वसंत आ गया है। धरती सजने - सँवरने लगी है। चारों ओर रंग - बिरंगे नीले- पीले , लाल -
गुलाबी फूल खिले हैं। मानो प्रकृति ने कई रंगों की चुनरी ओढ़ ली है। बादल बरस कर चले गए हैं। आसमान धुल गया है। नीला अंबर धरा की सुन्दरता देख कर धरती पर समर्पण भाव से झुक गया है , नत हो गया है - मानो नीलाकाश धरती को अपने आलिंगन में भर लेना चाहता है। कामदेव , फूलों से धरा को सजा कर सबके ह्रदय में प्रेम रस का संचार कर रहे हैं। कोयल कूकने लगी है। मोर कूजने लगे हैं। तोते अपनी आवाज से सबको आकर्षित कर रहे हैं। प्रेम के प्रतीक ये सुन्दर तोते झुण्ड के झुण्ड आकाश में विचरण कर रहे हैं। कहीं - कहीं जोड़ों में बैठ कर " प्रेम " को साकार कर रहें हैं। फागुन आ गया है - अहसास हो रहा है।
होली के रंग का सरूर तन - मन को आनंद के सागर में डुबोने लगा है। ऐसे में मानव मन क्या , देवमन श्री कृष्ण का ह्रदय भी राधा संग होली खेलने को मचल उठता है। श्री कृष्ण तो स्वयं पीताम्बरधारी हैं , श्याम घन रूपी तन , कमल - नाल सी भुजायें , अम्बुज से लोचन , मुस्कान भरे होंठों पर हरित बाँसुरी , सिर पर मोरपंख , साक्षात बासंतिक छवि - प्रतीत होता है कि कामदेव ने स्वयं अपने हाथों से सजाया हो - उसी कृष्ण का मन आज बसंत की होली के रंग में रंग गया है और अपने संगी ग्वाल - बाल को साथ लेकर होली खेलने निकल पड़े हैं - राधा की गलियों में।
राधा मन ही मन मुस्का रही है। बसंत का रंग , फागुन का रंग , होली का रंग उसके तन -मन को सराबोर कर रहा है। वह भी कब से कृष्ण संग होली खेलने का इन्तजार कर रही है । होली के इस रस का आनंद उठाने के लिए मथुरा ,वृंदावन और गोकुलवासी ही नहीं , देवगण भी उल्लसित हो कर स्वर्ग से फूलों की वर्षा कर रहे हैं - ऐसा लगता है कि यह फूलों की होली कृष्ण - राधा और राधा - कृष्ण के बीच हो रही है। गोकुल की गालियाँ , गोप - गोपियाँ फूलों से नहा रही हैं। होली का उत्साह तब और भी दूना हो जाता है जब गोपियाँ अपनी मटकियों में रंग भर कर ला रही हैं और नटखट मोहन अपने सखाओं सहित कंकड़ी मार कर मटकी फोड़ देते हैं। रंगों की बौछार होने लगती है। कहीं चोली भींगती है कहीं चुनरी।
चारों ओर गुलाल उड़ने लगता है। इधर आसमान लाल हो रहा है उधर राधा और गोपियों के गाल। गोपियाँ बरसाने की , लठ्ठ ले कर निकल पड़ती हैं। कृष्ण भी कम नहीं , कहते हैं - " तेरी लाठियों की चोट तो हम अपने सिर पर झेल लेंगे पर एक बार गाल पर गुलाल तो मलने दे। " गोपियों के लाल - लाल गाल और भी लाल हो जाते हैं। वे आनंद में भर कर आवेश में तेजी से लाठियाँ बरसाने लगती हैं। ये लाठियाँ , लाठियाँ नहीं हैं -फूल की छड़ी हैं -उल्लास , प्यार और स्नेह का प्रतीक हैं। सभी गोपियाँ राधा की तरह कृष्ण संग होली खेलना चाहती हैं। कृष्ण गोपियों के मन की बात जान लेते हैं और फिर सम्पूर्ण वातावरण कृष्णमय हो जाता है। जितनी गोपियाँ , उतने ही कृष्ण। कृष्ण को देख होली का उत्साह दूना हो रहा है। इधर लाठियों की बरसात उधर अटारियों से रंग , गुलाल , और फूलों की बौछार। धरती से अंबर तक गुलाल ही गुलाल।
प्रेम का प्रतीक यह होली , मन को तरंगित करने वाली होली , उल्लास और हुलास को जीवित रखने वाली होली , मान - सम्मान ,प्यार - सौहाद्र का पवित्र त्यौहार आज भी मथुरा,वृंदावन बरसाने की गलियों में ही नहीं भारत देश के हर घर में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। सुबह की शुरुआत ही रंग - गुलाल से होती है। घरों में तरह - तरह के पकवान पकाये और बनाये जाते हैं। दिनभर होली की धूम के साथ हम एक दूसरे से प्यार से मिलते हैं , मेहमानों व अतिथियों को पकवान व मिष्टान्न खिला कर उनका स्वागत करते हैं।आज भी बरसाने की होली उसी प्रकार खेली जाती है। आज भी राधा और कृष्ण मथुरा और वृंदावन की गलियों में होली खेलते हैं। रंग , गुलाल और प्यार की होली।
गुलाबी फूल खिले हैं। मानो प्रकृति ने कई रंगों की चुनरी ओढ़ ली है। बादल बरस कर चले गए हैं। आसमान धुल गया है। नीला अंबर धरा की सुन्दरता देख कर धरती पर समर्पण भाव से झुक गया है , नत हो गया है - मानो नीलाकाश धरती को अपने आलिंगन में भर लेना चाहता है। कामदेव , फूलों से धरा को सजा कर सबके ह्रदय में प्रेम रस का संचार कर रहे हैं। कोयल कूकने लगी है। मोर कूजने लगे हैं। तोते अपनी आवाज से सबको आकर्षित कर रहे हैं। प्रेम के प्रतीक ये सुन्दर तोते झुण्ड के झुण्ड आकाश में विचरण कर रहे हैं। कहीं - कहीं जोड़ों में बैठ कर " प्रेम " को साकार कर रहें हैं। फागुन आ गया है - अहसास हो रहा है।
होली के रंग का सरूर तन - मन को आनंद के सागर में डुबोने लगा है। ऐसे में मानव मन क्या , देवमन श्री कृष्ण का ह्रदय भी राधा संग होली खेलने को मचल उठता है। श्री कृष्ण तो स्वयं पीताम्बरधारी हैं , श्याम घन रूपी तन , कमल - नाल सी भुजायें , अम्बुज से लोचन , मुस्कान भरे होंठों पर हरित बाँसुरी , सिर पर मोरपंख , साक्षात बासंतिक छवि - प्रतीत होता है कि कामदेव ने स्वयं अपने हाथों से सजाया हो - उसी कृष्ण का मन आज बसंत की होली के रंग में रंग गया है और अपने संगी ग्वाल - बाल को साथ लेकर होली खेलने निकल पड़े हैं - राधा की गलियों में।
राधा मन ही मन मुस्का रही है। बसंत का रंग , फागुन का रंग , होली का रंग उसके तन -मन को सराबोर कर रहा है। वह भी कब से कृष्ण संग होली खेलने का इन्तजार कर रही है । होली के इस रस का आनंद उठाने के लिए मथुरा ,वृंदावन और गोकुलवासी ही नहीं , देवगण भी उल्लसित हो कर स्वर्ग से फूलों की वर्षा कर रहे हैं - ऐसा लगता है कि यह फूलों की होली कृष्ण - राधा और राधा - कृष्ण के बीच हो रही है। गोकुल की गालियाँ , गोप - गोपियाँ फूलों से नहा रही हैं। होली का उत्साह तब और भी दूना हो जाता है जब गोपियाँ अपनी मटकियों में रंग भर कर ला रही हैं और नटखट मोहन अपने सखाओं सहित कंकड़ी मार कर मटकी फोड़ देते हैं। रंगों की बौछार होने लगती है। कहीं चोली भींगती है कहीं चुनरी।
चारों ओर गुलाल उड़ने लगता है। इधर आसमान लाल हो रहा है उधर राधा और गोपियों के गाल। गोपियाँ बरसाने की , लठ्ठ ले कर निकल पड़ती हैं। कृष्ण भी कम नहीं , कहते हैं - " तेरी लाठियों की चोट तो हम अपने सिर पर झेल लेंगे पर एक बार गाल पर गुलाल तो मलने दे। " गोपियों के लाल - लाल गाल और भी लाल हो जाते हैं। वे आनंद में भर कर आवेश में तेजी से लाठियाँ बरसाने लगती हैं। ये लाठियाँ , लाठियाँ नहीं हैं -फूल की छड़ी हैं -उल्लास , प्यार और स्नेह का प्रतीक हैं। सभी गोपियाँ राधा की तरह कृष्ण संग होली खेलना चाहती हैं। कृष्ण गोपियों के मन की बात जान लेते हैं और फिर सम्पूर्ण वातावरण कृष्णमय हो जाता है। जितनी गोपियाँ , उतने ही कृष्ण। कृष्ण को देख होली का उत्साह दूना हो रहा है। इधर लाठियों की बरसात उधर अटारियों से रंग , गुलाल , और फूलों की बौछार। धरती से अंबर तक गुलाल ही गुलाल।
प्रेम का प्रतीक यह होली , मन को तरंगित करने वाली होली , उल्लास और हुलास को जीवित रखने वाली होली , मान - सम्मान ,प्यार - सौहाद्र का पवित्र त्यौहार आज भी मथुरा,वृंदावन बरसाने की गलियों में ही नहीं भारत देश के हर घर में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। सुबह की शुरुआत ही रंग - गुलाल से होती है। घरों में तरह - तरह के पकवान पकाये और बनाये जाते हैं। दिनभर होली की धूम के साथ हम एक दूसरे से प्यार से मिलते हैं , मेहमानों व अतिथियों को पकवान व मिष्टान्न खिला कर उनका स्वागत करते हैं।आज भी बरसाने की होली उसी प्रकार खेली जाती है। आज भी राधा और कृष्ण मथुरा और वृंदावन की गलियों में होली खेलते हैं। रंग , गुलाल और प्यार की होली।
No comments:
Post a Comment