Monday, February 3, 2014

हमारी नैतिकता


                  आज समाज में नारियों के साथ हो रहे दुष्कर्म की पराकाष्ठा हो गई है। हर वर्ग और हर वय के साथ इस  अमानवीय कृत्य के कारण विश्व में हमारी छिछालेदारी हो रही है। चाहे वह पश्चिम बंगाल की घटना हो या दिल्ली , महाराष्ट्र , मध्य प्रदेश ,उत्तर प्रदेश  या बिहार या कोई अन्य प्रदेश की ही क्यों न हो , सुन कर हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं , सिर  शर्म से झुक जाता है। हम यह सोचने को विवश हो जाते हैं -  " हमारी नैतिकता किस गर्त्य में जा रही है ? "
                 वैसे , यह समस्या भारत ही नहीं , अपितु कमोवेश विश्व के हर देशों की है।                   
                इतिहास गवाह है कि सम्पूर्ण विश्व में नारियों  की स्थिति दोयम दर्जे की है। इसकी जड़ें काफी गहरी हैं। हर युग में हर तरह से कमोबेश नारियों का शोषण होता रहा है।  हर युग में ही वह पुरुषों द्वारा छली जाती रहीं हैं।
                   सतयुग में गौतम ऋषि की पत्नि अहिल्या, देवाधिदेव इन्द्र द्वारा छली गईं और ऋषि द्वारा प्रताड़ित की गईं। त्रेता में सीता, द्वापर में मेनका पुत्री शकुन्तला और द्रौपदी अपने ही स्वजनों द्वारा प्रताड़ित की गईं  । कलियुग तो हम सब तो देख ही रहे हैं।
                   जहाँ -जहाँ नारियों ने प्रतिकार किया उन्हें यातनाएँ झेलनी पड़ी , किन्तु  अडिग हौसले ने उन्हें समाज में ऊँचा स्थान दिलाया। उनमें से कुछ जागरुक नारियाँ थीं तो कहीं उनकी प्रभुता ,कहीं उनका स्वयं का साहस काम आया। यथा यह सत्य है कि समाज में उनकी अशिक्षा ,गरीबी और प्राकृतिक रूप से उनकी शारीरिक संरचना के कारण अंदर से व्याप्त भय ही उनकी दुर्दशा का मूल कारण रहा रहा होगा।
                 किन्तु ,आज के वैश्विक ,विकसित और शिक्षित युग में भी स्त्रियों का शोषण ,शील हरण और प्रताड़ना ,विशेष कर जब कि हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं , चाँद , मंगल ग्रह और अंतरिक्ष की सैर कर रहे हैं ,जहाँ विदेशी ही नहीं ,भारतीय महिलाओं ने भी हर क्षेत्र में अपनी सफलताओं का परचम लहराया है ,ऐसे सदी में भी नारियों के प्रति पुरुषों की बर्बरता चरम पर है तो यह  भारत ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व के लिए अति शर्म की बात है।
                 स्त्रियों के साथ इस प्रकार के दुराचार और दुष्कर्म अमानवीय तथा असह्य और अक्षम्य अत्याचार है।
                  हम यहाँ अपने देश भारत की करें ,तो आज के सभी समाचारपत्रों में ,सभी समाचार चैनेलों पर प्रति दिन देश के किसी न किसी हिस्से से बलात्कार और व्यभिचार की घटनायें देखने और सुनने को मिलती हैं। यह सब देख -सुन कर सिर शर्म से झुक जाता है , नथनों में क्रोध भर जाता है किन्तु हम सभी पंगु बन हाथ पर हाथ धरे बैठे रह जाते हैं।
                  हम शाशन - प्रशाशन  की व्यवस्था को दोषी ठहराते हैं जो काफी हद तक सच है किन्तु कहीं न कहीं हम सब भी  दोषी हैं।आज हालात यह है कि अपने ही समाज ,परिवार और घर के बीच बेटियाँ सुरक्षित नहीं रह गईं हैं। हमारी नैतिकता इतनी खोखली और निम्न स्तर तक गिर गई है कि हम अनमोल संबंधों और रिश्तों की गरिमा को भी ताक पर रखने लगे हैं।
                   इस  दुष्कृत्य के कारण ही , भारतीय पुरुषों के लिए ,जर्मनी के प्रोफेसर द्वारा जो विशेषण प्रयुक्त हुए हैं ,वह हमें भविष्य के लिए सचेत करती है। ऐसा न हो कि अन्य देश भी इसी प्रकार के विशेषण प्रयोग कर भारतीय पुरुष समाज को तिरस्कृत करता रहे।  भी प्रकार के यौन अत्याचार की प्रवृतियों पर अंकुश लगनी ही चाहिए। ऐसे व्यक्तियोँ का न्यायायिक प्रक्रिया के साथ-साथ सामाजिक वहिष्कार भी होना चाहिए।
                  शाशन की लचर व्यवस्था और लम्बी न्यायायिक प्रक्रिया के कारण भी  इन्साफ मिलते - मिलते रह जाता है। क़ानून के लचरपन की वजह भी अपराधियों के मन में कोई खौफ नहीं है और वे बिना किसी डर के  नृशंश अपराध करते हैं।
                 
                  सन 2012 की 16 दिसम्बर की घटना के उपरान्त कुछ नए क़ानून का प्रावधान किया गया। उसमें भी कई कानूनी अड़चनों के कारण अपराधी को कहीं - कहीं बच निकलने का रास्ता मिल जाता है।
                   सन 2012 की घटना के बाद तो ऐसी घटनाओं में और भी बढ़ोत्तरी देखी जा रही है। 2012 की "निर्भया कांड" के बाद भी कितनी ही निर्भया का बलिदान हो गया। दिल्ली में 2014 की " कैव घटना " और नदिया जिला ( पश्चिम बंगाल  ) के नन के साथ हुए पाशविक  वृतियां हमें झकझोरती हैं। हम कुछ समय तक हो - हल्ला मचाते है ,फिर खामोश हो जाते हैं। 
                  आज ऊँचे ओहदे और माननीय कहलाने वाले व्यक्ति भी इस घिनौने कृत्य में संलिप्त पाये जा रहे हैं तो अशिक्षितों और निम्नकोटि और निम्न बुद्धि वालों से क्या अपेक्षा की  जा सकती है। इतना क्यों  गिर गया है यह पुरुष समाज ?
                 जहाँ तक तरह के अपराधिक प्रवृतियों में संलिप्त माननीयों का प्रश्न है तो उन्हें कतई भी किसी भी प्रकार कीछूट नहीं मिलनी चाहिए चाहे वे कोई भी हों , किसी भी पद पर हों या परिवार  क्यों न हों। हम भारतीय परंपरा के अनुसार अपने से उम्र में बड़े और ओहदेदार व्यक्ति को अपना आदर्श मान कर उन पर विश्वास करते हैं। जब वे ही ऐसे गर्हित कार्य करने लगें तो फिर छोटे कहाँ जाएँ ,किस पर विश्वास करें।
                   इस दिशा में सामाजिक क्रान्ति की आवश्यकता है। आज के सामाजिक परिवेश में भाईचारे और संवाद की कमी होती जा रही है। इन्हें पुनर्जीवित करना होगा। परिवार और समाज के बड़े-बुजुर्गों को आपसी  संबंधों की गरिमा का महत्व परिवार और समाज को  बतलाना होगा। युवाओं का सही मार्गदर्शन करना ही होगा। तभी स्वच्छ समाज - परिवार कल्पना सार्थक हो सकेगी और इस प्रकार के अपराधों पर विजय प्राप्त कर सकें।
                    बहरहाल ऐसे निंदनीय घटनाओं का , चुप नहीं बैठ कर  पुरजोर विरोध करना होगा। ऐसे चेहरों पर से नकाब उठाना ही होगा। इन्हें समाज में खुले आम तिरस्कृत करना होगा। शाशन की व्यवस्था भी इतनी चुस्त हो कि जो भी इस तरह के अपराध में लिप्त पाया जाए उसको शीघ्र से शीघ्र कठोर से कठोरतम सजा का प्रावधान हो ताकि ऐसे जघन्य कुकृत्य पर रोक लग सके।
                  
 ( प्रकाशित )

  
                  
          

    

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