Wednesday, February 12, 2014

प्रचार में हिंदी

     आज के औधोगिक जगत में ही नहीं वरन हर क्षेत्र में प्रचार की उपयोगिता सफलता का सोपान छू रही है। हर वस्तु प्रचार के माध्यम से बिकाऊ हो रहा है। जिसका जितना प्रचार वह उतना ही बिकाऊ। उपभोक्तावादी वस्तुओं से लेकर समाज और जीवन से जुड़ी हर चीज का प्रचार चरम पर है।
      आज से चालीस -पचास वर्ष पूर्व प्रचार के इतने माध्यम नहीं थे जितने आज उपलब्ध हैं। प्रचार के माध्यम की अनुपलब्धता के कारण प्रचार के लिए क्षेत्र भी सीमित रह जाता था जबकि आज इसका क्षेत्र असीम है। आज छोटी से छोटी वस्तुओं से लेकर शिक्षा , व्यवसाय , सरकारी - गैरसरकारी योजनाओं के कार्यकलाप और उनके गठन को लेकर चुनाव तक प्रचार से प्रभावित हो रहे हैं। पहले कुछ उपभोक्तावादी वस्तुओं का प्रचार औधोगिक संस्थाओं द्वारा अपने कर्मचारियों के माध्यम  से उन्हें गॉंव -गाँव , कस्बे -कस्बे ,शहर -शहर घूम कर उत्पादक वस्तुओं का प्रचार और प्रसार उन वस्तुओं का प्रदर्शन कर किया जाता था।  इसमें धन खर्च के अलावा समय भी बहुत लगता था और क्षेत्र भी सीमित ही रह जाता था। साथ ही बहुत अधिक परिश्रम करना पड़ता था। अमूमन दैनिक जीवन के उपयोग की वस्तुएँ  जैसे चाय, बिस्कुट,साबुन ,सर्फ़ पाउडर, टूथपेस्ट आदि का प्रचार तो हो जाता था परन्तु कुछ और भी उपभोक्तावादी वस्तुओं तथा साधन जो आम आदमी के जीवन की सुलभता से जुड़ा होता था जैसे शिक्षा , व्य्वसाय , भविष्य की योजनाओं के लिए बचत आदि के बारे में आम आदमी के बीच जानकारी का अभाव ही रहता था।बचत के महत्व को समझते हुए भी उनकी कुछ मजबूरियाँ थीं। मसलन बैंक हो या पोस्ट ऑफिस सब ही जगह अंग्रेजी भाषा की ही बहुलता थी। लेन -देन के लिए एक ही स्थान से बंधे रहना पड़ता था। आवश्यकता पड़ने पर रुपैये - पैसे निकालने में परेशानी होती थी। कभी - कभी बिलम्ब भी हो जाता था। आज सभी बैंक और पोस्ट ऑफिस तकनीकी रूप से विश्व के हर कोने से जुड़ा है। हर काम मिनटों में हो जाता है ।
      आज प्रचार के कई माध्यम हैं। प्रचार के माध्यमों में श्रव्य और दृष्टव्य  का महत्व तो  तकनीकी युग में प्रचार के लिए प्रिंट मीडिया  ( अखबार , पत्र - पत्रिकायें ,पैम्फलेट ,बैनर आदि ) और टी.वी .एवं इलेकट्रोनिक मीडिया द्वारा प्रदत्त सुविधाएं भी सशक्त और सक्षम भूमिकायें निभा रही हैं। आज हम इलेकट्रोनिक मीडिया के कारण गाँव - गाँव , कस्बे - कस्बे तक पहुँच गए हैं। यह आज के तकनीकी युग की बड़ी देन है। अब प्रचार के लिए  और भटकने की आवश्यकता नहीं है। हम इन उपलब्ध माध्यमों से जन - जन को जागरूक करने में सक्षम हैं। वह प्रचार उपभोक्तावादी वस्तुओं ,मकान -दुकान,पंखा ,फ्रिज,कूलर,का-स्कूटर बाइक,विजली इन्वर्टर , हो या कॉस्मेटिक   सामान हो या शैक्षणिक संस्थाओं ,व्यवसायों का , हम अधिकाधिक रूप से लाभान्वित हो रहे हैं।
         परन्तु प्रचार के लिए भाषा के महत्व को कम करके नहीं आँका जा सकता है। हिंदी हमारी मातृभाषा-राजभाषा तो है ही साथ - साथ यही हमारी संपर्क भाषा भी है। किसी भी वस्तु  या विविध कार्यों और योजनाओं के लिए हर क्षेत्र में हिंदी ही एक ऐसी भाषा है जो अति सरलता से जन -मानस के मन -मस्तिष्क और दिलों - दिमाग पर छा जाता है। आज सभी उत्पाद का महत्व हिंदी के माध्यम से प्रचार के कारण ही बढ़ा है। क्षेत्रवाद की बात हम छोड़ दें तो आज अपनी बात हिंदी में जितनी आसानी सेकहते और समझते हैं वह शायद दूसरी भाषाओं में नहीं।  बॉलीवुड को ही ले लीजिये ,हिंदी फिल्मों के कारण ही आज वह सफलता के उच्चतम शिखर पर है। देश में ही नहीं ,विदेशों में भी हिंदी फ़िल्में अपना छाप छोड़ती हैं। इसके गीत , संवाद  आदि सभी का माध्यम हिंदी है जो लोगों की जुबान और मस्तिष्क पर छाया रहता है। आज हिंदी सभी भाषाओं में सर्वाधिक बोली और समझने वाली भाषा बन गई है। पंजाब,हिमाचल,अरुणाचल, आसाम -बंगाल हो या केरल -कर्नाटक  या आंध्र प्रदेश, तामिलनाडू ही क्यों न हो हर प्रदेश में बोलने और समझने वालों की बहुतायत है। आज सभी जगह हिंदी ने अपना स्थान बना लिया है। हर प्रकार से प्रकार से पत्र -प्रपत्र में हिंदी का उपयोग होने लगा है।
        आज सभी जानते हैऔर समझते हैं कि सभी उत्पाद के वस्तुओं और योजनाओं के विज्ञापन का मह्यं हिंदी जन- मानस पर विशेष छाप छोड़ता है। अत: हम सुलभता और दावे के साथ कह  कि प्रचार में हिंदी की उपयोगिता बढ़ गयी है। इसके मह्त्व को हम कतई झुठला नहीं सकते हैं। 

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