बारिश का नाम सुनते ही मन - प्राण स्फुरित हो झंकृत हो जाता है । यौवन की दहलीज पर कदम रखते हुए जब तन और वदन पर बारिश की फुहार पड़ती है तो एक साथ ही सम्पूर्ण शरीर में सिहरन पैदा कर जाती है - जैसे अज्ञात भीगे उँगलियों का स्पर्श ह्रदय को रोमांच और रोमांस से आप्लावित कर जाता है ।
बचपन से ही हम सब ने अपनी - अपनी वय में बारिश का आनंद अवश्य उठाया है । बारिश का पानी आँगन और नालियों में भर जाने पर उसमें कागज़ की नाव तैरा कर जो ख़ुशी बालपन में मिलती है उसकी परिकल्पना नहीं की जा सकती । पानी में उछल - उछल कर छप - छप करना किस बच्चे को अच्छा नहीं लगता है ----
" चल पानी में उछलें - कूदें ,
भींगे हम , कुछ मोद मनायें ,
छप,छपा- छप, छप -छप छैया ,
, हो हैया , हो , हो हैया। " - स्वरचित
स्कूल और कॉलेज आते - जाते बारिश की बूँदों में भींगना भी कितना आनंदमय क्षण होता था , जब मन की थकन और तन की तपन मिटती भी थी और बढ़ भी जाती थी ।
बरामदे या खिड़की में बैठ कर बारिश का आनंद लेते हुए चेहरे पर पड़ती फुहारों की छुअन और उस कशिश भरे क्षणों में आनन्दातिरेक हो सुध - बुध खो कर , बस भींगते रहना कितना अच्छा लगता था ! काश ! वो लम्हा फिर से लौट आता । ये चाहत अब भी मन को भाव -विह्वल कर देती है ।
कितने ही कवियों ने इस पावस ऋतु की सुन्दरता का बखान अपनी - अपनी लेखनी से अपने - अपने मनोभावों के अनुसार किया है ।
गर्मी में सूरज की तपन से झुलसे हुए दूब भी , बारिश की पहली बूंद से नहा कर स्वत: सद्द: स्नाता नायिका की तरह हरे - हरे परिधानों में विहँसती हुई हम सब के स्वागत को बिछ जाती है , जिसे देख कर हमारी आँखें तृप्त हो जाती हैं ।
पेड़ - पौधे हरे - भरे हो कर ख़ुशी से झूमते हुए बादलों को रिझाते अपनी ओर आकर्षित करते हैं । पत्तों से टप - टप कर गिरती बूँदें सरगम का गीत सुनाती हैं । पेड़ों की डालों और तनों से लिपटती , चूमती हुई जलधाराएं जब चलती हैं तो मानो सावन की नायिका अपने प्रियतम से लिपट - लिपट जन्मों - जन्मों की प्यास बुझा लेना चाहती है --
" पात - पात तरुवर का देखो ,
झूम - झूम देता आमंत्रण ,
सावन बरस -बरस कर करता ,
तरु के गात-गात आलिंगन ।" - स्वरचित
पिय पावस में परदेश गए ,
बलिहारी तुम्हारी शिला छतिया । " - विद्यापति
कवि की कल्पना पंख
लगा कर उड़ती है । जब प्रेयसी की याद आती है तो प्रेमी
के आँखों से आँसू झड़ने लगते हैं ----------
" जब याद तुम्हारी आती है ,
आँखों में सावन आ जाता । " - स्वरचित
आँखों में सावन आ जाता । " - स्वरचित
इतना ही नहीं , जब सावन की बूँदें उसके तन पर पड़ती हैं तो वह अति भावुक हो जाता है --------
और जब सावन की फुहारों से भींगा पवन उसके गालों को छू कर
बहता है तो बरबस उसकी आँखें भींग जाती है ---------
न्यारी है सावन की छटा , प्यारा है सावन । प्रकृति में चारों ओर हरियाली
का साम्राज्य बिछ जाता है । नदियाँ , झरने , सरोवर सभी
उल्लसित हो फूले नहीं समाते हैं । सावन के तीज - त्यौहार
और राखी के पर्व को कैसे भुलाया जा सकता है । तीज का
त्यौहार स्त्रियों के लिए विशेष महत्व रखता है । इस दिन
सुहागिन स्त्रियाँ नये - नये वस्त्रों एवं आभूषणों से सज कर ,
हाथों में मेहँदी रचा कर शिव - पार्वती की पूजा करती हुई
अपने पति की लम्बी उम्र की कामना करती हैं , झूले
झूलती हैं । उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में इस पर्व का
विशेष महत्व है । वैसे भी पूरे सावन में शिव की पूजा -
अर्चना और जलाभिषेक भारत के हर प्रदेश में होता है ।
सभी शिवालयों और मंदिरों में भगवन शिव पूजे जाते हैं ।
साथ ही
भाई - बहनों के पावन प्यार , स्नेह और अटूट बन्धन का अमर पर्व
रक्षा - बंधन भी सावन के महीने में चार चाँद लगाता है ।
भाईयों की कलाईयों में रंग - बिरंगी राखियाँ बाँधती हुई
बहनों की ख़ुशी का पारावार नहीं रहता । बहनें अपने भाइयों की
लम्बी उम्र की कामना के साथ - साथ स्वास्थ्य और धन - धान्य से
परिपूर्ण होने की कामना करती हैं ।
भाई भी बहन को यथासाध्य वस्त्र , भूषण , धन देते
हैं तथा बहन की रक्षा का व्रत लेते हैं । भारत भूमि की गोद
में प्राकृतिक छटा से लवरेज सावन का यह तोहफा भाई - बहन
के अनूठे प्यार को दर्शाता है ।
एक ओर
पहाड़ , आकाश , नदी , नाले ,पेड़ - पौधे , डालें - पत्ते सभी धुल
जाते हैं । बादलों के बीच से झांकता नीला आसमान भी सुन्दर
दिखने लगता है । हरे - भरे पत्ते , बिन छुए ही अपनी कोमलता
का एहसास कराते हैं , जैसे षोड़श वय प्राप्त करती षोड़षी , स्वत: , विमलांगी - कोमलांगी प्रतीत होने लगती है। कभी सप्तरंगी इन्द्रधनुष चटक कर
सबका मन मोह लेता है तो वहीँ दूसरी ओर गरजते , तड़कते , कड़कते
घन और बिजलियों की चमक भयभीत करती हैं । बारिश की
जलधारायें विकराल रूप धारण कर लेती हैं । नदी , नाले , तड़ाग
उफन जाते हैं , मानो यौवन का आवेग संभाले नहीं संभलता। पहाड़ों ,पत्थरों को तोड़ती,उसके अभिमान का मर्दन करती , आगे बढ़ती जाती हैं । तटबंधों को तोड़ आतुर नदियाँ ,फुफकारती , हुईं , अपनी राह में आई बाधाओं को धकेलती ,अपने प्रियतम सागर से मिलने दौड़ी चली जाती हैं।
पर , यह
भी सच है कि सावन की झमा - झम बारिश को देख , किसानों की छाती चौड़ी
हो जाती है तो कहीं अपने प्रियतम के आने की राह जोहती प्रिया
बादलों से अनुनय करती है ---------
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