Monday, August 12, 2013

एक ख़त अनाम के नाम

               कमबख्त चौबीस घंटे का समय भी कितना छोटा हो गया है । जिन्दगी रोजमर्रा के कार्यों में इतना व्यस्त रहता है कि पता ही नहीं चलता किस तरह दिन पर दिन बीत जाते हैं । लम्हा भर साँस लेने को भी फुर्सत नहीं होती , घर और दफ़्तर , दफ़्तर और घर - यही जिन्दगी का नाम हो गया है । दो क्षण जो फुर्सत की सोचो तो अनेक समस्यायें खड़ी हो जाती हैं और चीख - चीख कर कहती हैं कि पहले मेरा हल निकालो , पहले मेरा हल निकालो ………। इसी क्रम में जीवन की शाम नजदीक आ जाती है और जिन्दगी सिर्फ सिफर  रह जाती है ।
               सोचता हूँ , कैसे हैं वे लोग जो फुर्सत के क्षण पा लेते हैं और जिन्दगी के सपनों को साकार कर लेते हैं। यहाँ तो अब सपने भी नहीं आते , बस उसकी छुअन की याद भर आती है कि  कभी कोई सपना था जो जाने कब चुपके से मेरी जिन्दगी के आँगन से निकल गया  ........... कटे हुए पतंग की तरह सबको सुंदर सा दिखता हूँ , ऐसा ही हूँ मैं , किसी एक का नहीं , कभी वक़्त  का गुलाम तो कभी समस्यायों का - कटा पतंग , जिसकी चाहत सब को है ,पर वह  जिसके हाथ आ जाए वह भी उसे धागे से बींध -बाँध कर पुन: छोड़ देता है हवा में उड़ने को या फिर कट कर किसी और के हाथों पर गिर जाने या मिट जाने को । गैर तो गैर , अपने भी छोड़ देते हैं पतंग की तरह , जैसे लटेर भी छोड़ देता है तुड़ा कर धागा , वक़्त की मजबूत हाथों में ........

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