल आज की तरह मंहगी नहीं थी ) । यद्दपि एक अंडे की कीमत सिर्फ चार आने थी , वह भी देशी अंडे ।
इस गाँव के प्राय:हर घरों में मुर्गियाँ पालीं जाती थीं । इसलिए कोई द-,चार या कोई -कोई एक ही अंडा लेकर बेचने आ जाता या आ जाती थी।
मिर्ज़ा साहब रोज ही अंडे लेते थे,आठ या दस या कभी-कभी कुछ ज्यादा ही।कुछ तो ट्रेन के यात्री खरीद लेते थे कुछ ट्रेन के गार्ड और ड्राईवर । इस तरह अंडे के व्यापार से शायद उनके घर का थोड़ा बहुत खर्च निकल आता था ।
एक दिन " वह लड़की " अपने हाथ का अंडा नहीं बेच पाई।उसके हाथ में एक ही अंडा था। शायद वह देर से आई थी , ट्रेन जा चुकी थी ,कोई यात्री भी प्लेटफ़ॉर्म पर नहीं था । उसने मिर्ज़ा साहब से बार -बार मिन्नतें की ।" बीस पैसे दूँगा" - मिर्ज़ा साहब ने कहा , पर लड़की पच्चीस पैसे मांग रही थी । उन्होंने लड़की को झिड़क दिया । वह रुआँसी हो कर प्लेटफ़ॉर्म पर बने सीमेंट के बेंच पर बैठ गई । उसकी बड़ी - बड़ी गोल आँखों से आँसू निकल आये । उसके साथ की कुछ लड़कियाँ और लड़के उसे घेर कर खड़े थे । कुछ दूर पर खड़ा मैं यह सब देख रहा था , फिर मुझे क्या सूझा कि मैं उनके पास जा कर खड़ा हो गया । तब उस लड़की ने कहा - बाबूजी आप ले लो अंडे । मैने कहा - मैं अंडे नहीं खाता हूँ । वह फिर उदास हो गई और उसकी आँखों से फिर आँसू बह निकले। वह कह रही थी - मैं अम्मी को क्या बताऊँगी , अगर मैं पैसे लेकर घर नहीं गई तो अम्मी मुझे मारेगी ।
मुझे लगा कि किसी ने मेरे सीने पर हथौड़े से चोट कर दिया है । गरीबी में अक्सर छोटे बच्चे ही पिसते हैं । मैंने कहा- लाओ मुझे दे दो अंडे , कितने का है ? वह बोली- "चार आने " , पर बाबूजी आप क्या करेंगे अंडे लेकर , आप तो खाते नहीं । मैं खा लूँगा - मैंने कहा । नहीं बाबूजी आप नहीं खायेंगे , आप फेंक देंगे । नहीं , मैं खा लूंगा , मैंने उसे विश्वास दिलाया । नहीं बाबूजी , आप फेंकना नहीं , अल्लाह मुझे माफ़ नहीं करेगा । मैंने कहा,मैं सच में खा लूँगा । मैंने उसे अठन्नी दी, उसने उसे लौटा दिया - बाबूजी छुट्टे नहीं हैं । मैंने उसे रख लेने को कहा तो बोली- नहीं बाबूजी मुझे चार आने ही चाहिए,अम्मी मुझे मारेगी,कहेगी, मैंने चोरी की होगी, मैं अल्लाह को क्या ज़बाब दूँगी , मैं चोर नहीं हूँ बाबूजी …………
उसकी निश्छलता , सत्यता और भोलेपन से युक्त बातें सुन कर मैं विमुग्ध हो गया - इतनी सी उम्र और यह सोच ! मुझे अठन्नी मजबूरन वापस लेनी पड़ी और जेब से चवन्नी निकाल कर दिया फिर उन बच्चों के सामने ही मैंने अंडे को हथेली पर तोड़ कर सफेदी को बाहर गिरा दिया और ज़र्दी को कच्चा ही गटक गया । यह देख कर उस छोटी सी बच्ची के मुख से " हाय ! अल्लाह ! " का शब्द जिस लोच और विस्मय से निकला वह आज भी मेरे कानों में गूँजती रहती है। उसकी निश्छलता , उसका भोलापन , उसकी बड़ी - बड़ी , गोल - गोल डबडबाई आँखें - सब कुछ आज भी मुझे साफ - साफ दिखता है । गरीबी में भी ग़ुरबत - इतनी अशिक्षित होती हुई भी इतनी शिक्षित , धन्य है वह माँ और वह बेटी ।
कौन कहता है कि गरीबी में ग़ुरबत नहीं है ? सच तो यही है हम
शिक्षित और अमीर लोग चाहे जितनी भी ढोल पीट लें , अगर ईमानदारी और संस्कार जीवित है तो गरीबों और अशिक्षितों के दिलों में आज भी जीवित है।
विजय कुमार सिन्हा " तरुण "
डी - 40 , रेस कोर्स , देहरादून
( उत्तराखण्ड ) - 248001
मो० - 9897700208
No comments:
Post a Comment